December 2016

फ़स्ल हश्तम

मौलवी सना-उल्लाह साहिब के इल्ज़ामी

जवाबात पर नज़र

मौलवी सना-उल्लाह साहिब जब मेरे रिसाले के जवाब लिखने से निहायत बेबसी और बेकसी के साथ क़ासिर रह गए। यानी इस्लाम में नजात साबित ना कर सके तो इल्ज़ामी जवाबात की आड़ में पनाह ढ़ूढ़ने लगे। और इल्ज़ामी जवाबात भी ऐसे पुराने और बोसीदा कि दकियानूस के ज़माने में से भी बरसों आगे के हैं। बमिस्दाक़ डूबते को तिनके का सहारा। मौलवी साहब ने अपनी बेहतरी इसी में देखी। चुनांचे आप रक़म फ़रमाते हैं कि :—

"मसीह अलैहिस्सलाम ने भी आमाल शरईयह पर अमल करने की बहुत ताकीद की है चुनांचे आपके अल्फ़ाज़ ये हैं तू ज़िंदगी में दाख़िल हुआ चाहता है। तो हुक्मों पर अमल कर। (इंजील मत्ती 19 बाब 18)

बस मुख़्तसर जवाब तो यही है कि जिस वजह से आपने इस्लाम को छोड़ा यानी अहकाम शरईयह पर आप ख़ौफ़-ज़दा हुए वही ख़ौफ़ इंजील में भी मौजूद है" (अहले-हदीस 5 अक्तूबर 1928 ई. सफ़ा 3)

फिर आप अहले-हदीस मौरखा 12 अक्तूबर 1928 ई. सफ़ा 3 में लिखते हैं कि :—

"हमारा ख़्याल है कि जिस तरह पादरी साहिब की नज़र से ये आयत क़ुरआनी ओझल रही है। इंजील का एक मुक़ाम भी उन्होंने नहीं देखा। देखा तो ग़ौर नहीं फ़रमाया। वर्ना पादरी साहिब अगर आमाल सालेहा से घबराकर इस्लाम से बर्गशता हुए थे तो इधर से हट कर ईसाई मज़्हब में ना जाते मुम्किन था आज़ाद हो जाते लेकिन मसीही ना होते। पस पादरी साहिब ग़ौर से सुनें मसीह फ़रमाते :—

"जो कोई इन (तौरात) के हुक्मों में सबसे छोटे को टाल दे और वैसा ही आदमीयों को सिखा दे आस्मान की बादशाहत में सबसे छोटा कहलाएगा। क्योंकि मैं कहता हूँ कि अगर तुम्हारी रास्तबाज़ी फ़क़ीहों और फ़रीसयों (उलमा यहूद) से ज़्यादा ना हो तुम आस्मान की बादशाहत में किसी तरह दाख़िल ना होगे" (इंजील मत्ती बाब 5 फ़िक्रात 19-20)

इस में कोई शक नहीं कि अनाजील में आमाल सालेहा पर बेहद "ताकीद" है। यहां तक कि क़ुरआन शरीफ़ की "ताकीद" उस के आगे कोई हक़ीक़त नहीं रखती है लेकिन क़ुरआन शरीफ़ की "ताकीद" में और अनाजील की "ताकीद" में ज़मीन व आस्मान का फ़र्क़ है। क़ुरआन शरीफ़ की ताकीद के मअनी ख़ुदा के साथ तिजारत करना है। चुनांचे ख़ुद मौलवी साहब ने जे़ल का शेअर लिख कर इस की तस्दीक़ की है कि :—

जी इबादत से चुराना और जन्नत की हवस

काम-चोर इस काम पर किस मुँह से उज्रत की हवस

(अहले-हदीस 4 अक्तूबर 1928 ई. सफ़ा 3)

अनाजील की "ताकीद" के ये मअनी हैं कि हर एक हालत में ख़ुदा की "इबादत" करनी लाज़िमी है। क़त-ए-नज़र इस से कि इस को इबादत की "उज्रत" में "जन्नत" मिले इबादत ना करने की सज़ा में दोज़ख़ मिले। हम ख़ुदा के फ़र्ज़ंद हैं। सआदतमंद फ़रज़न्दों का फ़र्ज़ है कि अपने बाप के फ़रमांबर्दार और मुतीअ रहें ख़्वाह उनका बाप उनको इनाम दे या ना दे। ग़रज़ कि मसीहीय्यों के आमाल सालेहा में ख़ौफ़ और राजार को मुतलक़ दख़ल नहीं है। यही सबब है कि अनाजील में एक आयत भी नहीं है जो इस पर दलालत करे कि नजात आमाल सालेहा पर मौक़ूफ़ है।

बरअक्स इस के अनाजील में सैंकड़ों ऐसी आयतें मौजूद हैं जो नजात को सिर्फ हमारे मुंजी की ज़ात पर मुनहसिर बतलाती हैं। चुनांचे ऐसी चंद आयतें हमने अपने रिसाला "मैं क्यों मसीही हो गया" में नक़्ल की हैं। (देखो रिसाला बाला के सफ़ा 39-42 आयत तक)

मौलवी साहब चूँकि अनाजील की इस्तिलाहात से वाक़िफ़ नहीं हैं। इस लिए अनाजील में जहां कहीं उनको लफ़्ज़ "आस्मान की बादशाहत" मिल गया उन्होंने वहां ये समझा कि इस से मुराद "नजात" है। चुनांचे आप अहले हदीस मौरख़ा 12 अक्तूबर 1928 ई. के हाशिया में लिखते हैं कि "इंजील के मुहावरे में नजात को आस्मान की बादशाहत कहा गया है" हालाँकि इंजील के मुहावरा "में आस्मान की बादशाहत" नजात याफ्ताह यानी मसीहीय्यों का मुक़ाम है ना कि "नजात" और मुक़ाम से मुराद इंजील जलील का दायरा असर है जिसको हम कलीसिया कहते हैं। चुनांचे जिन आयात को आपने नक़्ल किया है ख़ुद उनमें इस की तशरीह मौजूद है कि “आस्मान कि बादशाहत में सब से छोटा कहलाएगा” अगर बक़ोल आपके आस्मान कि बादशाहत से नजात मुराद होती तो “आस्मान की बादशाहत में छोटा कहलाने के कुछ भी मअनी नहीं हो सकते हैं। क्योंकि जब कोई गुनहगार इस में सिरे से दाख़िल ही नहीं हो सकता तो वो इस में किस तरह छोटा कहलाया जा सकता है।

नीज़ एक और आयत में ख़ुदावंद ने और वाज़ेह तौर पर बयान फ़रमाया है कि देखो ख़ुदा की बादशाहत तुम्हारे दर्मियान है" (लूका 17:21) पस जहां कहीं अनाजील में इस किस्म के अल्फ़ाज़ आए हैं वहां उनका मतलब ये है कि वो शख़्स जो ऐसा ऐसा काम करता है एक नाक़िस मसीही समझा जाएगा और इस आयत का और इस किस्म की दूसरी आयतों का मतलब कि "अगर तुम्हारी रास्तबाज़ी फ़क़ीहों और फ़रीसयों से ज़्यादा ना हो तो तुम आस्मान की बादशाहत में किसी तरह दाख़िल ना होगे। ये है कि अगर तुम अपनी तमाम बदकिर्दारियों और गुनाहों को तर्क ना करोगे तो तुम मसीही जमात में कभी दाख़िल ना हो सकोगे क्योंकि मसीही होने के मअनी यही हैं कि गुनाहों से मुतनफ़्फ़िर होना और रास्तबाज़ी की ज़िंदगी बसर करना।

पस अनाजील में आमाल सालेहा पर इसलिए "ताकीद" है कि आमाल सालेहा ईमान यानी मसीही होने की ख़ास अलामत और रास्तबाज़ी का निशान है यानी एक शख़्स का मसीही होना उसके आमाल से मालूम हो जाता है। अगर उसके आमाल इंजील के साँचे में ढले हुए हैं तो वो एक ईमानदार और कामिल मसीही है और अगर उसके आमाल में कुछ कसर बाक़ी है तो वो एक नाक़िस यानी छोटा मसीही कहलाएगा और अगर वो बिल्कुल बदकिर्दार शख़्स है यानी इंजील जलील के अहकाम के बरख़िलाफ़ चलता है तो मुतलक़ हक़ीक़ी मसीही नहीं है।

नाज़रीन को याद होगा कि मैंने अपने रिसाले में क़ुरआन शरीफ़ की वो आयत नक़्ल की थी जिसमें ये लिखा हुआ है कि "हर एक शख़्स को दोज़ख़ में दाख़िल करना ख़ुदा पर फ़र्ज़ हो चुका है। मौलवी साहब ने इस आयत के बिलमुक़ाबिल इंजील जलील की इस आयत को पेश किया है कि "हर एक शख़्स आग से नम्कीन किया जाएगा" (मरक़ुस 9:49) बेचारे मौलवी साहब को इस आयत में लफ़्ज़ "आग" क्या मिल गया गोया डूबते को तिनके का सहारा मिल गया। आप ये समझते हैं कि इस से मुराद दोज़ख़ की "आग" है। ये सिर्फ़ जनाब ही के ज़ेहन-ए-रसा का नतीजा नहीं है बल्कि ख़ुद आँहज़रत सलअम ने भी इस आग को दोज़ख़ की "आग" समझ कर وان منکم الاوراد ھا कि सूरत में क़ुरआन शरीफ़ में शामिल फ़रमाया। चुनांचे मैंने इन दोनों आयतों को "हमारा क़ुरआन" में बिलमुक़ाबिल नक़्ल किया है। मेरे नक़्ल करने का मक़्सद सिर्फ इस क़दर था कि वो लोग जो बाइबल मुक़द्दस से वाक़िफ़ हैं इस अम्र का अंदाज़ा कर सकें कि आँहज़रत को बाइबल मुक़द्दस की आयतों के नक़्ल करने में इस क़दर शग़फ़ और इन्हिमाक था कि जो आयत भी आपको मिल जाती थी उस के मफ़्हूम से क़त-ए-नज़र करके क़ुरआन शरीफ़ में शामिल फ़रमाते थे।

मरक़ुस की आयत माफ़ौक़ में आग से मुराद रूहुल-क़ुद्दुस है जो पाकीज़गी का सर चशमा है जिसकी ताईद लफ़्ज़ नम्कीन करता है जो पाकीज़गी की अलामत है। इंजील जलील में बीसियों जगह रूहुल-क़ुद्दुस को आग से तशबीया दी गई है। जिनमें से हम बतौर नमूना के सिर्फ एक आयत पर इक्तिफ़ा करते हैं। ग़ौर से सुनिए :—

और "उन्हें आग के शोले की सी फटती हुई ज़बानें दीखाई दीं और उन में हर एक पर आ ठहरीं और वो सब रूहुल-क़ुद्दुस से भर गए" (आमाल 2:3 व 4)

लफ़्ज़ नम्कीन के मुताल्लिक़ हम लिख आए हैं कि इंजील मुक़द्दस की इस्तिलाह में इस के मअनी पाकीज़गी की अलामत के हैं। चुनांचे ख़ुद हमारे मुंजी ने अपने शागिर्दों को नमक से तशबीया दी है कि "तुम दुनिया के नमक हो" (मत्ती 5:13) पस आयत माफ़ौक़ के मअनी ये हैं कि कोई शख़्स पाकीज़गी हासिल नहीं कर सकता है। तावक्ते कि रूहुल-क़ुद्दुस से बहरा याब और माअमूर ना हो जाए I और इस के बाद हमारे मुंजी ने अपने शागिर्दों को ये ख़ुशख़बरी सुनाई कि हर एक सच्चे मसीही पर रूहुल-क़ुद्दुस उतरेगा और उस की ज़िंदगी नम्कीन यानी पाकीज़ा ज़िंदगी बन जाएगी।

अगर खुदावंद मसीह का मक़्सद इस "आग से दोज़ख़" की "आग" होता तो उस के साथ लफ़्ज़ नम्कीन इस्तिमाल ना फ़रमाते। लफ़्ज़ नम्कीन का फ़रमाना ही इस की काफ़ी दलील है कि इस "आग" से मुराद रूहुल-क़ुद्दुस है ना कि दोज़ख़ की "आग।” अब आया समझ में !

फ़स्ल नह्म

मौलवी सना-उल्लाह साहिब की नेकी और बदी

हम गुज़शता औराक़ में आमाल सालेहा की तशरीह और अहमीय्यत बयान करके ये वाज़ेह कर चुके हैं कि मसीहीय्यत में आमाल सालेहा क्या हैसियत रखते हैं। अगर नाज़रीन को मौलवी साहब का वो क़ौल याद है कि :—

"बे-शक आमाल शरईयह इतनी हैसियत नहीं रखते कि दुनियावी नेअमा का शुक्र अदा होने के बाद नजात" उखरवी के लिए भी इल्लत हो सकें। हाँ मह्ज़ उसका फ़ज़्ल ही फ़ज़्ल है कि चंद लम्हों की इताअत को दाइमी राहत (नजात) का मूजिब बना दिया। ये तशरीह है हदीस मज़्कूर की......क्या वजह कि पहले तो आमाल के मूजिब नजात होने से इन्कार किया। पीछे आमाल की ताकीद फ़रमाई। इस की वजह वही है जो हम बता आए हैं कि आमाल अपनी ज़ाती हैसियत से हरगिज़ मूजिब नजात नहीं, मगर बेकार भी नहीं।”

(अहले-हदीस मौरख़ा 9 नवम्बर 1928 ई. सफ़ा 3)

तो ज़ाहिर है कि हम में और मौलवी साहिब में अब कोई उसूली इख़्तिलाफ़ बाक़ी नहीं रहा और मौलवी साहिब को इबारत बाला के लिखने के बाद ख़्याल आया। या किसी ने ख़्याल दिलाया कि आपने तो इस्लाम के असल उसूल पर पानी फेर दिया। जब मुसलमान आपके इस बयान को पढेंगे तो आपको क्या कहेंगे" तो मज्बूरन आपको इस ताम्मुल रक़ीक़ से काम लेना पड़ा कि हम आमाल शरईयह को बहुक्म ख़ुदा (یجعل جامل) मूजिब नजात मानते हैं।

मौलवी साहब चूँकि निरे अहले-हदीस हैं इन को उन पेचीदगीयों का जो फ़ल्सफ़ा के किसी ग़लत मसअला से पैदा हो जाती हैं इल्म नहीं है। अगर उनको इस गुमराह कुन मसअला के नतीजे का कुछ भी इल्म होता तो हरगिज़ इस किस्म का सक़तयाना ख़्याल ज़ाहिर ना फ़रमाते।

मौलवी साहब के इस क़ौल का मुफ़ाद ये है कि दुनिया में नेकी और बदी जिनको फ़ल्सफ़ा में हुस्न दक़ीह कहते हैं बज़ात-ए-ख़ुद कोई चीज़ नहीं बल्कि जिस चीज़ को ख़ुदा (जाइल) बद (बुरा) ठहराए ख़्वाह वो चीज़ बज़ात-ए-ख़ुद कितनी ही अच्छी क्यों ना हो वो बद यानी बुरी है। और जिस चीज़ को ख़ुदा (जाइल) नेक (अच्छा) ठहराए ख़्वाह वो चीज़ बज़ात-ए-ख़ुद कितनी ही बुरी क्यों ना हो वो नेक यानी अच्छी है। मसलन चोरी करना, झूट बोलना, फ़रेब देना, ज़ुल्म करना बज़ात-ए-ख़ुद बुरे नहीं हैं। चूँकि ख़ुदा ने उनको बुरा ठहराया है लिहाज़ा वो बुरे हैं इसी तरह सदाक़त, दियानत, अदालत बज़ात-ए-ख़ुद अच्छी नहीं हैं। चूँकि खुदा ने उनको अच्छी ठहराया है लिहाज़ा वो अच्छी हैं। जिसका नतीजा ये निकलेगा कि अगर ख़ुदा उस क़ज़ीया को मुनअकिस कर दे यानी क़त्ल ग़ारत, ज़ुल्म, कज़्ज़ाब को अच्छा ठहराए तो मौलवी साहिब शौक़ के साथ उन पर अमल करेंगे।

अगर आप दुनिया के किसी तबक़े में जाएं हत्ता कि आप दुनिया के दहरियों, मुल्हिदों और ला- मज़्हबों के तबक़ा में जाकर उन से दर्याफ़्त करें तो यही जवाब देंगे कि ज़ुल्म व झूट वग़ैरा ज़ालिक हर हालत में बुरे हैं। और अदल व सदाक़त हर हालत में अच्छे हैं। अगर नेकी व बदी का मेयार इल्हाम ही होता तो उन लोगों को जिनको इल्हाम का इल्म तक नहीं है। क्योंकर उस का इल्म होता कि ज़ुल्म वगैरह बुरे हैं और अदल वग़ैरह अच्छे हैं।

बख़ुदा मेरा इरादा था कि इस तबाहकुन और मुख़र्रिब अख़्लाक़ मसअला से जो नताइज पैदा हुए उन सबको बिलाकम व कासित सपुर्द क़लम कर दूँ। लेकिन क्या करूँ फिर भी मुझे इस्लाम का ख़्याल है। मैं नहीं चाहता कि मौलवी सना-उल्लाह साहिब की ग़लती से इस्लाम का वो अहले हदीसाना पहलू पेश करूँ जिनको देखकर लोग महूव-हैरत हो जाएं।

काश कि मौलवी साहब के ज़हन में ये बात आ जाए कि ख़ुदा का ये काम नहीं है कि वो अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा ठहराए। बल्कि ख़ुदा का काम ये है कि जो चीज़ अच्छी है उसको अच्छी और जो बुरी है उसको बुरी बतला कर हमें अच्छी चीज़ों के इख़्तियार करने और बुरी चीज़ों से बचने का हुक्म दे और हर एक पर बिलतर्तीब जज़ा व सज़ा मुरत्तब करे।

जाअल जाइल के मुताल्लिक़ मौलवी साहब ने एक मिसाल पेश की है जो आप के लिए तो मुफ़ीद नहीं अलबत्ता हमारे लिए मुफ़ीद है। इस पर भी ज़रा ग़ौर कीजिए जो ये है :—

"इसकी मिसाल बिल्कुल ये है कि आक़ा अपने ग़ुलाम को हुक्म देता है कि एक साल तक तुम एक रुपया माहवार मुझे दिया करो तो मैं तुम आज़ाद कर दूँगा। आज़ादी के मुक़ाबला में एक रुपया फ़ी नफ्सिही कुछ चीज़ नहीं लेकिन (यजअल जाइल) मालिक के कहने से यही रुपया मूजिब आज़ादी हो गया।”

मैं थोड़ी देर के लिए तनज़लन ये तस्लीम करता हूँ कि आज़ादी के मुक़ाबले में एक रुपया फ़ी नफ्सिही कुछ चीज़ नहीं लेकिन इस रहम मुजस्सम "आक़ा" से तो पूछो कि क्या उस के नज़्दीक भी फ़िल-हक़ीक़त एक रुपया फ़ी नफ्सिही कुछ चीज़ नहीं है। अगर उस के नज़्दीक भी "माहवार एक रुपया" यानी बारह रूपये सालाना कुछ हक़ीक़त नहीं रखते हैं तो इस बेचारे ग़ुलाम को एक साल तक तक्लीफ़ में डाल देने से क्या फ़ायदा है रुपया लिए बग़ैर उसको क्यों आज़ाद नहीं करता है ! बग़ैर रूपयों के आज़ाद ना करना ही इसकी काफ़ी दलील है कि अगरचे मौलवी साहब के नज़्दीक बारह रूपये कुछ चीज़ नहीं" लेकिन इस के "आक़ा" के नज़्दीक बारह रूपये उस के ग़ुलाम की आज़ादी से ज़्यादा बेशक़ीमत हैं।

अगर दरहक़ीक़त इन तमाम मुआमलात में जाअल जाइल को दख़ल है तो फिर किस मुँह से आप कफ़्फ़ारे पर एतराज़ करने बैठ गए। क्योंकि हम भी तो यही कहते हैं कि ख़ुदा ही ने मसीह के कफ़्फ़ारा को रुहानी आज़ादी का सबब ठहराया है। आपकी मिसाल में लफ़्ज़ "रुपया" की जगह पर अगर आप लफ़्ज़ "मसीह का कफ़्फ़ारा" रखते तो आपकी मिसाल "बिल्कुल" कफ़्फ़ारा की ताईद में होती। देखिए ख़ुदा ए बरतर व तवाना ने किस तरह आप ही के क़लम से कफ़्फ़ारे की तस्दीक़ कराई।

मैंने अपने रिसाले "मैं क्यों मसीही हो गया" में इन अहादीस के मुताल्लिक़ जिनमें आँहज़रत सलअम ने ये फ़रमाया था कि "मैं भी अपने आमाल सालेहा से नजात नहीं पा सकता मगर ख़ुदा के रहम से" ये लिखा था कि अगर ख़ुदा इसी तरह रहम क्या करे और सब को मह्ज़ अपने रहम से बख़्श दिया करे तो फिर अम्बिया का मबऊस हो जाना, कुतुब समाविया का नाज़िल होना ये सब अबस ठहरेंगे। मौलवी साहब ने इस फ़िक़रा पर जिस मसर्रत का इज़्हार किया है वो आपकी जे़ल की इबारत से अयाँ है :—

"नाज़रीन फ़िक़रा ज़ेर ख़त को मल्हूज़ रखें आगे चल कर हम इस से कुछ काम लेंगे।”

(हाशिया अहले हदीस मत्बूआ 1929 ई. सफ़ा 3 कालम 2)

आपने मेरी इबारत बाला से अपनी समझ के मुवाफ़िक़ ये नतीजा निकाला है कि गोया में भी इस सफ़सता का क़ाइल हूँ जिनके मौलवी साहब क़ाइल हैं। यानी ये कि शरीयत और अम्बिया इस लिए आए ताकि एक चीज़ को नेक ठहराएँ। ख़्वाह वो चीज़ फ़ी नफ्सिही कैसी बद क्यों ना हो। बात ये है कि आप बड़े सुख़न-शिनास हैं। इस लिए आपने इबारत बाला से ये मज़हका ख़ेज़ नतीजा निकाला जो एक निहायत कम इस्तअदाद उर्दू ख्वाह भी नहीं निकालेगा हालाँकि अगर आप मेरी इबारत को पूरे तौर पर नक़्ल करते तो आपकी इस अजज़नुमा ख़ुशी की हक़ीक़त सब पर ज़ाहिर हो जाती। चूँकि आपने इस से गुरेज़ किया लिहाज़ा मज्बूरन में पूरी इबारत हद्या नाज़रीन करता हूँ। सुन लीजिए :—

"अगर ख़ुदा रहीम है तो वो आदिल भी है। अगर ख़ुदा सिर्फ अपने रहम से माफ़ कर दे तो सिफ़त अदल मुअत्तल रहेगी और तअत्तुल से ख़ुदा की ज़ात में नुक़्स वारिद होगा। जो ख़ुदा की शान के शायां नहीं। पस रहम से नजात कामिल पाना मुहाल अक़्ल है और ख़ुदा ऐसा करता है तो ख़ुदा सिर्फ मुसलमानों का ख़ुदा तो है नहीं वो कुल इन्सान और माफीअलकुन का ख़ुदा है। लिहाज़ा उसकी रहमत कुल के लिए होना चाहिए। यानी वो मुशरिकों और बुतपरस्तों वग़ैरा पर भी रहम करना लाज़िम है। लेकिन ख़ुदा मुशरिकों और बुत परस्तों को माफ़ नहीं करता। और अम्बिया का मबऊस हो जाना कुतुब समावी का नाज़िल होना ये सब अबस ठहरेंगे। चूँकि ये अबस नहीं पस रहम से नजात की तवक़्क़ो रखना ग़लत है।”

(मैं क्यों मसीही हो गया सफ़ा 38)

अब ख़ुद नाज़रीन इन्साफ़ फ़रमाएं कि मैं क्या कहता हूँ और मौलवी साहब क्या सुनते हैं। जवाब से आजिज़ आ कर टालमटोल करना मौलवी साहब की आदत है।

फ़स्ल दहुम

मौलवी सना-उल्लाह साहिब के कफ़्फ़ारे पर एतराज़ात और क़ुरआन व हदीस से कफ़्फ़ारे का सबूत

मौलवी साहब ने नूरअफ़शां (9 नवम्बर 1928 ई.) में से साबिक़ ऐडीटर यानी डाक्टर हश्मत- उल्लाह साहिब के एक मज़्मून में से जो कफ़्फ़ारे पर था एक इक़्तिबास किया है। आप इसी इक़्तिबास की बिना पर लिखते हैं कि :—

"मगर उनमें एक नुक़्स या सहल अंगारी ये है कि इन मुसन्निफ़ों ने इस अम्र का फ़ैसला नहीं किया कि शरई गुनाह फ़ौजदारी केस है या दीवानी ? मसलन बदकारी की सज़ा शराअ में जहन्नम की क़ैद है या माली जुर्माना है। कुछ शक नहीं कि हज़रात अम्बिया अलैहिसलाम की शरीयत में गुनाहों का मुक़द्दमा फ़ौजदारी केस है तो फ़ौजदारी में अस्लुल उसूल क़ानून है कि जो करे वो ही भरे !

(अहले हदीस 7 दिसंबर 1928 ई. सफ़ा 3)

मौलवी साहब फ़रमाते हैं कि शरई गुनाह फ़ौजदारी केस है। और फ़ौजदारी की तारीफ़ "जहन्नम की क़ैद" है और फ़ौजदार में अस्लुल-उसूल क़ानून "ये है कि जो करे वही भरे" यानी जो शख़्स गुनाह करता है वही शख़्स सीधा जहन्नम में जाता है और इस से कोई मुआवज़ा या माली जुर्माना नहीं लिया जाता है। अगर मैं साबित कर दूँ कि जो कुछ मौलवी साहब लिख रहे हैं क़ुरआन व हदीस के मुनाफ़ी लिख रहे हैं तो फिर मज़ीद लिखने की ज़रूरत ना होगी।

क़ब्ल इसके कि मैं क़ुरआन शरीफ़ और अहादीस में से शवाहिद पेश करूँ मुनासिब मालूम होता है कि ये भी गोश गुज़ार कर दूँ कि नफ़्स कफ़्फ़ारा पर मसीहीय्यत और इस्लाम दोनों मुत्तफ़िक़ हैं। सिर्फ इसकी नौईय्यत में इख़्तिलाफ़ है मसीहीय्यत मसीह को कफ़्फ़ारा मानती है और इस्लाम और चीज़ों को। क़ुरआन शरीफ़ की जे़ल की आयतें मुलाहिज़ा हूँ :—

(1)

لاَ يُؤَاخِذُكُمُ اللّهُ بِاللَّغْوِ فِي أَيْمَانِكُمْ وَلَـكِن يُؤَاخِذُكُم بِمَا عَقَّدتُّمُ الأَيْمَانَ فَكَفَّارَتُهُ إِطْعَامُ عَشَرَةِ مَسَاكِينَ مِنْ أَوْسَطِ مَا تُطْعِمُونَ أَهْلِيكُمْ أَوْ كِسْوَتُهُمْ أَوْ تَحْرِيرُ رَقَبَةٍ فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلاَثَةِ أَيَّامٍ ذَلِكَ كَفَّارَةُ أَيْمَانِكُمْ إِذَا حَلَفْتُمْ وَاحْفَظُواْ أَيْمَانَكُمْ كَذَلِكَ يُبَيِّنُ اللّهُ لَكُمْ آيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ

(सुरह माइदा आयत 91)

तर्जुमा: अल्लाह तआला तुमसे मुवाख़िज़ा नहीं फ़रमाता। तुम्हारी कसमों में लगू क़सम पर लेकिन मुवाख़िज़ा इस पर फ़रमाता है कि तुम कसमों को मुस्तहकम कर दो। सो इसका कफ़्फ़ारा दस मुहताजों को खाना खिला देना है औसत दर्जे का जो अपने घर वालों को दिया करते हो या उनको कपड़ा देना या एक ग़ुलाम या लौंडी आज़ाद करना। और जिस को मुक़द्ददर ना हो तो तीन दिन के रोज़े हैं ये कफ़्फ़ारा है तुम्हारी कसमों का जबकि तुम खालो और अपनी कसमों का ख़्याल रखा करो। इसी तरह अल्लाह तुम्हारे वास्ते अपने अहकाम बयान फ़रमाता है ताकि तुम फ़िक्र करो।”

आयत बाला से साफ़ ज़ाहिर है कि क़सम खाकर पूरा ना करना क़ाबिल मुवाख़िज़ा गुनाह है। जो बक़ौल मौलवी साहब ऐसे शख़्स को सीधा जहन्नम में जाना चाहिए लेकिन क़ुरआन शरीफ़ उस को "माली जुर्माने" पर छोड़ देता है।

(2)

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ لاَ تَقْتُلُواْ الصَّيْدَ وَأَنتُمْ حُرُمٌ وَمَن قَتَلَهُ مِنكُم مُّتَعَمِّدًا فَجَزَاء مِّثْلُ مَا قَتَلَ مِنَ النَّعَمِ يَحْكُمُ بِهِ ذَوَا عَدْلٍ مِّنكُمْ هَدْيًا بَالِغَ الْكَعْبَةِ أَوْ كَفَّارَةٌ طَعَامُ مَسَاكِينَ أَ و عَدْلُ ذَلِكَ صِيَامًا لِّيَذُوقَ وَبَالَ أَمْرِهِ عَفَا اللّهُ عَمَّا سَلَف وَمَنْ عَادَ فَيَنتَقِمُ اللّهُ مِنْهُ وَاللّهُ عَزِيزٌ ذُو انْتِقَامٍ

(5:96)

तर्जुमा: ऐ ईमान वालो जंगली शिकार को क़त्ल मत करो। जबकि तुम हालत एहराम में हो। और जो शख़्स तुम में से इस को जान-बूझ कर क़त्ल करेगा तो इस पर पादाश वाजिब होगी जो मिस्बा दी होगी इस जानवर के जिसको इसने क़त्ल किया है जिसका फ़ैसला तुम में से दो मोअतबर शख़्स कर दें ख़्वाह वो पादाश ख़ास चौपायियों से हो। बशर्ते के नयाज़ के तौर पर काअबा तक पहुंचाई जाये। और ख़्वाह कफ़्फ़ारा मसाकीन को दे दिया जाये और ख़्वाह उस के बराबर रोज़े रख लिए जाएं ताकि अपने किए की शामत का मज़ा चखे और अल्लाह तआला ने गुज़शता को माफ़ कर दिया। और ये शख़्स फिर ऐसी हरकत करेगा तो अल्लाह तआला इंतिक़ाम लेगा और अल्लाह ज़बरदस्त से इंतिक़ाम ले सकता है।”

इस आयत से आप अंदाज़ा कर सकते हैं कि बहालत एहराम शिकार का क़त्ल करना सख़्त गुनाह है। जिसके मुर्तक़िब को बक़ौल मौलवी साहब सीधा जहन्नम में जाना चाहिए था। लेकिन क़ुरआन शरीफ़ उस को "माली जुर्माने" पर छोड़ देता है। मैं मह्ज़ अदम गुंजाइश की वजह से इन्ही दो आयतों पर इक्तिफ़ा करता हूँ। वर्ना क़ुरआन शरीफ़ में ऐसी बीसियों आयतें हैं जिनसे मौलवी साहब की क़ुरआन दानी की हक़ीक़त वाज़ेह तर हो जाती है।

यहां तक क़ुरआन शरीफ़ में से कफ़्फ़ारे का सबूत था। अब अहादीस की तालीम मुलाहिज़ा हो

(1)

وعن ابی موسیٰ قال قال رسول اللہ صلے اللہ علیہ وسلم اذاکان یوم القیمتہ دفع اللہ الی کل مسلم یہود او نصرانیا فیقول ھذا فکاک من الناررواہ مسلم

(मिश्कात सफ़ा 485)

तर्जुमा: अबू मूसा ने कहा कि आँहज़रत सलअम ने फ़रमाया कि क़ियामत के दिन अल्लाह हर एक मुसलमान को एक यहूदी या ईसाई देकर कहेगा कि ये तुझको आग से रिहाई देने का बदला है। इस हदीस को मुस्लिम ने रिवायत की है।”

मौलवी साहब देखिए तो ये कहाँ का इन्साफ़ और "फ़ौजदारी केस" है कि गुनाह तो करें मुसलमान और यहूदी या ईसाई बेचारे उनके बदले दोज़ख़ में जाएं।

(2)

عن سلمان بن عامر الضبی قال سمعت رسول صلی اللہ علیہ وسلم یقول مع الغلام عقیقتہ فاھر یقوا عنہ دماوا میطوواعنہ الاذی رواہ البخاری

(मिश्कात 362)

तर्जुमा" सलमान बिन आमिर अलज़बी ने कहा कि मैंने आँहज़रत सलअम को ये फ़रमाते हुए सुना कि लड़के की पैदाइश के साथ अक़ीक़ा करना लाज़िमी है। पस उन के एवज़ में ख़ून बहाओ (गोस्फ़ंद ज़बह करो) और इस से ईज़ा को दूर करो। इस हदीस को बुख़ारी ने रिवायत की है।

क्या मौलवी साहब "फ़ौजदारी केस" के यही मअनी हैं कि ईज़ा तो हो लड़के को और ज़बह किया जाये गोस्फ़ंद? क्या मैं मौलवी साहब से पूछ सकता हूँ कि हदीस बाला में ईज़ा से किया मुराद है? क्या इस गुनाह की अज़ीयत तो नहीं जो हज़रत आदम से दरअसना चली आई है। ज़रा एहतियात के साथ क़लम उठाइए। ऐसा ना हो कि फिर आपको नापीदार किनार मसाइब का सामना करना पड़े।

अफ़्सोस तो ये है कि मौलवी साहब ने और मुसलमानों की तरह कफ़्फ़ारे पर ठंडे दिल से कभी ग़ौर नहीं किया। वर्ना कफ़्फ़ारे का सबूत हमारी रोज़ मर्राह ज़िंदगीयों में इस सफ़ाई के साथ मिलता है जिससे कोई शख़्स बशर्ते के तास्सुब से इस का दिल आलूदा ना हो इन्कार नहीं कर सकता है। एक लायक़ बाप अपनी तमाम ज़िंदगी अपने अहल व अयाल की बहयुदी के लिए सर्फ करता है। एक घर में जब कोई शख़्स बीमार हो जाता है तो इस की बीमारी को इस के तमाम मुताल्लिक़ीन इस तरह बांट लेते हैं कि कोई डाक्टर बुला लाता है कोई दाई बुलाता है। कोई उस के साथ जागता रहता है। कोई तसल्ली देता, ग़रज़ कि एक शख़्स की तक्लीफ़ और बीमारी से तमाम घर तक्लीफ़-दह और बीमार बन जाता है। अगर उस के मुताल्लिक़ीन मौलवी साहब के इस सुनहरे उसूल पर अमल करें कि "जो करे वो भरे" तो इस बीमार का ख़ुदा ही हाफ़िज़ है। दुनिया से हमदर्दी, ईसार, और मुहब्बत इसी तरह मफ़्क़ूद हो जाएं जिस तरह मौलवी साहब के दिमाग़ से क़ुरआन शरीफ़ व अहादीस के सही मफ़्हूम मफ़्क़ूद हैं।

इस्लाम का तरीक़ा नजात

आगे चल कर मौलवी साहब लिखते हैं कि :—

"यहां हम सिर्फ इतना अर्ज़ करते हैं कि

  1. अगर यही तरीक़ नजात है तो पहले नबियों की उम्मतों की नजात किस तरह होगी ?
  2. अगर यही तरीक़ नजात ख़ुदा के हाँ मुक़र्रर था तो शुरू दुनिया में सबसे पहले नबी पर इस को क्यों ज़ाहिर ना किया?
  3. अगर ज़रीया नजात मसीह की मौत है तो फिर मसीही होने की क्या ज़रूरत है। ख़ुदा ने सब गुनाहों की बख़्शिश का इंतिज़ाम फ़रमाया किसी ख़ास गिरोह का नहीं
  4. मह्ज़ मसीही कफ़्फ़ारा काफ़ी है तो युहन्ना रसूल क्यों कहते हैं :—

जो कहता है कि मैं उसे मानता हूँ और उसके हुक्मों पर अमल नहीं सो झूटा है और सच्चाई इसमें...हर वो जो उस के कलाम पर अमल करे यक़ीनन उसमें ख़ुदा की मुहब्बत है" (1 युहन्ना बाब 2 आयत 3 अहले-हदीस मत्बूआ 14 दिसंबर 1928 ई. सफ़ा 2)

एतराज़ अव्वल का जवाब

जब तक मसीह कफ़्फ़ारा नहीं हुए थे उस वक़्त "पहले नबियों की उम्मतों की नजात" उन ज़िल्ली क़ुर्बानीयों की बिना पर होगी जिनको उन के अम्बिया ने ख़ुदा के हुक्म से उनमें जारी फ़रमाया था। यही वजह है कि दुनिया के तमाम मज़ाहिब क़दीमा में क़ुर्बानी मुख़्तलिफ़ सूरतों में मौजूद है।

एतराज़ दोम का जवाब

उसूल इर्तिक़ा के बमूजब ख़ुदा ने अव्वल से लेकर आख़िर तक हर एक नबी पर इस को ज़ाहिर फ़रमाया है। यहां तक कि आख़िरी अम्बिया के क़ुतुब में मसीह के कुल वाक़ियात हू-ब-हू मौजूद हैं।

एतराज़ सोम का जवाब

बे-शक ख़ुदा ने सब गुनाहों की बख़्शिश का इंतिज़ाम फ़रमाया है। लेकिन इस इंतिज़ाम से वही शख़्स फ़ायदा उठा सकता है जो इस को क़बूल करता है। मसलन ख़ुदा ने सारी दुनिया के लिए हवा और रोशनी का इंतिज़ाम फ़रमाया है। लेकिन उनसे वही शख़्स बहरा अंदाज़ हो सकता है जो हवा में सांस ले और रोशनी में आँखों से काम ले। अगर कोई शख़्स हवा में सांस ना ले। और रोशनी में अपनी आँखों पर पट्टी बांध ले तो हवा और रोशनी से इसको कुछ फ़ायदा नहीं पहुंच सकता है।

एतराज़ चहारुम का जवाब

मुफ़स्सिल दे चुके हैं। यहां इआदा की ज़रूरत नहीं है।

मौलवी साहब हम पर एतराज़ करते हुए लिखते हैं कि :—

"मुख़्तसर यह है कि पादरी साहिब के हक़ में हमने ये समझा कि "आप मुफ़्तखोरी के लिए मसीही हुए हैं।” क्योंकि इस्लाम बल्कि कुल अदयान में नेक-आमाल करने की ताकीद है। और मुरव्वजा ईसाई में इन की ज़रूरत नहीं।” (अहले-हदीस मत्बूआ 14 दिसंबर 1928 ई. सफ़ा 3)

मैं आमाल की ज़रूरत और इस की अहमीय्यत पर गुज़शता औराक़ में मुफ़स्सिल तौर पर लिख चुका हूँ। सिर्फ ये गुज़ारिश करना बाक़ी है कि "मसीहीय्यत में मुफ़्तखोरी" हराम है। अलबत्ता इस्लाम ने उसको शेर मादर की तरह हलाल फ़रमाया है कि :—

قُلْ يَا عِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَى أَنفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ

جَمِيعًا إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ

(क़ुरआन 39:54)

तर्जुमा: ऐ मेरे बंदो जिन्होंने ज़्यादती की है अपनी जान पर ख़ुदा की रहमत से ना उम्मीद मत हो। तहक़ीक़ अल्लाह बख़्शता है तमाम गुनाहों को बेशक ख़ुदा माफ़ करने वाला और मेहरबान है” यानी जितने जी चाहे गुलछर्रे उड़ाते रहो। कुछ फ़िक्र नहीं। ख़ुदा सबको बख़्श देगा।

हदीस जे़ल भी मुलाहिज़ा हो :—

وعن ابی ذ ر قال اتیت النبی صلی اللہ علیہ وسلم وعلیہ ثوب ابیض وھو نائمہ ثمہ اتیتہ وقد استقیط فقال مامن عبد قال لاالااللہ ثمہ مات عاذالک الادخل الجنتہ قلت وان زنی وان سرق قال وان زنی وان سرق قلت وان زنی وان سرق قال وان زنی وان سرق قلت وان زنی وان سرق قال وانی زنی وان سرق علےٰ رغمہ انف ابی ذرٍ   وکان ابوذر اذا حدث بھذا قال وان رغمہ انف ابی ذر متفق علیہ۔

तर्जुमा: "अबी ज़र ने कहा मैं आंहज़रत सलअम के पास आया आप सो रहे थे और आप पर सफ़ैद कपड़ा था। जब मैं फिर आया तो आप जागते थे। आपने फ़रमाया कि हर एक बंदा जो ला इलाहा इलल्लाह कहे और इस पर मर जाये वो जन्नत में दाख़िल होगा। मैंने कहा कि अगरचे वो चोर या ज़िनाकार हो? आपने कहा अगरचे चोर या ज़ानी हो। फिर मैंने कहा कि अगरचे वो चोर या ज़ानी हो? आपने फ़रमाया अगरचे चोर या ज़ानी हो। फिर मैंने कहा अगरचे वो चोर या ज़ानी हो? आपने कहा अगरचे वो चोर या ज़ानी हो। अगरचे ये बात अबूज़र को नागवार मालूम होती है" (मिश्कात किताब अल-ईमान)

कहिए इस से बढ़कर मुफ़्तखोरी आपको कहीं और मिल सकती है।

मेरे रिसाले" मैं क्यों मसीही हो गया" में ऐसी चंद हदीसें और हैं जिनके जवाब से मौलवी साहब ऐसे ख़ामोश हैं कि गोया उनकी जान में जान नहीं। मुलाहिज़ा हो सफ़ा 35,36)

इस्लाम में तरीक़ा नजात

इस के बाद मौलवी साहब इस्लाम का तरीक़ा नजात पेश करते हुए लिखते हैं कि :—

  1. इस्लाम में एक तरीक़ नजात तो अक्सरीयत आमाल सालेहा का है।”
  2. दूसरा अक्सरीयत इज्तिनाब अज़ मआसी है यानी जो शख़्स अक्सर हालात में बड़े बड़े गुनाहों से बचता रहेगा वो नजात पा जाएगा"
  3. बिल्कुल आसान और पादरी साहिब के हस्बे-मन्शा है कि तालिब नजात इन्सान रोज़ाना अपने गुनाहों पर ग़ौर करके ख़ुदा के हुज़ूर ख़ालिस तौबा क्या करे तो ख़ुदा उस की तौबा को क़बूल करके बख़्श देगा" (अहले-हदीस 12 अक्तूबर 1928 ई. सफ़ा 3)

तरीक़ा अव्वल के मुताल्लिक़ हम काफ़ी से ज़्यादा बह्स करके साबित कर चुके हैं कि :—

अक्सरीयत आमाल सालेहा से कोई मुसलमान नजात नहीं पा सकता है। और मौलवी साहिब ने भी इस को तस्लीम कर लिया है कि "आमाल अपनी ज़ाती हैसियत से हरगिज़ मूजिब नजात नहीं" (अहले-हदीस 9 नवम्बर 1928 ई. सफ़ा 3)

तरीक़ दोम भी बातिल है। अव्वल तो इस लिए कि मौलवी साहब का इंदीया इस आयत के मुनाफ़ी है कि فَمَنْ يَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّۃٍ خَيْرًا يَّرَہٗ وَمَنْ يَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّۃٍ شَرًّا يَّرَہٗ   जिस पर हम मुफ़स्सिल बह्स कर चुके हैं। दोम इसलिए कि क़ुरआन शरीफ़ में कबाइर का तअय्युन और हिस्र नहीं है और ना अहादीस से इस पर रोशनी पड़ती है और ना किसी आलिम ने आज तक उनका हिस्र और तअय्युन बताया। बाअज़ के नज़्दीक कबाइर की तादाद 72 है। और बाअज़ के नज़्दीक सौ से भी ज़्यादा और बाअज़ के नज़्दीक इस से भी कम है। पस जब तक आप पहले उस का तअय्युन और हिस्र साबित ना करें। उस वक़्त तक आप कबाइर के तर्क पर नजात की बुनियाद नहीं रख सकते हैं।

तरीक़ सोम के मुताल्लिक़ ये अर्ज़ है कि मैं साबित कर चुका हूँ कि ख़्वाह आप तौबा करें या ना करें ख़्वाह आप नेक हों या बद हों एक बार आप का दोज़ख़ में तशरीफ़ ले जाना अज़बस ज़रूरी है। वस्सलाम


बिलआखिर में अपने दोस्त प्यारे मौलवी साहब का बेहद शुक्रगुज़ार हूँ कि आपके तुफ़ैल से मेरे रिसाले " मैं क्यों मसीही हो गया" के मज्मलात और इशारात मुफ़स्सिल और वाज़ेहतर हो गए। ना आप उस के जवाब की ज़हमत गवारा फ़रमाते और ना में इस की तफ़्सील और तौज़ीह करता। ये भी ख़ुदा की मर्ज़ी थी जो पूरी हो गई।

मैंने ये वाअदा किया था कि इस मज़्मून के आख़िर में मौलवी साहब की सवानिह उमरी लिखूंगा मैंने आपकी सवानिह उमरी बिल्कुल मुरत्तब कर ली है। लेकिन बजाय इसके कि हम इसको अपने रिसाले में शाया करें बेहतर यही है कि हम इस को शायाअ ही ना करें। क्योंकि किसी की ज़ात पर हमला करना हमारी आदत नहीं। ये वतीरा क़ादियानीयों और वहाबियों को मुबारक रहे।

ततिम्मा

घर से आया है मोअतबर नाई


 

Golden Fort Jaisalmer
स्वर्ण किले जैसलमेर

 

जैसा कि एक मुसलमान के हवाला से मैंने लिखा है कि जबकि वहाबियों की बदज़ुबानी सयाबी और फ़ह्हाशी से ख़ुद उन के बुज़ुर्गान औलिया अम्बिया महफ़ूज़ नहीं रहे। तो एक ईसाई क्या और उसकी हैसियत क्या। जो उन की ज़बान शतम आफ़रीं से महफ़ूज़ रह सके। अली-उल-ख़ुसूस वो शख़्स जिसके ईसाई होने से उनके घर मातमकदा बन गए हों और जिस के क़लम से मौलवी सना-उल्लाह साहिब जैसे शख़्स की जो इस फ़िर्क़ा के शेर बे-दम में ऐसी फ़ज़ीहत और रुस्वाई हुई हो जिनको मरते दम तक भूल ना सकते हों इस फ़िर्क़ा से कभी हुस्न-ए-खुल्क की तवक्को नहीं हो सकती है जब इस शेर रेश दराज़ को अपने किए का ख़मयाज़ा भुगतना पड़ा और हमारे रिसाले " मैं क्यों मसीही हो गया" के जवाब से सरासर क़ासिर और ख़ासिर रह गया तो बजाय इसके कि अपनी बे-बज़ाअती और बेपायगी पर ख़ून के आँसू बहाना या दुम दबाकर अमृतसर की किसी मस्जिद के हुजरे में दुबक जाता उल्टा हमें मोर व तअन बनाया ताकि अवाम काला-तआम की तवज्जा उस की शिकस्त और शर्मसारी से हट कर ज़ातियात की तरफ़ मबज़ूल हो जाए।

मैं सच्च अर्ज़ करता हूँ कि मुझको ऐसों के मुताल्लिक़ कुछ शिकायत नहीं है क्योंकि उन लोगों का जो किसी हक़ीक़ीत के साबित करने से आजिज़ रहे जाते हैं ये आम दस्तूर है कि वो अपनी जहालत और ज़लालत पर गाली गलोच और आमियाना दसुकियाना तानों का पर्दा डालने की कोशिश करते हैं लेकिन हक़ीक़त शनास मालूम कर लेते हैं कि हज़रत कितने पानी में हैं बईना मौलवी सना-उल्लाह साहिब का यही हाल है।

आपका एक मोअतबर नाई (ख़बररसां) बंबई में रहता है जिसका ताल्लुक़ इसी नज्दी फ़िर्क़ा से है और जिस का पेशा गाड़ीयों का रंगना और इस से क़ब्ल बंबई के किसी थेटर में पर्दों के रंगने का काम करता था और जिस का नाम अब्दुल रऊफ है और पंजाब के किसी गांव का रहने वाला है इस मोअतबर नाई को मौलवी सना-उल्लाह ने लिखा था कि हमारे बंबई के रहने के वाक़ियात लिख भेजे। क्योंकि इस शख़्स का नाम हमारे रिसाले "मैं क्यों मसीही हो गया" में भी आ गया है।

मौलवी सना-उल्लाह साहिब को यक़ीनन ये ख़्याल हुआ होगा कि हमारी ज़िंदगी के मुताल्लिक़ उनको बहुत सी ऐसी बातें मिलेंगी जो हमारी बदनामी और बेइज़्ज़ती के लिए दलील का काम देंगी। लेकिन ख़ुदा के फ़ज़्ल से चूँकि हमारी ज़िंदगी का दामन इस किस्म के तमाम बदनुमा दाग़ों से आईने की तरह साफ़ और शफ़्फ़ाफ़ है उनके मोअतबर नाई को ये जुरआत नहीं हुई कि इस किस्म के अतहामात और इल्ज़ामात हम पर चस्पाँ करता है जिस तरह कि मुसन्निफ़ आईना हक़ीक़त नुमा ने मौलवी साहब पर चस्पाँ किया है। लिहाज़ा जो कुछ इस मोअतबर नाई ने मौलवी सना-उल्लाह साहिब को लिखा ये लिखा कि :—

  1. सुल्तान मुहम्मद का असली नाम सुल्तान अहमद है।
  2. सुल्तान मुहम्मद के क़दम बग़रज़ तालीम मिनारा वाली मस्जिद में आए और मस्जिद की रोटियों पर औक़ात बसर करने लगा।”
  3. (सुल्तान मुहम्मद बानी अंजुमन ना था...........लेकिन मुम्किन है कि सुल्तान मुहम्मद किसी कोने में बैठ कर तक़रीरें सुनता हो।”
  4. असल वाक़िया ये है कि 1903 ई. में जलसा बंद करके मैं दौरा पर गया था। जब वापिस आया तो मालूम हुआ कि मिनारा वाली मस्जिद का मामूली तालिब इल्म ईसाई हो गया। तहक़ीक़ करने से साबित हो कि सुल्तान मुहम्मद मंसूर मसीह का बेटा बन कर बपतिस्मा लेकर हमीरपुर पादरी अहमद शाह कानपूरी के पास चला गया। मिनारा वाली मस्जिद के तलबा से ये भी मालूम हुआ कि मस्जिद की रोटियों के लिए अक्सर शिकायत किया करता था। कपड़े वग़ैरा की इस को सख़्त तक्लीफ़ थी बाअज़ मेमनों ने बलिहाज़ हमदर्दी रूपये क़र्ज़ दिए थे। बाअज़ लोग रूपयों का तक़ाज़ा करते थे जिसके सबब हमेशा परेशान रहता था। मंसूर मसीह निहायत तजुर्बेकार और चालाक मिशनरी था। उसने उस की नादारी और ग़ुर्बत देखकर हमदर्दी की। ये उसके मकान पर आने जाने लगा और उसने उसको तर्ग़ीब दी। ये ना तजुर्बाकार और शबाब का आलम गिरजा में.........की आमद-ओ-रफ़्त का मंज़र देखकर अज़ ख़ुदरफ़्ता हुआ और किसी ख़ास ग़रज़ से ईसाई हो कर यहां से चल दिया। मुम्किन है कि इस की दिली आरज़ू बुराई हो।” (अहले हदीस 21 दिसंबर 1928 ई. सफ़ा 2)
  5. तीन चार साल बाद बड़े दिनों की तअतील में वो अपने (मस्नूई) बाप मंसूर मसीह को मिलने आया। जिसका क़र्ज़ था अदा किया। बाद वापिस कानपुर चला गया" (अहले हदीस 21 दिसंबर 1928 ई. सफ़ा 2)
  6. (6) और पादरी जोज़फ बिहारी लाल अगरचे मिशन से अलीहदहा हैं ताहम वो भी तक ईसाई हैं। सुल्तान मुहम्मद की तरह के तालिब नहीं हैं मेरे बयान की तस्दीक़ करेंगे कि जो कुछ मैंने लिखा है दरुस्त है (अहले हदीस 21 दिसंबर 1928 ई. सफ़ा 3)

शक़्क़ अव्वल का जवाब ये है कि इस मोअतबर नाई का ये लिखना मेरा नाम "सुल्तान अहमद" था सरासर झूट और सफ़ैद झूट है जिसकी दलाईल हस्ब-ज़ैल हैं :—

(अलिफ़) मेरे ईसाई होने से बहुत पहले मैंने मौलवी ग़ुलाम नबी साहिब बाशिंदा अमृतसर की एक तस्नीफ़ पर जो ईसाईयों के रद्द में थी फ़ारसी में रिव्यू लिख कर उनको भेजा था इस रिव्यू में मेरा दस्तख़त (सुल्तान मुहम्मद) है। ना कि सुल्तान अहमद "मौलवी सना-उल्लाह साहिब ! मौलवी ग़ुलाम नबी साहिब आपके शहर और पड़ोस में रहते हैं आप जाकर वो रिव्यू अपनी आँख से देखें ताकि सयादर के शोदहर कि दर्द ग़श बाशनद।

(ब) मेरे ईसाई होने से चंद माह पेशतर मैंने पादरी मौलवी हुसाम उद्दीन साहिब ऐडीटर कशफ़- उल-हक़ाइक़ के एक मज़्मून का जो इस्लाम के बरख़िलाफ़ था जवाब लिखा था मैंने इस जवाब को रिसाला अल-हक़ में जो कानपूर से पादरी अहमद शाह साहिब शाईक़ की इदारत में शायाअ होता था शायाअ किया था इस में भी मेरा दसख़तत "सुल्तान मुहम्मद" है ये मज़्मून 1930 ई. की फ़िल में आपको मिलेंगे।

(ज) इस वक़्त तक अफ़्ग़ानिस्तान से मेरे नाम जितने ख़ुतूत आए हैं इन सब में मेरा नाम सुल्तान मुहम्मद है। मसलन ग़ुलाम मंज़र ज़ी वज़ीर ख़ारजिया दौरामान्या अफ़्ग़ानिस्तान I  मुल्ला ग़ुलाम मुहम्मद ख़ां वज़ीर-ए-तिजारत अफ़्ग़ानिस्तान, वबादा वज़ीर-ए-दाख़िला अफ़्ग़ानिस्तान दौर अमान्य जो मेरे चचा हैं। वज़ीर साहिब मआरिफ़ अफ़्ग़ानिस्तान दौर अमान्य शहज़ादा इनायतउल्लाह ख़ां वग़ैरा हम जितने अराकीन ने मुझसे ख़त-ओ-किताबत की है। इन सभों ने मुझको सुल्तान मुहम्मद लिखा है। क्योंकि मेरा पैदाइशी नाम अफ़्ग़ानिस्तान के सरकारी दफ़्तर में यही है।

(द) मेरे छोटे भाई ताज मुहम्मद ख़ां और मेरी हमशीरा और दीगर अका़रिब रिश्तादारां मुझ को हमेशा सुल्तान मुहम्मद कहते हैं। ये तमाम ख़ुतूत मेरे पास फ़ारसी ज़बान में मौजूद हैं।

(ह) मेरे वालिद बुजु़र्गवार की जागीरों और क़िलों की तमाम तमकात और क़िबाला जात में जो मेरे नाम पर हैं मेरा नाम सुल्तान मुहम्मद है।

मैं मौलवी सना-उल्लाह साहिब को चैलेंज करता हूँ कि वो मेरे किसी ख़त से ख़्वाह मेरे मसीही होने से क़ब्ल का हो या बाद का मेरा नाम सुल्तान अहमद साबित करें। अगर उन्होंने मेरा नाम सुल्तान अहमद साबित किया तो जो सज़ा मुक़र्रर करें मैं क़बूल करूंगा वर्ना उन के लिए जो सज़ा मैं मुक़र्रर करूँ वो बर्दाश्त करें।

क्या अब भी आपके मोअतबर नाई के झूटे होने में कोई शक व शुबहा बाक़ी है।

शक़्क़ दोम का जवाब ये है कि ये भी सरासर झूट और किज़्ब है कि मैंने मिनारा वाली मस्जिद में 1903 ई. में तालीम पाई है। क्योंकि इन दिनों मिनारा वाली मस्जिद में कोई अरबी का मदरिसा ना था और ग़ालिबन अब भी नहीं है। बल्कि मैंने मदरिसा ज़करिया में तालीम पाई है और ख़ासकर मौलवी अब्दुल अहद साहिब से जो काबुली थे और मदरिसा ज़करिया में मुदर्रिस थे। जैसा कि मैंने अपने रिसाले में ज़िक्र किया है। दूसरी दलील ये है कि नद्वह मुतकल्लिमीन के तमाम अराकीन जिनका मैंने अपने रिसाले में ज़िक्र किया कि मुंतही-तालिब-इल्म थे। उनमें से एक भी मिनारा वाली मस्जिद से ताल्लुक़ नहीं रखते थे। क्योंकि उस वक़्त मिनारा वाली मस्जिद में कोई मदरिसा था ही नहीं। मैं आपके मोअतबर नाई को चैलेंज करता हूँ कि वो साबित करें कि इन अय्याम में जिनका मेने ज़िक्र किया है मिनारा वाली मस्जिद में कोई मदरिसा भी था। ये भी झूट है कि मैं 1902 ई. में आया बल्कि में बंबई में 1892 ई. या 1893 ई. में आया था क्योंकि मैं 1903 ई. तक मुसलसल छः सात साल बंबई में रह चुका हूँ। आपके मोअतबर नाई ने ये भी झूट लिखा है कि "मैं मदरिसा की रोटियों पर औक़ात बसर करता था।” क्योंकि मैं किसी मदरिसा में बोर्डर नहीं रहा बल्कि टीयूशन और तबाबत से अपना गुज़ारा करता था। और ख़ुदा के फ़ज़्ल से इस क़दर आमदनी थी कि मैंने अपनी आमदनी से हज किया और वापिस आया। अगर में ऐसा ग़रीब होता जैसा कि आपके मोअतबर नाई ने ज़ाहिर किया है तो मैं ना हज पर जा सकता था और ना ही वापिस आ सकता था।

ये आपके मोअतबर नाई का दूसरा झूट है क्या ऐसा झूटा आदमी काबिल-ए-एतिबार हो सकता है। आप तो अहले हदीस में से हैं रावियों की जरह के तरीक़ से ख़ूब वाक़िफ़ हैं। ज़रा देर के लिए सर गिरेंबां में डाल कर सोचिए।

शक़्क़ सोम का जवाब ये है कि दरहक़ीक़त में ही ज़िया-उल-इस्लाम और नद्वह मुतकल्लिमीन का बानी था। आपके मोअतबर नाई ने बजुज़ इंकार के इस की कोई तर्दीद नहीं कि जबकि मैंने साबित कर दिया है कि आपका मोअतबर नाई परले दर्जे का झूटा है तो ऐसे झूटे शख़्स के इन्कार से किसी हक़ीक़त की तर्दीद नहीं हो सकती है।

दीगर ये कि जिस वक़्त में मसीही हो गया उसी वक़्त कानपूर रवाना किया गया और कानपूर आते ही मैंने सबसे अव्वल अपीफ़ेनी में जो एक निहायत मशहूर-ओ-मारूफ़ अंग्रेज़ी मज़्हबी अख़्बार है अपने मसीही होने की कैफ़ीयत लिखी। जिसका जवाब बंबई से एक मुसलमान ने लिखा। इस मुसलमान ने मुझ पर दो एतराज़ किए थे। अव्वल ये कि "जब मैं मुसलमान था तो अंग्रेज़ी नहीं जानता था। अब दो तीन महीनों के अरसा में मुझको अंग्रेज़ी किस तरह आ गई।” दूसरा एतराज़ ये था कि "जब तक मैं बंबई में रहता था तो मैंने अपने वालिद का नाम किसी को नहीं बतलाया था। अब अपीफ़ेनी में मैंने क्यों ज़ाहिर कर दिया।” जिसका जवाब-उल-जवाब मैंने अपीफ़ेनी में दिया। अगर बंबई में मेरी वही हालत थी जो मोअतबर नाई बयान करता है तो ये शख़्स वही बयान करता हालाँकि उनमें से एक का भी उसने ज़िक्र नहीं किया था।

दीगर ये कि मैं ना सिर्फ अपीफ़ेनी में बल्कि अल-हक़ में और नूरअफ़शां में नजात के मुताल्लिक़ मुसलसल मज़ामीन लिखता रहा। क्या उस वक़्त इस मोअतबर नाई को सांप सूंघ गया था जो ऐसा चुप साधा कि गोया उस के बदन में जान ही नहीं है और अब 27 साल के बाद हमसे मुतालिबा करता है कि "अब भी उन को चैलेंज देता हूँ कि कोई तहरीर ऐसी पेश करें कि आप बानी-ए-अंजुमन कब हुए। आपका मोअतबर नाई जानता है कि 27 साल तक कौन इस किस्म की फ़ुज़ूल तहरीरें अपने पास महफ़ूज़ रखेगा। इस लिए चलो अपनी इज़्ज़त रखो और चैलेन्ज दो। अगर ये चैलेंज मुझको इस वक़्त भी दिया जाता। जबकि मेरा रिसाला “मैं क्यों मसीही हो गया" शायाअ हो गया तो में इस मोअतबर नाई को तहरीरें दिखा कर भी इस के घर तक पहुँचाता। अब उस के चैलेंज का ये जवाब है कि मुश्ते कि बाद अज़जनग ब-कार आमद बर कलिमा ख़ुद याएदज़द।

हमारी दियानत पर मोअतबर नाई की मुहर तस्दीक़

शक़्क़ चहारुम व पंजुम का जवाब ये है कि अगरचे ये दोनों शक़्क़ीं भी सरासर झूट और दरोग़बानी पर मबनी हैं। क्योंकि ना तो हमने किसी से रूपये क़र्ज़ लिए थे। और ना ही क़र्ज़ा अदा करने के लिए बड़े दिनों की तअतील में बंबई गए थे।लेकिन इस से हमारी दियानत- दारी की तस्दीक़ होती है। कि हम इस क़दर दियानतदार और सदाक़त शआर हैं कि किसी का क़र्ज़ा ख़ोरदबरुद करना नहीं चाहते हैं। बल्कि हम उस वक़्त भी किसी का क़र्ज़ा अदा किया करते हैं जब अदालती कार्रवाई भी मुनक़ते हो जाती है। क्योंकि अदालत के रू से तीन साल और चार साल के बाद कोई क़र्ज़ख़्वाह अपना क़र्ज़ा वसूल नहीं कर सकता। लेकिन हमने ज़ाएद-उल-मियाद क़र्ज़ा को भी अदा कर दिया। क्या मुसलमानों में भी कोई ऐसा दियानतदार शख़्स है? मौलवी साहब आपकी क्या राय है?

शक़्क़ शश्म का जवाब ये है कि झूटों की तस्दीक़ करने वाला भी झूटा होता है। चूँकि हमने साबित कर दिया कि जिस नाई को आप मोअतबर समझ रहे हैं वो सरासर नामोअतबर और नाक़ाबिल इल्तिफ़ात और झूटा है। इस लिए जो शख़्स ऐसे शख़्स की तस्दीक़ करता है। लामुहाला वो भी झूटा है।

मैं नहीं चाहता कि जोज़फ़ बिहारी लाल साहिब की परेशानीयों और मसाइब पर कुछ इज़ाफ़ा करूँ। सिर्फ इस क़दर लिखने पर इक्तिफ़ा करता हूँ कि आपके मोअतबर नाई के इस जुम्ला से कि पादरी जोज़फ़ बिहारी लाल अगरचे मिशन से अलीहदहा हैं। ताहम वो अब तक ईसाई हैं।” इन तमाम वाक़ियात की तस्दीक़ मज़ीद होती है। जो उनके मुताल्लिक़ हमारे हाथ पहुंचे हैं। ख़ुद उनके हाथ का लिखा हुआ एक ऐसा लंबा चौड़ा ख़त हमारे पास है कि जब हम चाहें उनको परेशान कर सकते हैं बाईं-हमा में तमाम मसीहीय्यों की ख़िदमत में अर्ज़ करता हूँ कि जोज़फ़ बिहारी लाल साहिब के लिए दुआ करें कि ख़ुदा उनको रुहानी और जिस्मानी तक्लीफों से आज़ाद करे। और राह मुस्तक़ीम पर उन की रहनुमाई करे। वस्सलाम।

ख़ाकसार - सुल्तान मुहम्मद अफ़्ग़ान

Yücelik Krali • Bölüm 1

Kutsal Yazılara yapılan bu yolculukta peygamberler sizi tek gerçek Tanrı ile tanışmaya ve isyankar halkını karanlığın egemenliğinden kurtarmak ve Kendisiyle birlikte ışığın egemenliğinde yaşayabilmelerini sağlayacak duruma getirmekle ilgili Tanrı'nın planlarını anlamaya davet etmektedirler. Düşündürücü anlatımı ve esin verici animasyon ve canlı videosu ile bu dünya çapında tüm yaştan izleyicilerin izlemesine uygun bir filmdir.

December 10, 2016 Sunrise

بعض آیات قرآن پر سرسری ریمارکس

واعظ انجیل

Critical Remarks on Quranic Verses


Published in Nur-i-Afshan September 27, 1895
By
One Evangelist


سال گزشتہ یعنےسنہ۹۴ء کےدرمیانی چندہفتوں کے پرچے اخبار نور افشاں  میں ایک مضمون بہ عنوان ’’بعض خیالات محمدی پر سرسری  ریمارکس‘‘ درج ہوا۔جس میں محمدی صاحبان کے بعض  خیالاتدینیہ در واجیہ کا خلاصہ۔ جن کو وہ اپنے  تئیں اہل کتاب  سمجھ کر قرآن  و حدیث  کے موافق  اپنے مذہبی فرایض عمل مین لانے کے لئےضروری اور موجب ثواب خیال  کرتے ہیں مقابلہ کے طور پر تحریر  کیا گیا ۔ اور جس کا نتیجہ صرف  یہی حاصل ہوا۔ کہ اُن کے وہ مذکورہ  کل خیالات  اہل کتاب مسیحیوں کی تعلیم  کے محض خلاف۔ مگر ہاں بہت کچھ تعلیم  ہنود کے موافق ثابت و ظاہر ہوئے۔ جو از روئے قرآن مشرک قرار دئے جاتے ہیں۔ اور جو امر نہایت ٍغور طلب ہے اور جس کے لئے  ادباً مکر التماس بھی کیا گیا  تھا کہ اگر اُن  کی کوئی دوسری  حقیقت ہو تو کوئی صاحب برائے مہربانی اُس کو ظاہر کر کے راقم مضمون کو ممنون ۱ و مشکور فرمائیں ۔ مگر ہنوز جس کو قریب ایک سال کا عرصہ  گذرتا ہے کسی صاحب نے خاکساری  کو ممنون نہ کیا ۔ 

پس اب دوسرا مضمون بالا سے درج اخباء ہذا کیاجاتا ہے۔ جس میں قرآن صاحب کے اُن الفاظ  پر غورکرنا  کمال ضروری ہے۔ جن کے زریعہ بعض محمدی صاحبان ہم مسیحیوں پر بعض  دفعہ ہٹ دہرمی یا بے منصفی  کا  الزام  لگایا کرتے ہیں کہ ’’ قرآن تو ابجیل اور دیگر کتب انبیا  کی تصدیق  کرتا ہے۔ مگر مسیحی قرآن اور محمد صاحب کوقبول و تسلیم نہیں کرتے‘‘ وغیرہ وغیرہ ۔ چنانچہ اُن آیات قرآنی میں سے جن  میں وہ  کتب سابقہ یعنے توریت و انجیل وغیرہ  کے مصدق ہونے کا اقرار کرتا  ایک یہ ہے یعنے’’قرآن بناوٹ کی بات نہیں ہے۔ مگر وہ تصدیق ہے اگلی کتاب کی اور تفصیل  ہے ہر چیز کی اور ہدایت  و رحمت  ہے اُس قوم کے لئے جو ایمان  لاتے ہیں‘‘ سورہ یوسف آیت۱۱۱۔

البتہ اِن الفاظ قرآنی کے زریعہ  مسیحیوّں کومناسب ہی نہیں۔ بلکہ نہایت ضروری ہوتا۔ کہ وہ اگرچہ قرآن  کو منجانب اﷲ اور محمد صاحب کونبی برحق تو ہر گز  نہ مان سکتے تھے۔ کیونکہ نبی اور نبوّت  کی ضرورت ۔ ضرورت پر موقف  ہے۔ جن کا خاتمہ  کتاب مکاشفات  پر  ہو چکا۔  اور اب نہ کوئی اور کتاب کی ضرورت  اور نہ کسی دیگرنبی کے ظہور کی کچھ حاجت باقی رہی جس کی بحث بدلایل کتاب عدم ضرورت ؔقرآن  کےصفحہ  ۳ سے ۱۵ تک بغور مطالعہ کرنا چاہئے ۔ تاہم وہ اُن کی  عزت و تعظیم دیگر بزرگوں کے مانند ضروری کرتے۔ جس کے لئے اُنہیں  عام طور حکم  دیاگیا ہے کہ ’’ اگر تم فقط اپنے بھائیوں کو سلام  کرو تو کیا زیادہ کیا۔ کیا محصول  لینے والے بھی ایسے نہیں کرتے ۔ متی ۵: ۲۷۔ اور جن کی خاصیت  کا قرآن میں بھی  یوں مذکور ہے ’’اور دوستی کے بارہ میں مسلمانوں  کے تو اُن کو زیادہ قریب پائیگا جوکہتے ہیں کہ ہم نصاریٰ ہین اس لئے کہ ان میں قسیس  اور رہبان ہیں اور یہ لوگ تکبر  نہیں کرتے‘‘ سورہ المائدہ۔ آیت ۸۵۔

مگر تعجب کا مقام  ہے کہ وہی قرآن اپنے اِن الفاظ کی آڑ میں  دیگر  کتب سابقہ اورخصوصاً انجیل مقدس کو رد کرنے کا ارادہ  کر کے صرف اپنی ہی  ضرورت کو پیش کرنے چاہتا ہے۔  جو کلام اﷲ بیئبل مقدس کےمحض خلاف اور ناممکن  امر ہے۔ تو بھلا  کیونکر ہو سکے۔ مگر ہاں کوئی بیجا یا نامناسب  لفظ اُن کے یا کسی کے خلاف اپنی  زبان یا قلم سے  مسیحیوں کا نکالنا اُن کے اُصول ایمانیہ کے بالکل  خلاف  ہے۔ لیکن راستی اور حق کو  ظاہر کرنا بھی اُن  کا خاص و ضروری  فرض ہے۔ جو بیشک  اکثروں کو بُرا معلوم  ہو سکتا امر مجبوری ہے۔ چنانچہ قرآن کی اُن بعض آیتوں میں سے جو تعلیم  بیبل کے خلاف ہیں۔ بعض کا مختصراً یہاں زکر کیا جاتا ہے۔ کہ جن کے زریعہ قرآن خصوصاً  انجیل  مقدس پر اپناحملہ ظاہر کر کے اُس کی خاص تعلیم کو رد کرنے کی بدرجہا کوشش کرتا ہے۔ جن میں سے اول  اُن آیتوں ۲ پر غور کرے جن کا زکر انجیل مقدس میں مطلق پایا جاتا اور نہ ہو سکتا  ہے۔ مگر قرآن  اُن کے زریعہ اپنا دعویٰ  اُس پر ثابت کرتا ہے۔

اول ۔ وہ آیات قرآنی جن کا زکر  انجیل میں مطلق پایا نہیں جاتا۔

وَإِذْ قَالَ اللَّهُ يَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ أَأَنتَ قُلْتَ لِلنَّاسِ اتَّخِذُونِي وَأُمِّيَ إِلَٰهَيْنِ مِن دُونِ اللَّهِ  قَالَ سُبْحَانَكَ مَا يَكُونُ لِي أَنْ أَقُولَ مَا لَيْسَ لِي بِحَقٍّ  إِن كُنتُ قُلْتُهُ فَقَدْ عَلِمْتَهُ  تَعْلَمُ مَا فِي نَفْسِي وَلَا أَعْلَمُ مَا فِي نَفْسِكَ  إِنَّكَ أَنتَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ مَا قُلْتُ لَهُمْ إِلَّا مَا أَمَرْتَنِي بِهِ أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ رَبِّي وَرَبَّكُمْ  وَكُنتُ عَلَيْهِمْ شَهِيدًا مَّا دُمْتُ فِيهِمْ  فَلَمَّا تَوَفَّيْتَنِي كُنتَ أَنتَ الرَّقِيبَ عَلَيْهِمْ ۚ وَأَنتَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ

۱۔ سورہ المائدہ آیت  ۱۱۶، ۱۱۷۔ ( ۱۱۶) ۔ ’’اور جب خدا نی کہا اے عیسیٰ مریم کے بیٹے کیا تو نے لوگوں سے کہا تھا کہ مجھسے اور میری ماں کو اﷲ سے الگ دو خدا مانو۔ عیسیٰ بولا تو پاک ہے مجھ سے کیونکر ہو کہ وہ بات کہوں جومیرا  حق نہیں۔ اگر میں کہتا تو مجھے  معلوم ہوتا تو میرے دل کی جانتا ہے اور میں تیرے  دل کی نہیں جانتا تو تو چھپی باتیں  جانتا ہے۔ ( ۱۱۷) میں نے اُنہیں وہی بات کہی ہے جس کا تونےمجھےحکم دیا تھا کہ تم  اﷲ کی عبادت کرو جو میرا اور تمہارا رب ہے۔ اور جب تک  میں اُن میں رہا اُن کا نگہبان رہا اور جب تونے مجھے وفات  دی تو اُن کا نگہبان ہو گیا اورتو ہر شے پر گواہ ہے۔

آیات قرآنی مذکور ہ بالا  سے دو باتیں تشرح ہیں۔  اول یہ۔ کہ خداوند  یسوع مسیح کے اقرار کی آڑ میں بزرگان دین یعنے رسولوں۔ حواریوں اور دیگر بزرگوں نے مریم کو ایک معبود ( خدا) سمجھا۔ سوائے اﷲ کے۔ دوم۔ یہ کہ خداوند  یسوع مسیح کی الوہیت کا اقرار کیا بر خلاف اُس کے انکار کے۔ جس نے مثلِ محمد صاحب  کے ایک نبی ہو کر لوگوں کو صرف  نصیحت دی۔ کہ بندگی  کرواﷲ کی وغیرہ وغیرہ  مگر ان باتوں کا زکر انجیل مقدس میں مطلق پایا نہیں جاتا ہے۔ اور نہ کسی دیندار مسیحی کی روایت  سے آجتک  اُن کی کوئی تصدیق ہوئی لیکن تعجب ہے کہ چھ (۶۰۰)سو برس  بعد محمدصاحب کو بزریعہ وحی یہ ہدایت پہنچی۔ اب ان باتوں پر غور کرئے۔

اوّل ۔ مریم انسان تھی ۔ جس کو کبھی کسی عیسائی  نے آج  تک معبود  (خدا) قرار نہیں دیا۔ جس حال کہ کلام خدا انسان کو انسان  پر صرف  بھروسا  رکھنے  پر لعنت کا فتویٰ ظاہر کرتا ہے۔ ( یرمیاہ  ۱۷: ۱۵) تو اُسکو خدا سمجھنے  کا  کس  قدر ہولناک نتیجہ۔ جس کی وجہ صرف  یہ ہے  کہ محمد  صاحب نے رومن  کیتھولک عیسائیوں کو غلطی سے مریم کی زیادہ تعظیم کرتے ہوئے دیکھ کر اُس کو پاک تثلیث  کا اقنوم  ثالث خیال  کر لیا۔ اور عیسائیوں کے سر پر یہ الزام تھوپ دیا جس  کو وہ خود کفر سمجھتے ہیں۔

دومؔ۔ خداوند یسوع مسیح کی الوہیت کے ثبوت پر انجیل مقدس میں بکثرت  شہادتیں و صداقتیں موجود ہیں جو کو  آنکھ کھولکر  دیکھنا چاہئے۔ مگر ان کا زکر  بسبب طوالت قطع نظر کے یہاں پر صرف خداوند  یسوع مسیح کے چند اقول جو اس امر کہ ثبوت پر اُس میں  برملا دعوے  کے ساتھ  مذکو ر ہوئے  مندرج کئےجاتے ہیں۔ چنانچہ اُس  نے فرمایا  کہ ۔ میں باپ  کی گود  سے آیا  ہوں کہ میں  نے خدا کو  دیکھا  اور میں ہی اُس کو ظاہر کرتا ہے ( یوحنا ۱ : ۱۸)کہ ’’میں اور باپ ایک ہوں ‘‘ ( ۱۰: ۳۰) کہ میں عدالت (قیامت) کے دِن مردون کا انصاف  کرونگا (۵: ۲۲) کہ ’’جس نے مجھے دیکھا اُس نے باپ کو دیکھا‘‘ ( ۱۴: ۹) کہ ’’آسمان و زمین کا سارا اختیار مجھے دیا گیا ‘‘ ( متی ۲۸: ۱۸) کہ ’’میں  زمانہکے آخر تک ہر روز تمھارے ساتھ ہوں‘‘ ( ۲۸: ۲۰)  وغیرہ ۔ وغیرہ ۔ پس اِس قدرا قراروں اور دعووں کے سامنے قرآن کے اُس مصنوعی انکار کی  جو محض غرض سے کیا گیا ۔ جس کا زکر آیندہ بھی کیا جاویگا کیا  وقعت ہو سکتی ہے۔

يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لَا تَغْلُوا فِي دِينِكُمْ وَلَا تَقُولُوا عَلَى اللَّهِ إِلَّا الْحَقَّ  إِنَّمَا الْمَسِيحُ عِيسَى ابْنُ مَرْيَمَ رَسُولُ اللَّهِ وَكَلِمَتُهُ أَلْقَاهَا إِلَىٰ مَرْيَمَ وَرُوحٌ مِّنْهُ فَآمِنُوا بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ  وَلَا تَقُولُوا ثَلَاثَةٌانتَهُوا خَيْرًا لَّكُمْ  إِنَّمَا اللَّهُ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ  سُبْحَانَهُ أَن يَكُونَ لَهُ وَلَدٌ لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ  وَكَفَىٰ بِاللَّهِ وَكِيلًا

۲۔ سورہ  النساءآیت ۱۶۹۔ ’’ اے اہل کتاب اپنے دین (کی بات) میں حد سے نہ بڑھو اور خدا کے بارے میں حق کے سوا کچھ نہ کہو۔ مسیح (یعنی) مریم کے بیٹے عیسیٰ (نہ خدا تھے نہ خدا کے بیٹے بلکہ) خدا کے رسول اور کا کلمہٴ (بشارت) تھے جو اس نے مریم کی طرف بھیجا تھا اور اس کی طرف سے ایک روح تھے تو خدا اوراس کے رسولوں پر ایمان لاؤ۔ اور (یہ) نہ کہو (کہ خدا) تین (ہیں۔ اس اعتقاد سے) باز آؤ کہ یہ تمہارے حق میں بہتر ہے۔ خدا ہی معبود واحد ہے اور اس سے پاک ہے کہ اس کے اولاد ہو۔ جو کچھ آسمانوں میں اور جو کچھ زمین میں ہے سب اسی کا ہے۔ اور خدا ہی کارساز کافی ہے ۳ ‘‘ الخ۔ 

البتہ اس آیت قرآنی کے درمیانی الفاظ  جن پر خط کھینچا  گیا  عجیب  اور نہایت  راست اور انجیل کے موافق  الفاظ میں ( دیکھو یوحّنا ۱: ۱، ۵ ، لوقا  ۱: ۳۵)  جو اُس میں اتفاقیہ  درج ہو گئے۔ مگر تعجب کامقام  ہے کہ بہت سے محمدی  صاحبان ان پر بہت  کم خیال کرتے ہیں۔ کیا یہ عجیب خطاب  کسی دیگر  نبی کی طرف بھی قرآن  میں منصوب  ہوئے؟ ہر گز نہیں۔ مگر اُس کے آخری الفاظ  یعنے تین نہ کہو باز آؤ  تمہارا بھلا ہوگا۔ بیشک  غور طلب  ہیں۔ کیونکہ عیسائیوں کے عقیدے میں تین خدا کہنا یا ماننا محض کفر ہے۔ بلکہ وہ صرف ایک واحد  خدا کے قایٔل  میں  ( استثنا ۶: ۴، رومیوں ۱۶: ۲۷، ۱ تمطاؤس ۱: ۱۷و یہوداہ  ۱: ۲۵)  مگر ایک واحد خدا  میں اقانیم  ثلاثہ  جنے اب ۔ ابن اور روح القدس کے البتہ قایل ہیں۔ جنسے تین  خدا ہر گز لازم نہیں آتے۔ بلکہ تین اُصول  جو فی الحقیقت شخصیت میں الگ  الگ ۔ مگر زات  و صفات اور جلال  میں واھد  ( متی ۲۸: ۱۹، ۱۔قرنتیوں ۱۳: ۱۴) اُس الہیٰ ازلی و حقیقی  وحدانیت میں جو  سر الہیٰ ہے کلام اﷲ کے موافق قبول کرنا منافی اُس وحدت  کے نہیں جو اﷲ کی وحدت  ہے۔ مگر وحدت  مجرویا اُس وحدت کے ضرور خلاف ہے۔ جو عقلی وحدت ہے کیونکہ اﷲ کی وحدت  میں عقلی کا قایل  ہونا ہی کفر  ہے جس  کے صرف  ایمان اور اقرار  سے مطلق کوئی فائدہ نہیں ہے ( یعقوب۳: ۱۹) کیونکہ خدا کی وحدت  وہ وحدت ہے  جو قیاس و گمان  انسانی سے بالاتر ہے ۔اس مین نہ وحدت  وجود ہے نہ وحدت عقلی اور نہ وحدت  عدوی  ہے ۔ بلکہ وہ غیر مدرک ہے جو  متشابہات  میں سے جس  کا مطلب  آج تک  نہ کوئی سمجھ سکا۔ اور نہ انسان  کی طاقت ہے کہ اُس کو سمجھ سکے س۔ ۳: سورہ التوبہ آیت ۱۱۲ ’’مسلمانوں کی جانیں اور مال اﷲ نے بعوض  بہشت خر ید کی ہیں کہ وہ اﷲ کی راہ میں لڑیں قتل کریں اور قتل ہوںٍ یہ لازمی وعدہ  ہے اﷲ پر۔ توریتؔ میں اور انجیل و قرآن  میں  اور اﷲ سے زیادہ وعدہ  وفا کون ہے سو اُس بیع پر جو تم نے اُس سے کی خوشی  کرو اور یہ بڑی مرُاد یانی ہے‘‘۔

خدا کے پاککلام توریت  و انجیل میں نہ کہیں کی راہ  میں لڑنے۔ مرنے کا حکم ہوا اور نہ  اُس کے لئے کوئی اجر ٹھہرایا گیا اور نہ ایسے  فعل پر  کوئی طرح کی بیع قرار پائی۔ بلکہ برعکس  اس کے قصداً  ایسا کرنے والے پر اﷲ کا عتاب ہے۔ البتہ بعض  مخالفین  بنی اسرائیل کی ان لڑائیوں کو جو کنعانیوں کے ساتھ ہوئیں۔ اﷲ کی راہ پر لڑنا۔ مرنا خیال کرتے ہیں۔ مگر یہ اُن کی غلط فہمی  ہے۔ اُن  لڑائیوں  کی نسبت بنی اسرائیل کو کہیں خدا کی طرف سے یہ وعدہ نہیں  ہوا کہ جو ان لڑائیوں میں قتل کریں گے یا قتل کئے جاویں گے وہ بہشت میں داخل ہوں گے۔ جن میں سے  بہتوں کو خود خدا نے اُنکی سر کشی و نافرمانی  کے سبب بعض دفعہ ہلاک کر دیا۔ دیکھو خروج ۳۲: ۲۸ و گنتی  ۱۱: ۲۳ و ۲۱: ۶ وغیرہ وغیرہ یہاں تک کہ سوائے  بچّوں وغیرہ  کے اُن  چھ لاکھ  جنگی مرد بنی اسرائیل میں سے جومصر  سے نکلے ( خروج ۱۲: ۳۷)  صرف دو یونے کالبؔ اور یشوعاؔ ہی اُس وعدہ کے ملک  کنعان ؔ میں بھی داخل  ہوسکے۔ اور باقی سب اُس جنگل بیابان میں مرمٹے (گنتی  ۲۶: ۶۵) اور نہ کہیں یہ حکم  صادر  ہوا کہ جو کنعانی اﷲ کی راہ پر ایمان لائیں اور اُس کو قبول کریں اُنہیں چھوڑ دو۔ کیونکہ وہ اُس  خدائے  عادل  و مصنف کی عالم الغیبی کے موافق انکی سخت برائیوں کے سبب اُن پر ایک قہر تھا۔ جیسا خدائے قدوس کا برتاؤ  اُس کے عین عدل کے موافق بئیبل  مقدس کے دوسرے مقاموں سے بھی بخوبی ظاہر ہے۔ چنانچہ  دُنیا  کی برائی  کے سبب اُس کو طوفان سے غارت کر دینا۔ سدؔوم  و عمورہؔ  کی شرارت اور ناپاکی  کے باعث  اُن کو گندہک  اور آگ سے بھسم  کر ڈالنا۔ فرعون کو اُس کی سخت دلی کے سبب معہ اُسکی فوج بحر قلزم میں ڈُبا مارنا۔ وغیرہ وغیرہ  مگر دیندار اور اپنے پرستاروں کو محفوظ رکھنا۔ 

انجیل مقدس میں بھی خدا کی راہ میں لڑنے و مرنے کا کہیں مطلق زکر نہیں ہے۔ بلکہ اﷲ کی راہ ظاہر کرنے کی بابت  اُس میں یوں لکھا ہے قول خداوند یسوع مسیح  دیکھو میں تمہیں  بھیڑونکی  مانند بھیڑیوں کے بیچ میں بھیجتا ہوں۔  پس تم سانپوں کی طرح ہوشیار اور کبوتروں  کی مانند سادھے بنے رہو‘‘ متی ۱۰: ۱۶۔ اور اُن سے برتاؤ کی بابت جو  خدا کے کلام سے برگشتہ ہو جاتے ہیں یوں مرقوم ہے۔ ’’مناسب نہین کہ خداوند کا بندہ جھگڑا کرے بلکہ سب سےنرمی کرے۔ اور سکھلانے  پر متعد اور دکھون کا سہنے  والا ہووے۔ اور مخالفوں  کی فروتنی  سے تادیب کرے۔  کہ شاید  خدا اُنہیں تو بخشے تاکہ وہ سچائی  کو پہچانیں۔ اور وہ جنہیں شیطان نے جیتا شکار کیا ہے بیدار ہو  جا کر  اُس کے پھندے  سے چھوٹیں۔ تاکہ خدا کی مرضی  کو بجالاویں‘‘ ۲ تمطاؤس ۳: ۲۴ ۔ ۲۶۔

پس کلام خدا بائبل  مقدس  کے موافق اﷲ کی راہ میں لڑنے مرنے یا اُس کے لئے کوئی طرح کی سختی کرنے کی قطعی ممانعت ہے۔ اور نہ عقل گوارا کر سکتی ہے کہ اس طرح کسی انسانکی دلی تبدیلی  ہو سکے مگر ہان نرمی ملائیمت  اور بردباری سے ممکن ہے جو مسیحیوں کی انجیل  مقدس کے زریعہ  دلی خاصیت  ہے اور جس کی تائیدقرآن بھی یوں ظاہر کرتا ہے کہ ’’جو لوگ عیسیٰ کے تابع ہوئے ہم نے اُن کے دلوں میں شفقت  اور مہربانی ڈالی‘‘ الخ۔ سورہ الحدید۔ آیت ۲۷۔

۴۔ سورہ صف ۔ آیت ۶۔ ’’اور جب عیسی ابن مریم نے کہا اے بنی اسرائیل میں تمہاری طرف اﷲ کا رسول ہوں مجھ سے  آگے جو توریت ہے میں اُس کا مصدق  ہوں اور ایک رسول کی بشارت  دیتا ہوں جومیرے  بعد آئیگا اُس کا نام احمد ہوگا‘‘الخ

مگر انجیل مقدس میں نہ کسی نبی کے ظہور کی اب کچھ ضرورت  اور نہ کسی کی آمد کا کچھاشارہ ہے۔ بلکہ برخلاف اس کے۔ خداوند یسوع مسیح نے ایسے لوگوں سے جو اُس کے بعد نبوت کا دعویٰ کریں  ہوشیار رہنے کی بابت تاکیداً یوں فرمایا  ہے۔ ’’تب اگر کوئی تم سے کہے کہ دیکھو مسیح یہاں یا وہاں  ہے تو اُسے نہ ماننا کیونکہ مسیح اور جھوٹھے نبی اُٹھینگے اور ایسے بڑے نشان اور کرامتیں دکھاویں گے کہ اگر ہو سکتا تو وہ برگزیدوں کو بھی  گمراہ کرتے۔ دیکھو میں تمھیں آگے ہی کہ چکا ۔ پس اگر وے تمہیں  کہ دیکھو وہ بیابان میں ہو تو باہر نہ جائیو یا کہ دیکھو وہ کوٹھری میں ہے تو نہ مانو‘‘ ( متی ۲۴:۲۳ سے ۲۶) کیونکہ احکامات توریت  مقدس میں جو کچھ تکمیل  طلب تھے اور جن کی تکمیل کے لئے ایک تکمیل  کنندہ ’’مسیح ‘‘کی بابت سب نبیوں نے ہمزبان ہو کر گواہی  دی۔ ( یوحنا ۵: ۳۹) وہ آچکا اور سب کچھ پورا کر چکا ( متی ۵: ۱۷، ۱۸) جس کے ثبوت کے لئے کل انجیل  کو جو تکمیل کا زخیرہ ہے بغور مطالعہ  کریں اور دیکھیں۔ تو اب کسی دوسرے  کی کیا ضرورت باقی رہی۔

تاہم بعض محمدی صاحبان نے اِس آیت قرآنی  کے موافق انجیل میں نہایت  جدوجہد سے چھان بین کی۔ مگر جب کہیں اُس کا پتہ نہ پایا۔ تو لاچار بعض نے لفظ ’’ وہ نبی‘‘  کو محمد صاحب کی طرف خداوند یسوع مسیح کی طرف ہے۔ (یوحنا ۷: ۴۰۔ ۴۱) جسکی بحث کتاب  ’’عدم  ضرورت  قرآن ‘‘ مصنفہ بادری ٹھاکر داس صاحب۔ صفحہ ۱۱۵ سے ۱۲۳ میں بہ دلایل مندرج ہے مطالعہ  کریں۔ پھر بعض نے لفظ ’’تسلی دینے والا‘‘ کو اُنکی طرف خیال کر لیا۔ جس میں صرف روح القدس مراد ہے (یوحنا ۱۴:۱۶، ۱۷) اور جس کو خداوند نے اپنے شاگردوں پر نازل کرنے کا وعدہ  فرمایا کہ جو’’ اُس کے لئے گواہی دیگا‘‘۔ ’’اُس کی بزرگی کریگا‘‘۔ اور اُس کی باتیں (تعلیم) ان کویاد دلائیگا۔ وغیرہ وغیرہ  (یوحنا ۱۴؛ ۲۶، ۱۵: ۲۶، ۱۶:۱۴) اور جس کا نزول  بھی اُس کے وعدہ  کے موافق ۔ اُس کے صعود  آسمان  کے دس دن بعد اُس کے شاگردوں پر برملا ظاہر ہو گیا( اعمال ۱: ۲،۳) مگر محمد صاحب  کی تعلیم  غور طلب ہے۔ پس جب  اُنہوں نے اس میں بھی  کامیابی  نہ دیکھی  توآخر  کا بعض  نے لفظ ’’سردار جہان‘‘ کا حضرت  پرقایم کرنے کی کوشش کی۔ کہ جس کو ہم مسیحی بھی اُن کی یا کسی کی طرف ہرگز  منصوب نہیں کر سکتے۔ کیونکیہ اپس کی مراد صرف شیطان سے ہے۔  اور جس کی نسبت یہ بھی لکھا ہے کہ  ’’اس جہان کے سردار  پر حکم  کیا گیا‘‘ کہ ’’اب اِس دُنیا کا سردار نکال دیا جائیگا ‘‘وغیرہ وغیرہ ( یوحنا ۱۲: ۳۱ ، ۱۶: ۱۱) پس اِن آخری دو ثبوتوں کی حقیقت معلوم کرنےکے لئےرسالہ’’مقال‘‘ مصنفہ پادری امام مسیح صاحب ۔ صفحہ ۱۳ سے ۳۴ تک بغور مطالعہ کریں اور تسلی پائیں۔

دوم۔  بعض آیات تعلیمی قرآن و انجیل  کا مقابلہ

(۱ ) انکا ر الوہیت  خداوند یسوع مسیح۔ ۱۔ سورہ المائدہ ۱۹ ’’وہ کافر ہیں جو مسیح ابن مریم کو اﷲ کہتے ہیں۔ تو کہ کہ اگر اﷲ مسیح بن مریم کواور اُس کی ماں کو اور سب کو جو زمین میں ہیں ہلاک کرنا چاہئے تو کون اُس کے ارادہ  کو روک سکیگا۔

۲۔ سورہ ایضاً آیت ۷۹۔ ’’مسیح اور کچھ نہیں مگر ایک رسول ہے ۔ اُس سےپہلے بہت رُسول گزرچکے۔ اور اُس کی ماں اور کچھ نہیں مگر صدیقہ۔ دونوں کھانا کھایا کرتے تھے۔ دیکھو ہم اُن کے لئے کیسی  نشانیاں بیان کرتے ہیں پھر دیکھ وہ کہاں اُلٹے  جاتے ہیں۔ تو کہ  کیا تم خدا کے سوا  اُسے پوجتے  ہو کہ تمہیں نفع نقصان  نہیں پہنچا  سکتا‘‘۔

۳۔ سورہ التوبہ  آیت ۳۰ ’’یہود نے کہا عزیز  (یعنے عزرا کاہن) خدا کا بیٹا ہے۔ اور نصاریٰ  نے کہا کہ مسیح  خدا کا بیٹا  ہے۔ یہ اُن  کے مُنہ کی باتیں ہیں اگلے کافروں کی بات کے مشابہ اُنہیں خدا کی مار کہاں اُلٹے جاتے ہیں۔‘‘

۴۔ سورہ النسا آیت  ۱۶۹ کا آخری حصہ ۔ ’’اﷲ ایک ہے اس بات سے پاک  ہے کہ اس کے کوئی بیٹا ہو‘‘ الخ۔ اور دیکھو سورہ مریم آیت ۳۶ بھی۔

پس قرآن میں یہی  چار خاص آیتیں ہیں۔ جو الوہیت خداوند مسیح کے خلاف  زور شور سے بیان ہوئیں۔ جن میں سے اول میں یہ بتلایا گیا ہے کہ وہ صرف مخلوق ہے اور دوسرے کی مانند ہلاک  ہو سکتا ہے۔ دوم  میں اُس  کی انسانیت  کا ثبوت  اور کہ وہ انسان  کو نہ کچھ  نفع  یا نقصان  پہنچا  سکتا ہے۔ سوم یہ کہ خدا پاک  ہے  اُس سے جو مسیحی  اُس کی طرف نسبت کرتے ہیں۔ چہارم میں بڑی صفائی  سے یہ کہا گیا ہے کہ وہ خدا کا بیٹا  نہیں ہو سکتا۔ 

پس اس سے زیادہ  الوہیت مسیح کا اور کیا نکار ہو سکتا تھا۔ جو قرآن کا خاص  مدعاہے۔ اور بیشک اگر مسیحی خواہ مخواہ  بلا دلایل  ثبوتی  اُس کو (مسیح کو ) اﷲ کہکر اُس کی الوہیت کے قایٔل  ہیں تو اُن سے بڑھکر کون کافر ہو سکتا ہے۔ مگر یہاں معاملہ دگر گوں  نظر آتا ہے ۔ کیونکہ جیسے مسیحیوں  پاس اُس کی انسانیت کے دلایل  ہیں کہ وہ انسان  بن کر  ابن آدم  اور مسیح کہلایا۔ اور اس لئے خصایص انسانی یعنے کھانا۔ پینا ۔ تھکنا اور سونا وغیرہ  بھی اُ س کو لازمی  ہوئےاور جن  باتوں  پر محمد  صاحب  نے زیادہ بلکہ بہت  زیادہ زور دیا۔ تاکہ اُس کی الوہیت  اور خصوصیت  کو زائل کر کے  صرف قرآن  کی ضرورت کو پیش  کریں۔ مگر چونکہ وہ  کا مل انسان تھا اس لئے  وہ گناہ کی خاصیت  سے بھی مطلق  پاک  دستبرار ہے۔ اور جس امر کی قرآن  بھی پوری شہادت ظاہر کرتا ہے۔ پس یہ ہے خصوصیت  اُس کی ہم گناہ آلودہ انسانوں  کا شفیع  ہونے کی ہے مگراُس کی انسانیت  سے کہیں  بڑھکر قوی دلایل اُس کی الوہیت  کے بھی  اُنکے پاس موجود ہیں۔ جو سر الہیٰ  ہے کہ وہ ( مسیح خوبصورت  انسان دنیا میں ظاہر  ہوا۔ (فلپیوں ۹: ۵۔ ۱۱)  کہ جس قوی شہادتیں و صداقتیں کلام رباّنی  میں موجود ہیں۔ اور جب  کام عمل بیان اِس جگہ نجوف طوالت دشوار ہے۔ مگر خلاصہ کے طور پر بعض  یہ ہیں۔ 

اوّل ۔ دلایل الوہیت مسیح (۱) نبیوں کی گواہی یسعیاہ ۹: ۶ و یرمیاہ ۲۳: ۶ و میکاہ ۵: ۲ ( ۲) روح القدس کی گواہی بمواجب قول مسیح یوحنا ۱۶: ۱۳و ۱۴ و قول رسول ۔ ۱ قرنتیون ۲: ۳۔ ( ۳) یوحنا بپتمسہ دینے والے کی گواہی۔ یوحنا ۱: ۱۵ سے ۲۷(۴ ) رسولونکی گواہی۔ یوحنا ۱: ۱۴ اور رومیوں ۱: ۳ سے ۴۔ ( ۵ ) خود مسیح کے اقوال جن کا زکر پیچھے ہو چکا ( ۶ ) اور اُس کے زندہ ہونے کاثبوت۔ متی ۲۸: ۵۔ ۸۔

دوم ۔ لفظ بیٹے کا ثبوت (۱ ) نبی کا کلام۔ زبور ۲: ۱۴ (۲ ) جبرئیل فرشتہ کی گواہی ۔ کہ ’’وہ خدا تعالیٰ کا بیٹا کہلائیگا‘‘ لوقا۱:۳۵ (۳ ) خدا باپ کی گواہی۔ کہ ’’ یہ میرا پیارا بیٹا ہے‘‘ کہ ’’ تم اُس کی سُنو‘‘ متی ۳: ۱۷ و ۱۷:۵ ( ۴) خود مسیح کا اقرار ’’میں وہی ہوں‘‘ مرقس ۶۱:۶۴۔ علاوہ بریںاور یہی چند باتیں خلاصہ کے طور پر کتاب ہدایت المسلمین۔ مصنفہ پادری عماوالدین صاحب ۔ ڈی ۔ ڈی کے صفحہ ۳۸۳ و ۳۸۴ سے نقل کرنا ضروری معلوم ہوتی ہیں یعنےپس اُس کی(مسیح کی ) الوہیت کے یہ دلایل ہیں۔ کہ اّول بعض فقرات عہد عتیق بیان کرتے ہیں۔ کہ خدا آپ مجسم ہو کے دنیا میں آویگا اور ایسے ایسے کام کریگا اور یہ باتیں مسیح میں صاٖٖف صاف پوری ہوئی نظر آتی ہیں۔

دوم ۔ آنکہ ضرور مسیح نے خود الوہیت کادعویٰ کیا اور اُس کا ثبوت بھی دیا اور یہودی اُس کے اس لئے بھی دشمن ہوئے کہ اُس نے آپ کو خدا بتلایا۔

سوم ۔ اُس سے جو قدرت ظاہر ہوئی وہ صاف اﷲ کی قدرت تھی اور اُس نے اُسے اپنی قدرت بتلایا۔

چہارم ۔ اُس نے جو پاکیزگی اور خوبیاں دکھلائیں وہ سب اﷲ کی زات کئ خاصے تھے اور کوئی بشر کبھی ایسا پاک ظاہر نہیں ہوا ہے۔

پنجم ۔ اُس کی ساری تعلیم کا انحصار اسی بات پر ہے کہ اﷲ ہے۔

ششم ۔ وہ اپنی خدائی کا ثبوت اپنے تصرفات سے ہمارے زہنوں میں ابتک کرتا ہے ایسا کہ ناممکن ہے کہ اُس کی الوہیت کا ہم اُنکار کریں۔

پس اب ناظرین خود  انصافاً فیصلہ کر لیں۔ کہ اُلوہیت  خداند مسیح کے اِن کثرت  دلایٔل  کے نزدیک جو کلام ربانی میں مندرج ہیں قرآن صاحب کی وہ چار آیتیں جو اُس کی محض  انسانیت پر دلالت  کرتی۔ کس طرح کامیاب ہو سکتی ہیں۔

(۲ ) قتل مسیح کے یہودی اقراری۔ مگر محمد صاحب انکاری  سورہ النساء آیت  ۱۵۶۔ ’’اور اس قول کے سبب کہ ہم نے عیسیٰ  ابن مریم رسول اﷲ کو قتل کیا ہے۔ حالانکہ نہ اُسے قتل کیا نہ اُسے صلیب دی لیکن وہ اُن کے لئے شبیہ میں ڈالا گیا۔ اور وہ جو اُس کے بارہ میں اختلاف رکھتے ہیں اُس کی نسبت متشکی ہیں اُنہین علم حاصل نہیں لیکن وہ گمان  کی پیروی  کرتے ہیں اور بہ یقین  اُس کو قتل نہیں کیا بلکہ اُسے خدا نے اپنی طرف  اُٹھالیا اور اﷲ غالب پختہ کار ہے‘‘۔

جبکہ قرآن خداوند یسوع مسیح کی اُلوہیت کا انکاری ہے جس کے کھلے ثبوت  اُوپر مذکور ہوچکے تو ضروری  ہے کہ وہ اُس  کے فدیہ کا بھی انکاری ہے۔ جو اُس کی کامل قربانی میں اُس کے مارے جانے  کےزریعہ کامل ہوا۔ اور جس کا زکر اُس کے واقعہ ہونے سے پہلے خداوند مسیح نے اپنے شاگردوں پر برملا ظاہر  کر دیا تھا کہ ’’ سب نبیوں کی معرفت ابن آدم کے حق میں لکھا ہے پورا  ہوگا۔ کیونکہ وہ غیر قوم والوں  کے حوالہ کیا جاویگا اور وے اُسکو ٹھٹھے  میں اُڑاویں  گے اور بے عزت کریں گے اور اُس پر تھوکیں گے اور اُس کو کوڑے مار کے قتل کریں گے اور وہ تیسرے دن جی اُٹھیگا‘‘ لوقا ۱۸: ۳۲، ۳۳۔

چنانچہ اُس کے دُکھ و تکلیف سہنے اور مارے جانے کی بابت  پیشینگوئیاں  بعض نبیوں  کی کتابوں میں پائی جاتی ہیں۔ خصوصاً یسعیاہ  نبی کی کتاب ۵۳ باب میں جو قریباً سات سو برس پہلے اس واقعہ  سے کمال صفائی کے ساتھ بیان ہوئیں۔ کہ وہ یعنے مسیح ہمارے گناہوں اور بدکاریوں کے لئے گھایل کیا اور مارا جاویگا۔ اور کہ اُس کے مار کھانے سے ہم چنگے ہوئے۔ وغیرہ وغیرہ۔ کہ جن کے وقوع کی واقعی  تکمیل خود چشم دید گواہوں خصوصاً  خداوند کے حواریاں سے انجیل مقّدس میں قلمبند کی گئی۔ جنکا خلاصہ  درج زیل ہے۔ ۴

پیشینگوئیاں معہ تکمیل انجیل

۱۔  وہ بیچا اور پکڑوایا جاویگا۔ زبور ۴۱: ۹۔ زکریا ۱۱: ۱۲۔

تکمیل  متی ۲۶: ۱۴ و ۲۳ و ۲۷:  ۳۔۵۔

۲۔ وہ تنہا  اکیلا چھوڑا جاویگا۔ زکریاہ ۱۳: ۷۔

تکمیل  متی  ۲۶: ۵۶ و مرقس ۱۴: ۵۰، ۵۲۔

۳۔ وہ حقیر و زلیل  کیا جاویگا۔ یسعیاہ ۵۳: ۳  و زبور ۲۲: ۷۔۹۔

تکمیل۔ لوقا ۹: ۵۸ و یوحنا ۱۹۔۱۵ و متی  ۲۷: ۳۹۔۴۲۔

۴۔ اُس کے دُکھ و تکلیف سہنے  کی بابت ۔ زبور ۲۳: ۱۴ ۔۱۷  و زکریاہ ۱۲: ۱۰ و یسعیاہ ۵۳: ۲،۵، ۶۔

تکمیل یوحنا ۱۹: ۱۔ ۳  و متی ۲۷:  ۳۵۔ ۳۱۔

۵۔ اُس کے کپڑوں کی تقسیم  کی بابت  زبور ۳۳: ۱۸۔

تکمیل متی ۲۷: ۳۵۔

۶۔ اُس کی موت کی جانکنی کی بابت۔ زبور ۳۳: ۱ یسعیاہ ۵۳: ۴۔ ۵۔

تکمیل ۔ متی ۲۷: ۴۶ و لوقا ۳۳: ۴۴۔

۷۔ اُس کی قبر یادفن ہونے کی بابت  یسعیاہ ۵۳: ۹

۸۔ اُس کے تین دن قبر میں رہنے کی بابت (قول مسیح) متی ۱۲: ۴۰۔

تکمیل ۔ متی ۲۸: ۱۔ ۶ و ۱ قرنتیوں ۵: ۴۔

پس اب مقام  غور ہے۔ کہ نبیوں کی اس قدر شہادتیں اُس کے دُکھ تکلیف اُٹھانے اور مارے جانے پر کلام ربّانی  میں موجود۔ اور جن کی پوری تکمیل چشم  دید گواہوں سے انجیل میں ثابت۔ یہودی  اپنے جرم کے خود اقراری ۔ نیز رومی حاکم  اور اُس وقت کے بت پرست مورّخ اس واقعہ کے گواہ۔ مگر نہایت تعجب ہے کہ محمد صاحب  جو اس واقعہ کے چھ سو برس بعد  پیدا ہوئے۔ اِن سب شہادتوں  اور صداقتوں کو رد کرنے پر مستعد۔ بھلا اِس انوکھے خیال  کا بھی کوئی ٹھکانا ہے۔ جو صرف  اس طرح  کا خیال ہے۔ کہ اگر کوئی اس وقت اپنی تصنیف میں سکندر  اعظم مقدوؔنیہ کے بادشاہ کو ہندوستان  میں آنے کا اِنکار کر کے یہ کہ۔ کہ وہ سب جھوٹے ہیں جو اُس کا پنجاب تک  آنا تسلیم کرتے ہیں۔ وغیرہ وغیرہ۔ تو بھلا  ایسے شخص کو تواریخ دان کیا کہینگے۔

سوم۔ بعض آیات  قرآن  غور طلب

وَقَفَّيْنَا عَلَىٰ آثَارِهِم بِعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ التَّوْرَاةِ  وَآتَيْنَاهُ الْإِنجِيلَ فِيهِ هُدًى وَنُورٌ وَمُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ التَّوْرَاةِ وَهُدًى وَمَوْعِظَةً لِّلْمُتَّقِينَ  وَلْيَحْكُمْ أَهْلُ الْإِنجِيلِ بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ فِيهِ ۚ وَمَن لَّمْ يَحْكُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ

سورہ المائدہ ۵۰، ۵۱ ’’ یعنے  اور پیچھے ہم نے اُن (رسولوں) کے قدموں پر مریم  کے بیٹے عیسی کو بھیجا  جو اگلی ( کتاب ) تورات کی تصدیق کرتا اور اُس کو ہم نے انجیل دی جس میں نورا ہدایات  ہے اور اگلی (کتاب)  تو راۃ  کی تصدیق ہے اور جو ہدایت اور نصیحت  ہے پرہیزگار وں  کے لئے۔ اور چاہئے  کہ جنہوں نے انجیل پائی ہے  حکم کریں اور اُس کا جو اﷲ نے اُس میں نازل کیا ہے اور جو کوئی ھکم نہ کرے اُس کو جو خدا نے نازل کیا ہے تو وہی لوگ بدکار  ہیں‘‘۔

آیات مذکورہ بالا سے چار باتیں ثابت ہیں جن کا قرآن اقراری ہے۔ اول یہ۔ کہ انجیل تورات کی تصدیق کے واسطے نازل ہوئی جو موسیٰ پر اُتری تھی۔ دوم یہ ۔ کہ انجیل خدا کی طرف سے ہدایت نور اور نصیحت ہے۔ سوم یہ ۔ کہ خدا نے اُس میں جو کچھ ارشاد کیا ہے چاہئے کہ لوگ اُس پر عمل کریں۔ چہارم یہ ۔ کہ جو لوگ عمل نہ کریں گے اُس پر جو کچھ خدا نے اُس میں ارشاد کیا ہے تو وہ لوگ گنہگار ہیں۔

مگر اب نہایت تعجب کا مقام ہے ہ وہی قرآن اپنے ان اقراروں کے خلاف  انجیل کی خاص تعلیم یعنے الوہیت خداوند یسوع مسیح اور اُس کی موت کے زریعہ  کفارہ آمیز کام سے جس کی شہادت و صداقت نبیوں کے کلام کے موافق انجیل مقدّس سے بخوبی ثابت و ظاہر ہوئی۔ اور جو انسان کی حصول  نجات  کےلئے ازل سے ٹھہرایا گیا تھا ( افسیوں ۳: ۱۱) جس کا زکر پیچھے  مزکور ہو چکا۔ بالکل انکاری ہے۔ بلکہ اور بھی چند باتیں نہایت گور طلب ہیں۔ کہ جن کا مطلب و منشا تعلیم انجیل کے محض  خلاف  ظاہر  ہے جو زیل میں درج کی جاتی ہیں۔ تو اب مجبوری ہے کہ قرآن کے کلام کو کتب سابقہ  یعنے توریت و انجیل کامصدق کیونکر سمجھا جاوے۔ چنانچہ

( ۵) یہ قرآن جہان کے پروردگار کا کلام اور اُس کا نازل کیا ہوا ہے۔ سورہ الحاقہ آیت ۳۸ سے ۴۳ تک ’’میں قسم کھاتا ہوں اُن چیزوں کوجو دیکھتے ہو اور اُن کی جو نہیں دیکھتے کہ تحقیق یہ (قرآن) عزت والے رسول کا قول ہے۔ وہ کسی شاعر کا کہا ہوانہین تم تھوڑا یقین کرتے ہو۔ اور نہ کسی کاہن کا قول ہے تم تھوڑا دھیان کرتے ۔یہ جہانکے پروردگار کا نازل کیا ہوا ہے۔

پیچھے مذکور ہو چکا ہے کہ نبی اور نبوت کی ضرورت، ضرورت  پر موقوف ہے۔ جس کا خاتمہ کتاب مکاشفات  پر ہو چکا اور جس کے آخر اُس شخص پر جو کلام رباّنی  میں کچھ زیادہ کرے۔ یا اُس میں سے کچھ کم کرے خدا تعالیٰ کی طرف سے نہایت خوفناک فتوئے درج ہوئے۔ یعنے ’’ میں ہر ایک شخص  کے لئے جو اُس کتاب کی نبوت کی باتیں سنُتا  ہے یہ گواہی دیتا ہوں کہ اگر کوئی اِن باتون میں کچھ بڑھاوے تو خدا اُن آفتوں  کو جو اس کتاب میں لکھی ہیں اُس پر بڑھاویگا۔ اور اگر کوئی اس نبوت کی کتاب کی باتون میں سے کچھ نکال  ڈالے تو خدا اُس کا حصہ کتاب حیات سے اور مہر ِمقدس سے اور اِن باتو ں سے جو اِس کتاب میں لکھی ہیں نکال ڈالے گا۔‘‘ مکاشفات ۲۲: ۱۸، ۱۹۔ پس اِس الہیٰ خیال کرنا کس طرح ممکن ہو۔ علاوہ بریں قرآن  کی عدم ضرورت ۔ معلوم کرنے کے لئے کتاب عدم ضرورت قرآن  مصنفہ پادری ٹھاکر داس صاحب بغور مطالعہ۔ کرنا چاہئے تسلی ہو جائیگی۔ 

(۶) قرآن کے موافق راہ نجات۔ سورہ العمران آیت ۲۹۔ ’’اے محمد تو کہدے کہ اگر تم خدا کی محبت رکھتے ہو تو میری پیروی کرو کہ خدا تم سے محبت کرے اور تمھارے گناہ بخشدے اور خدا بخشنے والا اور مہربان ہے ۔ تو کہدے کہ تم اﷲ اور اُس کے رسول کی تابعداری کرو پھر اگر وہ برگشتہ ہوں تو بیشک خدا کافروں کو دوست نہیں رکھتا‘‘۔

انجیل مقّدس میں لکھا ہے کہ گنہگاروں کے راست باز ٹھہرائے جانے اور پاک کئے جانے کے لئے صرف ایک ہی وسیلہ ہے یعنے خداوند یسوع مسیح کا کامل کفارہ ٹھہرایا گیا۔  جو صدق دل سے اُس پر ایمان لاتے ہیں وہی اپنے گناہوں کی معافی حاصل کریں گے۔ چنانچہ یوحنا ۳: ۲۶ میں لکھا ہے۔ کہ ’’وہ بیٹے پر ایمان لاتا ہے سو ہمیشہ کی زندگی اُس کی ہے  اور وہ جو بیٹے پر ایمان نہیں لاتا سو زندگی کو نہ دیکھے گابلکہ خدا کا غصب اُس پر رہتا ہے ‘‘۔اور  مرقس ۱۶: ۱۵ میں۔ 


۱. نوٹ : لیکن اگر کسی دوسرے خبار میں کسی صاحب نےکچھ تحریر کیا ہو تو وہ راقم  تک پہنچانہیں۔

۲. نوٹ: جن کا  جواب محمدی صاحبان کے پاس سوا اس کے اور کچھ نہیں کہ ’’ قرآن میں ایسا ہی لکھا ہے‘‘ سچ ہے۔ مگر انجیل کے سامنے اس کا منجانب اﷲ ہونا نہ آج تک ثابت ہوا اور نہ آیندہ ہو سکتا ہے۔ البتہ قرآن کے ایسے  دعویٰ ثابت  کرنے کےلئے وہ یہ ضرور کہا کرتے ہیں۔ کہ یہ انجیل تحریف و تبدیل  ہوگئی۔ اور وہ اصلی  انجیل ہے ہی نہیں ‘‘ وغیرہ وغیرہ ۔ مگر  اُن کے ایسے  بے بنیاد و بے دلیل خیال  کی قاطع تردید معہ کامل ثبوتوں کے اکثر  مسیحی علماء کی تصانیف  میں  بھری پڑی ہے ۔ جسکو کمال  غور و فکر سے مطالعہ  کرنا نہایت  ضروری  ہے۔ اور جس کا خلاصہ یہ ہے۔ کہ  بلاشک و شبہ یہ وہی اصلی کلام اﷲ انجیل مقدس ہے۔ جو بہ زمانہ  حواریان سے آجتک  بہ حفاظت  تمام مسیحیوں کے ہاتھ  میں صحیح سلامت موجود ہے۔ کہ جس میں کچھ بد لکر بڑھانا  یا گھٹانا کسی انسان کا مقدور نہیں ہے چنانچہ قرآن بھی اس امر کی پوری۔ پوری تائید  کرتا ہے۔ کہ ’’اﷲ کی باتوں (کلام )  کو کوئی  بدلنے والا  نہیں ہے‘‘ دیکھو سورہ انعام آیت ۳۴۔  ۱۱۵ و سورہ یونس  آیت  ۶۵ کو ۔ کہ جس  نہایت خطرناک و مکروہ فعل بچنے کے لئے خدائے تعالیٰ کی طرف سے نہایت خوفناک  فتویٰ اس کے پاک کلام میں بھی درج ہوئے۔ کتاب کا مکاشفات ۲۳: ۱۸، ۱۹ کو ۔ کہ جسکی کاملیت کا کامل ثبوت صرف یہی کافی ہو سکتا ہے۔ کہ اسکی تعلیم دیگر  کل مذاہب  کی تعلیموں پر غولب  ہے۔ جس کی بہت کچھ حقیقت  مضمون ’’بعض خیالات ۔ محمدی پرسر سری ریمارکس‘‘ میں ظاہر ہو چکی یا آیندہ ظاہر  ہو جائیگی۔ جو امر نہایت غور ہے کہ بے تعصب  آزمایا  جاوے۔ مولوی رحمت اﷲ کے ترجمہ میں لکھا ہے ’’پس جب قبض  کیا تونے‘‘ معنے دونوں کے ایک ہی ہیں۔ مگر یہی قرآن  دوسرے مقام میں خداوند یسوع مسیح کی وفات  کا انکاری  ہے۔ دیکھو سورہ النساء  آیت  ۱۵۶، ۱۵۷۔ جس کا زکر آیندہ کیا جاویگا۔

۳. بیضاد میں بھی لکھا ہے کہ ’’ روح منہ زو روح صدر منہ‘‘ یعنے صاحب روح  ہے جو نکلی ہے اﷲ سے

۴. نوٹ۔ جن میں سے بعض کا مضمون بالکل صاف ہے۔ مگر بعض  شارہ یا کنایہ کے طور پر مذکور ہوئیں۔ مگر اُ ن کا مطلب بھی تکمیل انجیل کے مقابلہ  سے بخوبی کھل جاتا ہے۔ جنکا زکر آیندہ  بیان مسیح کے جی اُٹھنے میں کیا جائیگا۔

Beach with Salt grass

کیا قرآن میں کتب مقدسہ بیبل کی تحریف کا دعویٰ ہے؟

ٹامس ہاول

Does Qur’an Claim Corruption in the Holy Bible?


Published in Nur-i-Afshan July 17, 1896
By
Thomas Howell, “Native,” by the Bishop of Lahore


اکثر جاہل محمدی مسیحیّوں کے روبرو بے سوچے  سمجھے کتب  مقدسہ بائبل  کی تحریف  کا دعویٰ کیا کرتے ہیں اور جب اُن سے کہا جاتا ہے کہ کتب مقدسہ  بائبل کا تحریف  ہونا عقلاً و نقلاً  باطل ہے تو ہٹ دھرمی کر کے کوئی نہ کوئی آیت قرآنی  بے سمجھی  سے پیش کر دیا کرتے ہیں۔ لہذا ہمنے مناسب  جانا کہ ایسی سب آیات  کو قرآن  سے اخز کر کے ایسے لوگوں کی آگاہی کےلئے معہ اُن کےمعتبر مفسروں و محدتوُں ورادیوں کے بیان سے پیش کر کے ظاہر کر دیں کہ قرآن کتب مقدسہ بائبل کی تحریف  کا دعویٰ نہیں کرتا  اور جو لوگ قرآن کو اس باب میں مدعی سمجھتے ہیں یہ  محض اُن کی نادانی و جہالت ہے۔  وہو ہذا:۔

۱۔ سورہ انعامؔ ۱۱۔ رکوع ۹۳۔ وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ إِذْ قَالُوا مَا أَنزَلَ اللَّهُ عَلَىٰ بَشَرٍ مِّن شَيْءٍ قُلْ مَنْ أَنزَلَ الْكِتَابَ الَّذِي جَاءَ بِهِ مُوسَىٰ نُورًا وَهُدًى لِّلنَّاسِ تَجْعَلُونَهُ قَرَاطِيسَ تُبْدُونَهَا وَتُخْفُونَ كَثِيرًا وَعُلِّمْتُم مَّا لَمْ تَعْلَمُوا أَنتُمْ وَلَا آبَاؤُكُمْ قُلِ اللَّهُ ثُمَّ ذَرْهُمْ فِي خَوْضِهِمْ يَلْعَبُونَ۔

ترجمہ۔  اور انہوں نے الله کو صحیح طور پر نہیں پہچانا جب انہوں نے کہا الله نے کسی انسان پر کوئی چیز نہیں اتاری تھی جو لوگو ں کے واسطے روشنی اور ہدایت تھی جسے تم نے ورق ورق کر کےد کھلا یا اوربہت سی باتو ں کو چھپا رکھا اور تمہیں وہ چیزیں سکھائیں جنہیں تم اور تمہارے باپ دااد نہیں جانتے تھے تو کہہ دو الله ہی نے اتاری تھی پھرانہیں چھوڑ دو کہ اپنی بحث میں کھیلتے رہیں۔

جلال الدین اس آیت کی شرح میں لکھتا ہے۔

ما قد روای الیھود۔ اُنہوں نے نہ قدر کی یعنے یہود نے۔

ازقالوا النبی وقد خاصموہ فی القرآن۔ جب کہتے ہیں نبی کو جس وقت قرآن میں اُس کے ساتھ تکرار کرتے تھے ۔ تجعلونہ قراطیس ای تلتبونہ فی دفاتر مقطعة ۔ تم اُسے کاغذ کے تختوں پر بناتے ہو یعنے جدے جدے ٹکڑوں پر لکھتے۔ ( اور مراد اُن ٹکڑوں سے وہ چمڑے خواہ کاغذ کے علیٰحدہ علیحٰدہ بند ہیں کہ جن پر قدیم سے یہودیوں کے درمیان کتاب مقدس کے جدا جدا نوشتوں کی جدُا جدُا نقل کرنے کا دستور تھا) تبدونھا اے ماتحبون ابدائة منة ۔ دکھلاتے یعنے وہ کہ جو تم اُس میں سے دکھلانے چاہتے ہو۔ وتحفو کثیر امما فیھا کنعت محمدِ ۔ اور بہت چھپاتے ہو یعنے اُسے کہ جو اُس کے درمیان ہے مثلاً تعریف محمد صاحب۔

تفسیر  حسینی میں ہے۔

آوروہ اندکہ مالکؔ بن الفیف کہ حلقہ احبار یہود بود بخدمت سید عالم آمد آخحضرت بادے  گفت سو  گندمیدہم  ترا بدان خدائے کہ توریت را بر موسیٔ  نازل  گر دانید کہ تو در توریت دیدۂ کہ خدائے تعالیٰ دانشمند  فربہ رادشمن میدار دگفت آوے ایں خبر در توریت ہست۔ حضرت فرمود کہ آن خبر تن پر ور  خود پرست تولیٔ اودرغضب شدو گفت خدائے ہیچ کتاب برہیمکپس  نازل نہ ساختہ  است آیت آمد کہ ایں ہا خداے را چنانچہ مےباید وصف نہ کروند۔ الخ

تفسیر ؔ جلالین سے ظاہر ہے کہ یہودی اپنی مقّدس کتابوں  کے جدُے جدُے حصےّ کر کے نقل کرتے تھے اور اس صورت میں محمد صاحب  کے ساتھ مباحثہ کے وقت  اُنہیں اختیار تھا کہ جن حصوں کو اپنے مفید سمجھیں اُنہیں پیش کریں اور باقیوں کو پوشیدہ رکھیں۔پس اگرچہ اس کا کوئی پختہ ثبوت نہیں ہے کہ اکثر اوقات یہودان مدینہ ایسا کرتے تھے۔  کیونکہ جب آیت  رجم کی بابت مباحثہ  ہوا تو آیت رجم توریت میں پائی گئی ہے۔ دیکھو مظاہر حق جلد ۳ صفحہ ۲۸۰ ۔ اور توریت صرف یہودیوں  ہی کے پاس نہ تھی بلکہ یہوؔدیوں  اور عیسائیوں کے پاس بھی تھی۔ اور ان دونوں فریق کے لوگ جوآپس میں مخالف تھے توریت کو پڑھا کرتے تھے۔ ،ظاہر حق جلد ۱ صفحہ ۱۱۸ ۔ اور پھر نہ صرف یہودی و عیسائی توریت کو پڑھتے  و رکھتے تھے بلکہ محمدی بھی توریت کو  پڑھتے تھے۔ مظاہر حق جلد ۱ صفحہ  ۲۷۱۔ اور عمر خلیفہ کے پاس بھی توریت تھی۔  اور وہ اُس کو پڑھتا تھا۔ مظاہر حق جلد ۱ صفحہ ۹۴۔ لہذا اگر کوئی شخص  یہود مدینہ میں سے کسی حصّہ کتاب اﷲ کو اپنے پاس چھپا بھی رکھتا تو یہ لوگ جو خاص  مدینہ ہی میں توریت پڑھنے والے تھے کب اُسے چھپانے دیتے تھے۔  بالفرض اگر مانا بھی جائے کہ چند یہود مدینہ یا مالک بن الضیف ؔ سکنہ مدینہ نے بسبب دشمنی و محمد صاحب  کے ساتھ مباحثہ کرنیکے لئے کوئی حصہ  توریت کا پیش نہ کیا ہو۔ تو یہ الزام  سب یہودیوں پروارد نہیں ہو سکتا۔ اور ایسے دعویٰ کی تحریف سے واسطہ  ہی کیا ہے۔  بلکہ برعکس اس کے ظاہر ہے کہ توریت اﷲ نے نازل کی ہےاور نور ہے اور یہودیوں کے پاس موجود تو ہے لیکن وہ اسکے سارے  حصّے  مباحثہ کیوقت پیش نہیں کرتے۔ اور پھر اس سے  یہ بھی طاہر ہوتا ہے کہ اگر حسودان محمد صاحب اپنے گھر کی کتب مقدسہ میں تحریف کر سکتے تو اُن کو بعض حصے کتب عماوی کے پوشیدہ ہے نہ کرنے پڑتے  بلکہ محرف کو لاأگے دہرتے۔ پس اس سے ظاہر ہے کہ قرآن میں کتب سماوی کی تحریف کا دعویٰ مذارد ہے۔

۲۔ بقر ۵ رکوع ۴۱۔ آیت  میں ہے

 وَلَا تَلْبِسُوا الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُوا الْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ

ترجمہ۔ اور سچ میں جھوٹ نہ ملاؤ اور جان بوجھ کر حق کو نہ چھپاؤ سچ کوجان کر ۔

امام فخرالدین رازی ۔ تفسیر کبیر میں لکھتے ہیں۔

وَلَا تَلْبِسُوا الْحَقّ۔ بسبب الشبھات التی تورد ونھا  علی السامعین و زلک لان النصوص الوادة فی التوراة والا نجیل فی امر محمدصلیﷲ علیہ وسلم  کانت نصوصاً  خفیۃ تحتاج فی معرفتھا الاستدان ثمہ انھم  کانوایجاد لون فیھا و شوشون وجو کالدال ة  علی المتاملین فیھا بسبب القاء الشبھات وھزا ھوالمواد بقولہ ولا تلبسوا الحقّ۔

ترجمہ۔ اور مت ملاؤ صحیح میں غلط بسبب اُن شبہوں کے جو سنُنے والوں پر ڈالتے  ہو اور یہ بات اس سبب سے تھی  کہ توریت و انجیل  میں جو آیتیں محمدﷺ کے  باب میں  آئی ہیں وہ آیات  خفیہ  ہیں اُن کے جاننے میں اسدلال کی طرف حاجت  ہوتی ہے۔ پھر وہ لوگ اُن میں جھگڑا کرتے تھے اور مشوش کر دیتے تھے دلیلوں کو سوچنے والوں پر سبب دالنے  شبہوں کے۔ اور یہی مراد  اﷲتعالیٰ کے قول  کی ہے کہ مت ملاؤ صحیح  میں  غلط۔

پس امام فخر الدین ساحب  رازی کے بیان سے اشکارہ ہے کہ اس آیت میں جو یہودیوں کو صحیح میں غلط  ملانے کا الزام دیا گیا تھا۔ وہ  صرف غلط  تاویل بیان کرنے کا تھا کہ جس سے مشوش کر دیتے تھے دلیلوں کو سوچنے والون پر بسبب ڈالے شبہوں کے ۔ نہ یہ کہ وہ لکھی ہوئی کتب  آسمانی میں کچھ ملا دیتے تھے۔ کیونکہ کتب سماوی میں ملانا  تو یہود مدینہ کے اختیار  سے باہر تھا اس لئے کہ اُن کی پاک کتابیں  نہ اُنہیں کے پاس تھیں بلکہ محمدیوں کے پاس بھی تھیں اور وہ اُنہیںپڑہا  بھی کرتے تھے۔ مظاہر حق جلد ۱ صفحہ ۴۷۱۔ و صفحہ ۹۴۔ لہذا ظاہر ہے کہ قرآن  کتب مقدسہ کی تحریف کا دعویٰ نہیں کرتا مگر صرف  تاویلات  باطلہ  کا جیسا کہ آج کل خود محمدی بھی بوقت مباحثہ آیات قرآنی  کی کیا کرتے ہیں۔ 

۳۔ بقر ۹ رکوع ۷۴، ۷۵، ۷۶۔

  أَفَتَطْمَعُونَ أَن يُؤْمِنُوا لَكُمْ وَقَدْ كَانَ فَرِيقٌ مِّنْهُمْ يَسْمَعُونَ كَلَامَ اللَّهِ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُ مِن بَعْدِ مَا عَقَلُوهُ وَهُمْ يَعْلَمُونَ وَإِذَا لَقُوا الَّذِينَ آمَنُوا قَالُوا آمَنَّا وَإِذَا خَلَا بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ قَالُوا أَتُحَدِّثُونَهُم بِمَا فَتَحَ اللَّهُ عَلَيْكُمْ لِيُحَاجُّوكُم بِهِ عِندَ رَبِّكُمْ  أَفَلَا تَعْقِلُونَ أَوَلَا يَعْلَمُونَ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ۔

ترجمہ۔ کیا تمہیں امید ہے کہ یہود تمہارے کہنے پر ایمان لے آئیں گے حالانکہ ان میں ایک ایسا گروہ بھی گزرا ہے جو الله کا کلام سنتا تھا پھر اسے سمجھنے کے بعد جان بوجھ کر بدل ڈالتا تھا۔ اور جب وہ ان لوگوں سے ملتے ہیں جو ایمان لاچکے ہیں تو کہتے ہیں ہم بھی ایمان لے آئےہیں اور جب وہ ایک دوسرے کے پاس علیحدٰہ ہوتے ہیں تو کہتے ہیں کیا تم انہیں وہ راز بتا دیتےہو جو الله نے تم پر کھولے ہیں تاکہ وہ اس سے تمہیں تمہارے رب کے روبرو الزام دیں کیا تم نہیں سمجھتے۔ کیا وہ نہیں جانتے کہ الله جانتا ہے جو وہ چھپاتے ہیں اور جو وہ ظاہر کرتے ہیں۔

آیت ۷۴ میں جو ہے۔ ’’ کہ سنُنے تھے کلام اﷲ پھر اُس کو  بدل ڈالتے۔ ‘‘ اس سے طاہر ہے کہ یہ الزام یہود و مدینہ کو تحریف  زبانی کا ہے۔ نہ یہ کہ وہ کتاب کی لکھی ہوئی عبارت کو بدل ڈالتے تھے۔

چنانچہ تفسیر بیضادی میں ہے۔

يَسْمَعُونَ كَلَامَ اللَّهِ یعنے التورة۔ سنتے ہیں کلام ﷲ کا یعنے توریت۔ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُ کنعت محمد وایة الرحیم اوتا ویلم فیسفر ونة  بما یشتھون۔ ترجمہ۔ اور پھر اُسے بدل ڈالتے ہیں مثلاً بیان  محمد کا اورسنگ سار کرنے کی آیت  یا اُس  کی تاویل  پس جیسا اُن کا دل چاہتا ہے اُس کی تفسیر کر لیتے ہیں۔

یہاں بیضادی کے بیان سے بھی  ظاہر  ہے کہ جو کچھ یہود مدینہ محمد صاحب کی تعریف  یا سنگسار  کرنے کی آیت کی بابت سنُتے  تھے اُس کی تفسیر یا تاویل جیسا کہ اُن کا دل چاہتا تھا کر لیتے تھے۔  نہ یہ کہ وہ اپنی لکھی ہوئی کتابوں میں تحریف  کرتے  تھے کیونکہ ایسا کرنا تو یہود و مدینہ کی دست قدرت سے باہر و بالکل ناممکن  تھا۔

تفسیر حؔسینی میں ہے۔

أَفَتَطْمَعُونَ ۔ ایاطمع دربستہ ایدای مومنان ۔ أَن يُؤْمِنُوا ۔ آنکہ تصدیق کنند داستوار دارندجہودان ۔ لَكُمْ ۔ مرشمار اور انچہ سیگوئید از نعت پیغمبر و حقیقت دین اسلام ۔ وَقَدْ كَانَ ۔ واحلانکہ بوومز۔ فَرِيقٌ مِّنْهُمْ ۔ می شنید مز كَلَامَ اللَّهِ ۔ سخن خدائے رابر کوہ طور ۔ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُ ۔ پس بگردانیدمز آں سخن را ۔ مِن بَعْدِ مَا عَقَلُوهُ ۔ پس ازانکہ دانستہ بووند داریافتہ وچوں بمیا قوم در آمدندگفتند ما سخن حق وامر و نہی اوشنیدیم و لیکن در آخر گفت کہ اینھا کہ فرمودیم اگر توانید بکنید و اگر قادرنہ باشید برادات آں مکنید و باک مدارید ۔ وَهُمْ يَعْلَمُونَ ۔ وایشاں میدانند کہ افتراحی نمایند۔ دربنابیح آوردہ کہ روزے حضرت رسالت پناہ فزود کہ جہودان بعد ازیں در مدینہ نیایند کہ ازور آمدن ایشاں بمدینہ فتنہ ظاہر ہر مشیود بعضے ازمنا فقان جہوؔد اول روز بمدینہ درے آمدند کہ ما مسلمانیم ہمچوں شماو اخر روز باز گشتہ بیا ران خود مے پیو ستند کما قال اﷲ تعالیٰ ۔ وَإِذَا لَقُوا ۔ وچوں ملاقات کنند یہود الَّذِينَ آمَنُوا ۔ آنا نراکہ ایمان آوردہ انداز اصحاب رسولﷲ قَالُوا آمَنَّا ۔ گویند مانیز گرویدہ ایم ۔ وَإِذَا خَلَا ۔ وچوں خلوت کنند بَعْضُهُمْ ۔ برخے ازا صاغر ایشاں إِلَىٰ بَعْضٍ برخے ازا کا برالیشاں چوں۔ کعبؔ بن اشرف۔ وحی بن اخطبؔ ۔ قَالُوا قَالُوا ۔ گویندأں اکا برایشاں راکہ ۔ أَتُحَدِّثُونَهُم ۔ آیا شما حدیث میکفید و خبر میدہید اصحاب محمدرا ۔ بِمَا فَتَحَ اللَّهُ ۔ بدانچہ کشاوہ است خدائے ابواب دانش آئزا ۔ عَلَيْكُمْ ۔ بر شما درکتاب شما۔ قولے آنست کہ بعضے از یہود مدینہ در ادل نزول آخحضرت اصحاب را از نعت و صفت دے کہ در توریت مذکور بود خبردار ندورو سائے ایشاں ازاں آگاہی یا فتہ نجران را ازاں سر زنش نمود مزکر شما ایشاں را از صفت محمد خبر مید ہید ۔ لِيُحَاجُّوكُم بِهِ ۔ تامی صمت کنند و حجت گیر مزبانچہ دانستہ ناخند عِندَ رَبِّكُمْ ۔ نزوپروردگار شمادر روز قیامت و گو یند شما حق راد دانستید و متابعت نہ کروید ۔ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ۔ آیا چرانمی یا بیدایں مقدار کہ اسرار خودرا باخصم درمیان نباید نہاد ۔ أَوَلَا يَعْلَمُونَ ۔ آیا تمیدانند جہودان کہ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ ۔ بتحقیق خدائے میداند ۔ مَا يُسِرُّونَ يُسِرُّونَ ۔ آنچہ پنہاں میدار نداز عداوند رسول واصحاب او او وَمَا يُعْلِنُونَ ۔ آنچہ آشکارہ می کنند ازدوستی پیغمبر و صحابہ بنفاق پس ہر کہ دامزکہ حق سبحانہ تعالیٰ دانائے آشکارا ونہانست باید کہ ظاہر خودرا بفرمانبرداری آراستہسازد و باطن خودرا ازلوث ناپاکی بپردازہ۔

پس مُلآں حُسینی کے بیان سے بھی ظاہر ہے کہ چند یہودیوں نے سخن خدا کو کوہ طور پر سنکے (کہ جس وقت موسیٰ اُن کا بڑا نبی اُن میں زندہ موجود تھا اور ہنوز توریت کو لکھ رہا تھا) زبانی یہ کہ سُنایا تھا۔ کہ اگر تعمیل  کر سکو تو کرو ورنہ نکرو۔ نہ یہ کہ اپنی کتاب میں سے جس کو ہنوز موسیٰ لکھ بھی نہ چکا تھا کچھ نکال ڈالا یا برہا دیا تھا۔

جیسا کہ اُن سطور مزکورہ بالاسے کہ جن پر خط کھینچا گیا ہے ظاہر ہے۔ خیراگرچہ بضد مشکل یہ بیان محمدی مفسرین کا صحیح  بھی مانا  جاوے تو بھی تحریف  لفظی  کتب  سماوی سے اسے کچھ تعلق  نہیں کیونکہ صاف  ظاہر ہے کہ اُس  وقت کوہ طور پر سے چند یہودی سنُتے کچھ تھے اور بیان مبالغہ کے ساتھ کچھ اور کر دیتے تھے۔ اور توریت جو موسیٰ کے ہاتھ میں تھی اور ہنوز وہ اُس کو لکھ رہا تھا محفوظ تھی۔ اُس کی تحریف کی نسبت قرآن  دعویدار نہیں ہے۔ اور پھر پوشیدہ  کرتا خبر محمد کا الزام ۔ کعب ؔبن  اشرف  وحی ؔبن اخطب ساکنان مدینہ کو دیا گیا ہے نہ کہ تمام  جہاں کے یہودیوں کو۔ اور اگر ان دو شخصوں پر ایسا الزام ثابت بھی ہو سکے کہ وہ دیگر یہود سکنہ مدینہ ک یہ کہتے  ہوں کہمحمد کی خبر کی بات اُس کے اصحابوں کو نہ کہا کرو تو بھی اس کو تحریف لفظی مقدسہ سے کچھ علاقہ نہین ہے جیسا کہ آیت رجم  کے پوشیدہ کرنے کے مقدمہ سے ظاہر ہے۔  وہوہذا۔

چنانچہ آیت رجم  کے پوشیدہ کر نے کے مقدمہ کی بابت مظاہر حق جلد ۳ صفحہ ۲۸۰ پر یوں لکھا ہے۔ 

ترجمہ۔ روایت ہے عبداﷲ بن عمر سے یہ کہ یہودی آئے  طرف رسول خدا ﷺ کے اور زکر کیا اُنہوں نے روبرو حضرت کے یہ کہ ایک مرد نے اُن میں سے اور ایک عورت نے زنا کیا۔ پس فرمایا اُن کو رسول خداﷺ  نے۔ کہ کیا پاتے ہو تم توریت میں بیچ  مقدسہ رجم کہ۔ کہا یہودی نے نصیحت کرتے ہین ہم زنا کرنیوالوں کو اور درے درے جاتے ہیں وہ۔ کہا عبداﷲ بن سلام نے جھوٹھ بولتے ہو تم تحقیق توریت مین بھی رؔجم ہے  پس لاؤ توریت پس کھولو اُس کو اور  رکھ دیا ایک نے اُن میں سے  ہاتھ اپنا رجم کی آیت پر۔ پس پڑھ گیا  اُس کے پہلے  سے اور اُس کے پیچھے سے۔ پس کہا عبداﷲ بن سلام نے اُٹھا ہاتھ اپنا۔ پھر اُٹھایا ہاتھ۔ پس ناگہاں اُس میں تھی آیت رجم کی۔ پس کہا یہودیوں نے۔ کہ سچ کہا عبدؔاﷲ نے اے محمد اس میں ہے آیت رجم کی۔ پھر حکم فرمایا اُن دونوں کے سنگسار کرنے کا نبیﷺ  نے۔ پس سنگسار کئے گئے دونوں اور ایک روایت  میں ہے۔ کہ کہا عبداﷲ نے اُٹھا ہاتھ اپنا۔  پس اُٹھا لیا ہاتھ اپنا۔ پس ناگہاں آیت  رجم  کی ظاہر تھی۔ پھر کہا ہاتھ رکھنے والے نے اے محمد تحقیق توریت میں ہے آیت رجم کی و لیکن ہم چھپاتے ہیں اُس کو آپس میں۔ پس حکم فرمایا حضرت نے اُن دونوں کے سنگسار کرنے کا۔ پس سنگسار کئے گئے۔ نقل کی یہ نجاری اور مسلم نے۔

پس اس سے ثابت  ہے کہ یہود مدینہ  پر الزام  تحریف کا لگایا جاتا تھا وہ الزام  صرف  زبانی جمع خرچ کا تھا نہ کہ توریت میں سے کسی حرف کے کم و بیش  کرنے کا۔ جیسا کہ آیت رجم کے مقدمہ سے ہویدا ہو چکا ہے۔ کیونکہ اب بھی توریت میں وہی آیت  رجم کی موجود ہے۔ استثنا ۲۲: ۲۳، ۲۴۔ لہذا قرآن  میں بجز ایسے ویسے  الزاموں کے کتب سماوی میں سے کسی لفظ کے  کم و بیش ہونے کا الزام کہیں بھی نہیں ہے۔ بلکہ برعکس  اس کے ایسی تعریف کتب  سماوی کی قرآن  میں موجود ہے کہ کوئی ہوشمند قرآن کو دعویٰ تحریف  کتب مقدسہ کا مدعی نہیں قرار دیسکتا۔ 

۴۔ بقر۶ رکوع ۵۷، ۵۸۔

وَإِذْ قُلْنَا ادْخُلُوا هَٰذِهِ الْقَرْيَةَ فَكُلُوا مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ رَغَدًا وَادْخُلُوا الْبَابَ سُجَّدًا وَقُولُوا حِطَّةٌ نَّغْفِرْ لَكُمْ خَطَايَاكُمْ  وَسَنَزِيدُ الْمُحْسِنِينَ فَبَدَّلَ الَّذِينَ ظَلَمُوا قَوْلًا غَيْرَ الَّذِي قِيلَ لَهُمْ فَأَنزَلْنَا عَلَى الَّذِينَ ظَلَمُوا رِجْزًا مِّنَ السَّمَاءِ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ۔

ترجمہ۔ اور جب ہم نے کہا اس شہر میں داخل ہو جاؤ پھر اس میں جہاں سے چاہو بے تکلفی سے کھاؤ اور دروازہ میں سجدہ کرتے ہوئے داخل ہو اور کہتے جاؤ بخش دے تو ہم تمہارے قصور معاف کر دیں گے اور نیکی کرنے والوں کو زیادہ بھی دیں گے۔ پھر ظالموں نے بدل ڈالا کلمہ سوائے اس کے جو انہیں کہا گیا تھا سو ہم نے ان ظالموں پر ان کی نافرمانی کی وجہ سے آسمان سے عذاب نازل کیا۔

۵۔ بقر ۱۲ رکوع ۱۰۱۔

  وَلَمَّا جَاءَهُمْ رَسُولٌ مِّنْ عِندِ اللَّهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْ نَبَذَ فَرِيقٌ مِّنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ كِتَابَ اللَّهِ وَرَاءَ ظُهُورِهِمْ كَأَنَّهُمْ لَا يَعْلَمُونَ۔

ترجمہ۔ اور جب ان کے پاس الله کی طرف سے وہ رسول آیا جو اس کی تصدیق کرتا ہے جو ان کے پا س ہے تو اہلِ کتاب کی ایک جماعت نے الله کی کتاب کو اپنی پیٹھ کے پیچھے ایسا پھینکا کہ گویا اسے جانتے ہی نہیں۔

یہاں مفسرین کے بیان کے بموجب  رسول سے مراد محمد صاحب ہیں۔ اور کتاب اﷲ سے مراد توریت ہے۔ اور مطلب یہ ہے کہ جب محمد صاحب یہودیوں کے پاس آیا اور اُن کے پاک نوشتوں کی تصدیق کی اور جس رسول کے آنے کے وہ منتظر تھے وہی اپنے تئیں قرار دیا تو بھی یہودیوں نے اُسے نہ مانا۔ اور اس ڈھب  سے اﷲ  کی کتاب یعنے توریت کو اپنی پیٹھ کے پیچھے  ایک جماعت مدینہ نے پھینکدیا یعنے وعدہ توریت  پر عمل  نہ کیا۔ نہ یہ کہ توریت کو تحریف  کر ڈالا۔ 

پس طاہر ہے کہ محمد ساھب کے آنے تک تو یہود مدینہ توریت کے وعدہ پر عمل کرتے رہے لیکن جئب محمد صاحب  آگئے تو یہودی مدینہ میں کیس ایک  فریق نے کتاب اﷲ توریت عمل نہ کیا۔پس جس حال میں موسیٰکے زمانہ سے تا زمانۂ محمد صاحب  توریت یہودیوں میں اور خداوند مسیح کے زمانہ سے توریت عیسائیوں کے تمام فریق  میں تقریباً اکیس ۲۱ سو برس  تک ملک بملک جاری و مشتہر رہی تو اب  یہود مدینہ کے کسی ایک  جموعت کے اُسپر عمل نہ کرنیسے وہ تحریف نہیں ہو سکتی تھی۔ لہذا قرآن میں تحریف کتب سماوی کا دعوی نہیں ہے۔

۶۔ بقر ۱۶ رکوع ۱۴۰۔

  أَمْ تَقُولُونَ إِنَّ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَالْأَسْبَاطَ كَانُوا هُودًا أَوْ نَصَارَىٰ  قُلْ أَأَنتُمْ أَعْلَمُ أَمِ اللَّهُ  وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن كَتَمَ شَهَادَةً عِندَهُ مِنَ اللَّهِ  وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ۔

ترجمہ۔ یا تم کہتے ہو کہ ابراھیم اور اسماعیل اور اسحاق اور یعقوب اور اس کی اولاد یہودی یا نصرانی تھے کہہ دو کیا تم زیادہ جانتے ہو یا الله اور اس سے بڑھ کر کون ظالم ہے جو گواہی چھپائے جو اس کے پاس الله کی طرف سے ہےاور الله بے خبر نہیں اس سے جو تم کرتے ہو۔

اس سے اوپر کی آیت پر گور کرنے سے معلوم ہوتا ہے۔ کہ اہل کتاب  محمدیوں کو کہتے تھے۔ 

وَقَالُوا كُونُوا هُودًا أَوْ نَصَارَىٰ تَهْتَدُوا  قُلْ بَلْ مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا  وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ ۔

ترجمہ۔ اور کہتے ہیں کہ یہودی یا نصرانی ہو جاؤ تاکہ ہدایت پاؤ کہہ دو بلکہ ہم تو ملت ابراھیمی پر رہیں گے جو موحد تھا اور مشرکوں میں سے نہیں تھا۔      

غرض اہل کتاب محمدیوں کو کہتے تھے۔ کہ تم یہودی یا عیسائی ہو جاؤ تو راہ پر آؤ گے اور محمد صاحب نے اُنہیں جواب دیا کہ ہم نے ابراہیمؔ حنیف کی راہ پکڑی۔ چونکہ یہودیوں کی لغت میں لفظ (سر یہاں یونانی الفاظ تھے) خنفؔ کہ جس سے حنیفؔ مشؔقق ہے ۔ کفرؔ کرنا۔ و ناپاک ؔکرنا۔  و ناپاک ہونے کے معنے دیتا ہے۔ اور اُن کی مقدس کتابوں میں بھی یہ لفظ انہیں معنوں سے آیا ہے۔ دیکھو یسعیاہ ۔ ۲۴: ۵۔ یرمیاہ۔ ۱۳: ۱۱، ۳: ۹، ۲ مزمور ؔ ۱۰۶: ۳۸۔ میکاہ ۴: ۱۱ گنتی۔ ۳۵: ۳۳۔ دانیل ۱۱: ۳۲۔ میں اسی لفظ کے اشتقاق ہیں جن کے معنے ناپاک ہوئے ہیں۔ پھر یہودی لعنت میں لفظ ( سر یہاں یونانی \عبرانی  الفاظ ہیں) خفیف کےمعنے ۔ کافؔر۔ ریاکؔار۔ شرؔیر۔  خطاؔکار کے ہیں۔ جیسا کہ ایوب ۸: ۱۳،  ۱۳: ۱۶، ۱۵: ۳۴، ۱۷: ۸، ۲۷: ۸، امثال ۱۱: ۹، ایوب ۲۰: ۵، ۳۴: ۳۰، یسعیاہ ۔ ۹: ۱۶، ۱۰: ۶۔ اور پھر اسی لفظ کے اشتقاق۔ بیدؔین و کمینہؔ کے معنے بھی دیتے ہیں۔ جیسا کہ ایوؔب  ۳۶: ۱۳ ، یسعؔیاہ۔ ۳۳: ۱۴، ۳۲: ۶ ، یرمیاہؔ  ۔ ۲۳: ۱۵ مزمورؔ ۳۵: ۱۶۔

پس طاہر ہے کہ اسی سبب سے یہودی اس لفظ کا اطلاق اپنے جد بزرگ ابراہیم پر ناپسند  کرتے اور انکار کر کے محمد صاحب کو کہتے تھے کہ ابراہیم حنیؔف نہ تھا کیونکہ حنیف کے معنے کافر وغیرہ بہت برُے ہیں۔ لیکن محمد  صاحب اُن  کو کہتے تھے کہ تم نہیں جانتے اور خدا تم سے بہتر  جانتا ہے کہ ابراہیم حنیؔف  تھا اور مشرک نہ تھا اور تم توریت کی شہادت جو تمہارے پاس ہے  چھپاتے ہو۔ جیسا کہ جلال الدین اُس کی تفسیر میں لکھتا ہے۔

ومن اظلم ممن۔الخ۔ ای لا احد اظلم منۃ و ھم الیھود کتھوا شھادۃ فی التوراۃ ل وابرا ھیم بالحنیفۃ۔

ترجمہ۔ اور اُس سے زیادہ ظالم کون ہے یعنے ُس سے زیادہ اور کوئی ظالم نہیں ہے اور وہ  یہود تھے جنہوں نے توریت کی شہادت کو کہ اِبراہیم حؔنیف تھا چھپایا۔

پس ظاہر ہے کہ لفظ ( یونانی\عبرانی الفاظ) حؔنیف اب بھی کتب مقدسہ میں موجود ہے اور جس سبب سے یہود مدینہ  اس لفظ  کے اطلاق کرنے کے ابراہیم پر انکاری تھے وہ بھی ظاہر ہے پھر اُنہوں نے چھپایا ہے کیا تھا۔ نہ تو کبھی پاک کلام میں اس لفظ  کا اطلاق  ابراہیم  پر ہوا  اور نہ کوئی عقلمند ایسے لفظ کا ابراہیم جیسے بذرگ و برگزیدہ شخص پر اطلاق کرنا جایز سمجھ سکتا تو پھریہود مدینہ کا کیا خطا تھا۔ اور پھر جس حال میں قرآن  خود کہتا ہے کہ ’’شہادت اﷲ کی اُن کے پاس ہے‘‘۔ تو اس سے چھپانے کا یہ مطلب  ہر گز نہیں کہ وہ کتاب مقدسہ میں تحریف کرتے تھے بلکہ صاف یہ ہے کہ کتاب میں تو اُن کے پاس بقول قرآن شہادت موجود ہے مگر محمد صاحب  کے قول کی تصدیق کے لئے وہ نہیں دکھاتے اس سے صاف ثابت ہے کہ قرآن میں تحریف کتب  سماوی کا دعویٰ نہیں ہے۔ 

۷۔ بقر ۱۷۔ رکوع ۱۴۷۔

 الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَعْرِفُونَهُ كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَاءَهُمْ  وَإِنَّ فَرِيقًا مِّنْهُمْ لَيَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ الْحَقُّ مِن رَّبِّكَ  فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُمْتَرِينَ۔

ترجمہ۔ وہ لوگ جنہیں ہم نے کتاب دی تھی وہ اسے پہچانتے ہیں جیسے اپنے بیٹوں کو پہچانتے ہیں اور بےشک کچھ لوگ ان میں سے حق کوچھپاتے ہیں اور وہ جانتے ہیں آپ کے رب کی طرف سے حق وہی ہے پس شک کرنے والوں میں سے نہ ہو۔

اس سے قبل  آیت  اور اس آیت کے شان  نزول سے ظاہر  ہے کہ محمد صاحب پہلے یہودیوں کی بیت المقدس  کی طرف منُہ کر کے نماز  پڑھتے رہے اور اب جو مکہ والے گھر کی طرف نماز پڑھنا شروع کیا۔ تو اُس وقت یہود مدینہ نے فریب سے آکر محمد صاحب سے کہا کہ اگر تم بیت المقدس کو اپنا قبلہ مانتے رہتے تو ہم ضرور جانتے کہ تم نبی ہو۔ مگر اب معلوم کہ تم نہیں ہو۔ تو اس پر یہ آیت نازل ہوئے۔ کہ یہودی پہچانتے ہیں یہ بات جیسے پہچانتے ہیں اپنے بیٹوں کو اور ایک فرقہ اُن میں چھپاتے  ہیں حق کو جان کر۔  پھر  تو نہ ہے شک لانے والوں سے۔

پس یہاں سے ظاہر  ہے کہ حق  چھپانے کا الزام  یہودیوں مدینہ  کے کسی  ایک فرقہ باشندہ مدینہ کو  دیا گیا ہے نہ کہ کل یہود سکنہ مدینہ کو اور حق کو چھپانے سے یہ مطلب  ہے کہ وہ محمد صاحب کو جان بوجھ کر نبی  نہیں مانتے۔ اور ایسی دلیل محمد صاحب  کے نبی نہ ہونے کی بیان کرتے جیسا کہ شان  نزول میں ہے۔ ’’ کہ اگر تم بیت المقدس کو اپنا قبلہ مانتے رہتے تو ہم ضرور جانتے کہ تم نبی ہو مگر اب معلوم ہو اکہ تم نبی نہیں ہو‘‘۔ کہ جس سے خدُا  کو بھی محمد صاحب کے  شک میں پڑ جانے کا اندیشہ گذرا اور اُس کے شک کو رفع کرنے کے لئے کہنا  پڑا۔ کہ اے محمد ﷺ حق وہ ہے جو تیرا رب کہے ( نہ کہ وہ یہود مدینہ  کہتے ہیں)  پھر تو نہ شک  لانے والوں  سے‘‘ پس محمد صاحب  کو اپنی باتوں سے اُن کے نبی ہونے کی بابت شک میں ڈال  دینا ہی حق کا پوشیدہ کرنا تھا۔ نہ یہ کہ وہ کتاب  سماوی میں سے کوئی لفظ  کم و بیش کر کے تحریف کر ڈالتے تھے۔ لہذا طاہر ہے کہ قرآن  میں کتب سماوی کی تحریف کا دعویٰ نہیں ہے۔ 

۸بقر۱۹ رکوع ۱۶۰۔

 إِنَّ الَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَا أَنزَلْنَا مِنَ الْبَيِّنَاتِ وَالْهُدَىٰ مِن بَعْدِ مَا بَيَّنَّاهُ لِلنَّاسِ فِي الْكِتَابِ  أُولَٰئِكَ يَلْعَنُهُمُ اللَّهُ وَيَلْعَنُهُمُ اللَّاعِنُونَ۔

ترجمہ۔  بے شک جو لوگ ان کھلی کھلی باتوں اور ہدایت کو جسے ہم نے نازل کر دیا ہے اس کے بعد بھی چھپاتے ہیں کہ ہم نے ان کو لوگوں کے لیے کتاب میں بیان کر دیا یہی لوگ ہیں کہ ان پر الله لعنت کرتا ہے اور لعنت کرنے والے لعنت کرتے ہیں۔

اس آیت کے شان نزول کی بابت ابن اسحاق کی روایت سے سیرت ھشامی میں یوں لکھا ہے۔

کتما نھم ما فی التوراۃ  من الحق سال معازبن  جبل  خرنبی سلمہ وسعد ابن معاز اخرنبی عبدا لا مثل و خارجۃ بن زید بفز امن احبار  یھود عن بعض  مافی التورئۃ فکتموہ ایاھم ابوا ان یخبروھم  عنہ فانزلﷲ عزوجل  ان الزین یکتمون ما انزلنا من البینا والھدیٰ لایة۔

ترجمہ۔ توریت کا حق چھپانا۔ معاز ابن جبل۔ اور سعد ابن معاز۔ اور خاجہ ابن زید۔ نے بعض یہودی عالموں سے توریت کی کسی بات کا استفسار کیا لیکن یہود  اُس کو اُن سے چھپا  گئے  اور بتلانے سے انکار کیا۔ پس اﷲ تعالیٰ نے یہ آیت نازل کی۔ بالتحقیق جو لوگ چھپاتے اُن صاف باتوں اور ہدایتوں کو۔ الخ امام فخر الدین رازی تفسیر کبیر میں لکھتے ہیں۔

قال ابن عباس ان جماعتہ من الا نصار سلوا انفراً من الیھود عمافی التوراة من صفتۃ  صلی ﷲ علیہ وسلم ومن الاحکام فلتموا فنزلت الایتہ۔

ترجمہ۔ ابن عباس نے روایت کی ہے کہ ایک گروہ نے انصاریوں میں سے پوچھا ایک یہودی سے کیا ہے توریت میں نشانی محمد  ﷺ کی اور بعضے  احکام بھی پوچھے۔  پھر اُنہوں نے چھپایا تب  وتری یہ آیت۔

پس ظاہر ہے کہ چھپانے کے الزام میں یہ ہر گز داخل  نہیں کہ یہودیوں سکنہ مدینہ نے اپنی کتاب میں کچھ کم و بیش کر کے اُسے تحریف  کر ڈالا تھا۔ البتہ محمد ی جو کچھ اپنے چند حزیفوں  سکنہ مدینہ سے کچھ دریافت  کرتے تھے۔ اور وہ ان کے منشا کے بموجب  نہ بیان کرتے۔ یا کسی جہالت کے سوال کا جواب نہ دیتے  تو یہ اُس کو چھپانا قرار دیکر محمد صاحب تک خبر پہنچاتے (خواہ بسبب خوشاہ  اِصحابونکا بیان غلط ہی کیوں نہ ہو)[1]

۹۔ بقر ۲۱ رکوع ۱۷۵۔

  إِنَّ الَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَا أَنزَلَ اللَّهُ مِنَ الْكِتَابِ وَيَشْتَرُونَ بِهِ ثَمَنًا قَلِيلًا  أُولَٰئِكَ مَا يَأْكُلُونَ فِي بُطُونِهِمْ إِلَّا النَّارَ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ اللَّهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ

ترجمہ۔ بے شک جو لوگ الله کی نازل کی ہوئی کتاب کو چھپاتے اور اس کے بدلے میں تھوڑا سا مول لیتے ہیں یہ لوگ اپنے پیٹوں میں نہیں کھاتے مگر آگ اور الله ان سے قیامت کے دن کلام نہیں کرے گا اور نہ انہیں پاک کرے گا اور ان کے لیے دردناک عذاب ہے۔

(اور ایسا ہی الزام سورہ عمران ۱۹۔ رکوع  ۱۸۸۔ آیت میں بھی یہود مدینہ  کو دیا گیا ہے۔ 

امام فخر الدین رازی تفسیر کبیر میں لکھتے ہیں۔

اعلم ان وله تعالیٰ انالزین یکتمون مسائیل  المسئلته الا ولیٰ قال ابن عباس نزلت الایته فی روساء  الیھود کعب ابن الاشرف۔ وکعب ابن الاشد ومالک بن الا صیف ۔ وحی ابن اخطب ۔ وابی یاسرابن اخطب ۔ کانوا یا خزون من اتباعھم  الھدایا فلما  بعُث  محمد ﷺ خافوا انقطاع  تلک المنافع فکتموا امر محمد ﷺ وامر شرایعه فنزلت  ھزہ الایته المسئله الثانیته اختلفوفی انھم ای شی کانوا  یکتمو فقیل  کانوا یکتمون صفة  محمدﷺ  وایته  البشارۃ به وھو قول ابن عباس و قتادہ والسدی  ولاصمہ وابی مسلمہ وقال الحسن  کتموا احکام وھو لقوله  تعالی ان کثیرا من الاحبار والرھبان لیا کلون اموال الناس بالبا طل و یصدون عن سبیل ﷲ۔

ترجمہ۔  جاننا چاہئے کہ اﷲ تعالیٰ کے اس قول میں کہ جو لوگ چھپاتے ہیں کئی ایک  مسئلے ہیں۔ اوؔل یہ کہ عبدؔاﷲ ابنؔعباس نے روایت  کی کہ یہ آیت روساء یہود کے حق میں اوتری ہے اور وہ یہ لوگ تھے۔ (۱) کعب بیٹا اشرف کا۔ اور (۲)کعب بیٹا اشد کا۔ اور (۳)مالک بیٹا صیف  کا۔ اور (۴)  حی بیٹا  اخطب کا۔  اور (۵) ابی یاسر بیٹا  اخطب کا۔ یہ لوگ لیتے تھے اپنے تابعداروں سے نزریں ۔ پس جب محمد  ﷺ  نبی بنے ہوئے تو وہ لوگ ڈرے  کہ یہ فائدے جاتے رہیں گے اس لئے چھپایا محمدﷺ کی بشارتوں کو اور آں حضرت کی شریعت کے نشانوں کو پس  اوتری یہ آیت۔ دوسرؔا مسئلہ  یہ ہے کہ عالموں نے اختلاف  کیا اس باب میں کہ وہ  کیا چیز چھپاتے تھے۔ بعض نے کہا کہ وہ چھپاتے تھے تعریف محمد ﷺ کی اور آں حضرت کی نشانی اور آں حضرت کی بشارت۔ اور یہ قول ابن عباس کا ہے۔ اور قتادہؔ اور سدیؔ اور اممؔ اور ابی مسلم اور حسنؔ کا یہ قول ہے کہ وہ احکام  کو چھپاتے تھے جیسے کہ اﷲ تعالیٰ نے فرمایا ہے ’’کہ بہت عالم اور درویش اہل کتاب کے کھاتے ہیں مال لوگوں کا ناحق اور روکتےہیں اﷲ کی راہ سے‘‘

امام فخر الدین صاحب رازی کے بیان سے طاہر ہے کہ محمد صاحب  کے وقت  یہودیوں  کے یہ پانچ رئیس یعنے (۱) کعب بن افرف (۲) کعب بن اشد۔ (۳) مالک بن صیف۔ (۴) حی ابن اخطب۔ (۵) وابی یاسر بن اخطب  مدینہ میں رہتے تھے یا چند راحب بھی تھے جوآج کل  کے قاضی ملانوں و پیروں کی مانند لوگوں سے نزرانے لے کر اُنکے روبرو احکام  کچھ بیان کرتے اور حق پرپر وپ ڈالتے تھے کہ جس سے لوگوں کی تلفی  ہوتی تھی۔ اور یہ حق کا پوشیدہ کرنا تھا اس لئے محمد  صاحب نے آّیت  اوتار کر یہ  سنُایا کہ جو لوگ ایسا کرتے ہین وہ سزا پاویں گے۔ لہذا اس سے یہ ہر گز  ثابت نہیں ہو سکتا کہ محمد  صاحب نے تحریف کتب سماوی کا دعویٰ کیا ہے۔ کیونکہ ایسے ناممکن  امر کا  دعویٰ تو بعید از عقل ہے۔ جیساکہ۔

امام فخر الدین  صاحب رازی  تفسیر کبیر میں لکھتے ہیں۔ 

اختلفوا فی یٔفیة الکتما فا لمر وی عن ابن عباس انھم  کانوا یحرفون  ظاھر التوراة  والا نجیل وعند المتکلمین  ھزا  ممتنع لانھملکانا کتابین بلغانی الشھرة والتوا ترالی حیث یتعز  ر زلک  فیھا بل کانوا یکتمون التاویل لانه قد کان فیھم  من یعرف  الایات الدالة علی  نبوۃ  محمدﷺ  فکا نوایز کرون لھاتا ویلات  باطلة  ویصرفونھا عن محاملھا الصحیحة  الدالة  علی نبوة محمدﷺ  فھل اھوالمراد عن الکتمان فیضیر یعنے ان الزین یکتمون معانی  ما انزل اﷲ من الکتاب۔

ترجمہ۔ علما میں اختلاف ہے طریقہ چھپانے میں یعنے کس طر ح  چھپاتے  تھے عبداﷲ ابن عباس کا قول  یوں نقل کیا ہے۔ کہ وہ اہل  کتاب بدل دیتے تھے عبارت توریت  اور انجیل کی۔ مگر متکلمین کے نزدیک یہ بات یعنے توریت اور انجیل میں عبارتوں کا بدل  دینا متنع ہے کہ کیونکہ وہ دونوں کتابیں نہایت  مشہور ہو گئی ہین اور تو اتر کو پہنچ گئی ہیں یہاں تک کہ ان کی عبارتوں کا بدلنا متعذر ہو گیا ہے بلکہ وہ لوگ ( یعنے وہ پانچ  رئیس  مدینہ  یا بعض درویش)  چھپاتے  تھے تاویلات کو کیونکہ اُن میں تھے جو جانتے تھے اُن آیتوں کو جو دلالت  کرتی ہیں نبوت محمدﷺ  کرتے تھے اُن کی غلط دلیلیں  اور پھیرتے تھے اُن کو صحیح مطلبوں سے جو دلالت  کرتے تھے اوپر نبوت محمد ﷺ کے۔  پس یہ مراد ہے چھپانے کی ۔  اب اس آیت کے یہ معنے ہوئے۔ کہ جو لوگ چھپاتے ہیں معافی یا مطلب اُس چیز کے جو اوتار اﷲ نے کتاب سے۔

پس اظہر من الشمس ہے کہ ابن عباس کی روایت کے بموجب  یہ آیت قرآنی روساء یہود سکنہ مدینہ کے پانچ اشخاص  مزکورہ  صدر کے حق میں  ہے اور ابن عباس کے نزدیک چھپانے  سے یہ مراد ہے کہ وہ یہود مدینہ توریت کی عبارت  کو بدل دیتے تھے۔ مگر یہ ان کا وہم بعید از عقل ہے۔ اور بموجب روایت  (۱) قتادہ و (۲) سدی و (۳)  اھم  و ( ۴)ابی مسلم  و (۵)حسن کے وہ یہود مدینہ توریت کے احکام کو چھپاتے تھے جیسا کہ آیت قرآنی سے بھی ظاہر ہے۔  کہ وہ تھوڑے نذرانہ کی خاطر آجکل کے قاضی و ملانوں کی طرح لوگون کو کچھ کا کچھ بتاتے تھے نہ کہ کتاب سماوی کی عبارتوں کو بدل ڈالتے تھے۔ کیونکہ کتاب اﷲ کی عبارتوں کا بدلنا تو ناممکن تھا جیسا کہ امام فخر الدین صاحب رازی کے پیش کردہ اقوال سے ظاہر ہے۔ ’’ مگر متکلمین کے نزدیک یہ بات یعنے توریت اور انجیل میں عبارتوں  کا بدل  دینا  ممتنع ہے کیونکہ وہ دونوں کتابیں نہایت مشہور ہو گئی ہیں اور تواتر کو پہنچ گئی ہیں یہاں تک کہ اُن کی عبارت کا بدلنا متعذر ہو گیا ہے‘‘ ( کیونکہ پہلی صدی  سے سن ۳۱۳ ء تک زیل کے ممالک میں کتب سماوی مشتہر ہو کر کلیسائیں قایم ہو چکی تھیں۔

۱۔ ملک فلسطین یا کنعان میں۔ یروشلم۔ لدُہ۔ سارون۔ یافہؔ قیصریہ و ہیبرون میں۔ 

۲۔ملک فونیکی میں صور و دفلمائے میں۔

۳۔ ملک کللیہ میں۔

۴۔ ملک کپرس میں۔

۵۔ ملک آسیہ کوچک  میں۔ پسدیہ۔ تماونیہ۔ انطاقیہ۔ اکونیم۔ دوبے۔لسترا۔ گلاتیہ۔ افسس۔ پرگمس ۔ سمرنا۔ تھوا تیرا۔ ساروس۔ فلادلفیہ۔ ترداس ۔ لاؤدوقیہ۔ فروگیہ۔ قلوس ۔ پنتس۔کپہ دوکیہ۔ دبتونیہ۔ مین۔

۶۔ ملک مقدونیہ میں۔ فلپی۔ تسلونیقیہ۔ بریہ میں

۷۔ ملک آرام میں۔ اتالیہ و دمشق میں۔

۸۔ ملک یونان میں۔ قرنت واتھینی میں۔

۹۔ کریت میں۔ 

۱۰۔ الراقیم میں۔

۱۱۔ روم میں۔

۱۲۔ بابل میں۔

۱۳۔ پارتھا میں۔ میدیا۔ ایلان، مسوپوتامیہ۔  مصر۔ لبیہ۔ قریتی و عرب میں۔ 

۱۴۔ ملک کوش یعنےحبش میں۔

۱۵۔ ملک اسفانیہ میں۔

۱۶۔ انگلینڈ۔ فارس۔ اٹلی ۔ چینی تاتار۔ ہندوستان میں۔

پس جبکہ تواریخ سے ثابت ہے پہلے صدی سے چوتھی صدی  کے اخیر تک محمد سے دو برس پیشتر بہت ملکوں  میں کلیسائیں قایم ہو چکی تھیں جو مختلف زبانیں بولنے والے  تھے اور آپس میں دین و ایمان کے لئے  غیرت مند ہو کر بڑے بڑے مباحثے کرتے  اور پاک کلام کو پڑھتے پھیلاتے اور نقل کرتے اور ترجمے کیا کرتے تھے تو پھر کیونکر ممکن تھا کہ یہ پانچ رئیس یہودیوں کے جو صرف مدینہ میںرہتے تھے تمام ممالک کی کتب سماوی میں تحریف کر دیتے یا کرا دیتے۔ کوئی ہو شمند یہ ہرگز نہیں مان سکتا۔

اورپھر آیت قرآنی  کا یہ بیان۔ ’’کہ تھوڑے نفع پر لیتے ہیں مول تھوڑا۔‘‘ یہ الزام  بھی تمام  اہل کتاب پروارو نہیں ہو سکتا۔ دیکھو سورہ عمران ۲۰ رکوع ۱۹۹۔ آیت۔

پس یہود کے پانچ رئیسوں مذکورہ و بعض درویشوں کو چھپانے احکام و ناروانفع حاصل کرنے کا الزام دینے سے محمد صاحب  تمام جہان کی مشتہرہ کتب سماوی کی تحریف  کے دعوے  کے مدعی ہر گز قرار نہین دئے جا سکتے ۔ کیونکہ ایسے ناممکن امر کا دعویٰ کرنا محض حماقت ہے۔ اور روساء یہود مدینہ کی دست قدرت سے بالکل باہر تھا۔

۱۰۔ آل عمرآن ۷ رکوع ۷۰۔

  يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَلْبِسُونَ الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ۔

ترجمہ۔ اے اہلِ کتاب! سچ میں جھوٹ کیوں ملاتے ہو اور سچی بات کو چھپاتے ہو حالانکہ تم جانتے ہو۔

امام فخر الدین صاحب رازی تفسیر کبیر میں لکھتے ہیں۔

اماقوله و تکتموں الحق فالمرادان الایات الموجوبة فی التوراة الدالة نبوۃ  محمدﷺ کان الاستدلال بھا مفتقرا الی التفکر  و التامل  وا لقوم  کانوا یجتھدون فی اخفاء تلک الا لفاظ  التی بمجھوعھا یتمہ ھزا الاستدلال مثل ما ان اھل البدعته فی زماننا  یسعون فی ان لایصل  الی عوام ھم دلائیلالمحقیقیں۔

ترجمہ۔ یہ جو اﷲ تعالیٰ نے فرمایا کہ چھپاتے ہو سچ کو ۔ اس سے یہ مراد ہے کہ توریت  میں آیتیں موجود ہیں جو محمدﷺ کی نبوت پر دلالت کرتی ہیں۔ اُن آیتوں سے استدلال کرنے میں غور اور فکر درکار ہے۔ اور وہ لوگ اُن الفاظ کے چھپانے  میں جب کے مجموعے سے یہ دلیل پوری ہوتی ہے کوشش کرتے تھے۔ جیسے ہمارے زمانہ میں بدعتی اس میں کوشش کرتے ہین کہ محققین کی دلیلیں عوام تک نہ پہنچیں۔ 

پھر تفسیر کبیر میں بھی لکھا ہے۔ 

اعلم ان الساعی فی الاخفاءلاسبیل له فی زلک الا من احد الو جھین اما بالقاء الشبھة التی تدل علی لباطل  ادبا خفاء الدلیل الزی یدل علی الحق  فقوله  لم تلبسوا الحق بالباطل  اشارة الی للمقام الاول و قوله  تکتمو الحق اشارة الی المقام الثانی امالبس الحق بالباطل  فانه یحتمل  ھنا وجوھا احدھا  تحریف التوراة فیخلطون المنزل بالمحرف  عن الحسن ابن زید وثانیھا انھم کانوا یشوا ضعوں علیٰ اطھازالاسلام فی اول النھارثم الرجوع عنھا اخر النھار تتکیکا للناس عب ابن عباس و قتازہ و چالثھا ان یکون فی التوراة ما یدل علیٰ نبوة ﷺ من البشارة والنعت والصفته ویکون فی التوراة الیضامایوھم خلاف زلک فیکون  کالمحکم وا لمتشابه فیلبسون علیٰ الضعفاء احدلامرین بالا خر کمایفعله کثیر من المشتبھة  وھزا قول القاضی واجھا انھم کانو ایقولوزان محمدﷺ معترف  بان موسیٰ لا یسنخ و کل زلک القاء الشبھات۔

ترجمہ۔ جو شخص حق بات چھپانےمیں سعی کرتا ہے۔ اُس کو اس بات میں دو رستوں کے سوا کوئی راستہ نہیں ہے۔ یا توشبہ ڈالے  جو ناحق  پر راہ بتاوے۔ یا سچا رستہ بتانےوالی دلیل کو چھپاوے۔ پس اﷲ تعالیٰ کایہ قول کہ ’’کیوں ملاتے ہو صحیح میں غلط ‘‘ اشارہ ہے پہلی بات کی طرف ۔ اور یہ قول اﷲ تعالیٰ کا‘‘  اور چھپاتے ہو سچی بات کو ‘‘ اشارہ ہے دوسری بات کی طرف۔ مگر  صحیح میں غلط ملانا اُس کی کئی صورتیں ہیں۔ اوؔل تحریف توریت کی کہ ملاویں کلام آلہی کو کلام محرفّ سے۔ یہ روایت حسن اوابن زید  کی ہے۔  (واضح رہے کہ امام فخر الدین نے جابجا بیان کیا ہے کہ ایسی تحریف توریت میں نہیں ہو سکتی تھی چنانچہ اُن کے اقوال کچھ تو مزکور ہو چکے ہیں اور باقی ہم آگے چل کر لکھیں گے لہذا یہ رائے حسن و ابن زید کی درست نہیں) دومؔ وہ لوگ( یعنے چند اشخاص یہود مدینہ میں سے) صبح کو اپنا مسلمان ہونا طاہر کرتے تھے اور شام  کو پھر جاتے تھے لوگوں کو شک میں ڈالنے کے لئے ۔  اور یہ روایت ابنؔعباس اور قتادہ کی ہے۔ سوم ؔ یہ کہ توریت میں وہ آیتیں بھی ہین جو دلالت  کرتی ہیں اوپر نبوت محمدﷺ کے بطور پیشینگوئی  کے اورحضرت کی نشانیوں پر اور تعریف  بتانے  پر۔ اور توریت میں ایسی بھی آیتیں ہیں جن سے اُن کے برخلاف شبہ پیدا ہوتا ہے تو ان آیتوں کی مثال محکم اور متشابہ کی ہوئی۔ پھر وہ لوگ (یعنے یہود مدینہ) ان دونوں باتوں کو ملا کر لوگوں پر شبہ ڈال دیتے تھے۔  جیسے کہ اکثر شبہ ڈالنے والے ایسا کرتے ہیں۔ اور یہ قول قاضی  کا ہے۔ چہاؔرم یہ کہ وہ لوگ کہتے تھے کہ محمدﷺ  اقرار کرتے ہیں کہ موسیٰ برحق ہیں۔ پھر توریت دلالت کرتی ہے اس بات پر کہ شریعت  موسیٰ کی منسوخ نہین ہونے کی اور یہ سب باتیں شبہ ڈالنے کی ہیں۔

اور عبدالقادر صاحب دوسرے فائدہ میں یوں لکھتے ہیں۔ توریت کے بعضے  حکم تو موقوف  ہی کر ڈالتے تھے غرض کیواسطے اور بعض آیتوں کے معنے  پھیر ڈالتے تھے اور بعضے  چیز چھپا رکھتے تھے ہر کسی کو خبر نہ کرتے تھے جیسے بیان پیغمبر  آخر الزمان کا ۔

پس ظاہر ہے کہ غلط  ملانے سے یہ مراد ہے کہ اہل کتاب سکنہ مدینہ سے غالباً یہودیوں کے وہ پانچ رئیس کہ جن کا  بیان بموجب  روایت ابن عباس کے اوپر  کیا گیا ہے کہ جو اپنے نزرانہ کی کمی کے اندیشہ سےمحمد صاحب کے دشمن بتائے گئے ہیں لوگوں کو شبھات میں مبتلا کرتے تھے۔ یا جیسا کہ سوریؔ اس آیت متنازعہ کی نیچے کی آیت کے شان نزول میں لکھتے  ہیں کہ ’’بار ہ یہودیوں نے اتفاق کر لیا تھا کہ صبح کو وہ اپنا محمدی ہونا  ظاہر کرتے تھے اور شام کو لوگوں میں شک ڈالنے کے لئے  محمد صاحبسے برگشتہ ہو جاتے تھے۔ اور کہتے تھے  کہ ہم نے  اپنی کتاب میں گور کی اور ہم نے علما سے بہت مباحثہ کیا نشانی  تمہارے نبی موعود کی نہ پائی۔ الخ‘‘ الغرض کہ وہ محمد صاحب کے دعویٰ کے برعکس ایسی آیات بھی توریت سے پیش کیا  کرتےہوں گے کہ جن سے محمد صاحب کے نبی ہونے کے دعویٰ کی تصدیق کے بجائے اُسکے دعویٰ کے باطل ہونیکا شبہ پڑجاتا تھا جیسا کہ قاضیؔ  کے قول سے اوپر ظاہر ہو چکا ہے۔ اور حق کا چھپانا  بھی امام فخر الدین کے نزدیک ایسا تھا کہ جیسا اس زمانہ کے بدعتی قرآن  کے مسایل  کے باب میں کرتے ہیں تاکہ محققین کے دلائیل عوام تک نہ پہنچیں۔  لہذا آیت قرآنی کا یہ مطلب ہر گز نہیںہے کہ وہ چند اشخاض یہود مدینہ کتب مقدسہ کو گھٹاتے یا بڑھاتے تھے بلکہ یہ ہے کہ وہ محمدصاحب کے دعویٰ نبوت کو باطل کرنے کے لئے آیات  کتب مقدّسہ  کے ایسےمعنے بیان کرتے اور سندمیں ایسی دیگر آیات کو پیش کر کے آیات متنازعہ کا اُن سے مقابلہ کرتے ( جیسے کہ علما آج کل بھی کیا کرتے ہیں) کہ جن سےمحمد صاحب کے حق میں کوئی پیشین گوئی تو ثابت  نہیں ہوتی بلکہ شبہ باطل  ہونے کا پڑجاتا تھا۔ اس لئے محمد صاحب اُن کو صحیح میں غلط ملانے اور ھق کوچھپانے کا الزام مقصد کے بر نہ آنے کے سبب  لگاتے تھے۔  سو یہ الزام بھی اپنے چند حریفوں سکنہ مدینہ کو نہ کہ تمام جہان کےاہل کتاب کو لگاتے تھے۔  لہذا چابت ہے کہ کتب سماوی مشتہر جہان کی تحریف  جو ایک ناممکن امر تھا اُس کو دعویٰ قرآن  میں نہیں ہے ۔

۱۱۔ عمران ۸۔ رکوع ۷۷۔

  وَإِنَّ مِنْهُمْ لَفَرِيقًا يَلْوُونَ أَلْسِنَتَهُم بِالْكِتَابِ لِتَحْسَبُوهُ مِنَ الْكِتَابِ وَمَا هُوَ مِنَ الْكِتَابِ وَيَقُولُونَ هُوَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَمَا هُوَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَيَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَهُمْ يَعْلَمُونَ۔

ترجمہ۔ اوربے شک ان میں سے ایک جماعت ہے کہ کتاب کو زبان مروڑ کر پڑھتے ہیں تاکہ تم یہ خیال کرو کہ وہ کتاب میں سے ہے حالانکہ وہ کتاب میں سے نہیں ہے اوروہ کہتے ہیں کہ الله کے ہاں سے ہے حالانکہ وہ الله کے ہاں سے نہیں ہے اور الله پر جان بوجھ کر جھوٹ بولتے ہیں۔

امامٖ فخر الدین صاحب رازی تفسیر کبیر میں یوں لکھتےہیں۔

کیف یمکن ادخال التحریف فی التوراة مع شھرته العظیمة بین الناس و الجواب  لعلھ صدر ھزا العمل  من نفرقلیل یجور علیھم  التوا ھو علی التحریف ثم انھم عرضوازاک المحرف علی البعض العوام و علی ھزا التقد یریکون ھزا لتحریف  ممکنا ولا سوب عندی فی تفسیر الایته وجه اخرو ھوان الایات الدالته علی نبوة صلیﷲ علیہ وسلم کایحتاج فیھا الی تدفین النظرو تامل القلب والقوم کانوا یور دون علیھا الاسولتہ المشوشته والا عتراضات المظلمةفکانت تصیر تلک الدلایل مشتبھات علی السامعین والیھود کانوا یقولون مرادﷲ تعالی من ھز الایته ماَزکرناہ لامازکرتم فکان ھزہ ھو المراد بالحتریف وبلی الاسنته وھزامثل ان المحقق فی زماننا ادا استدل بایته  من کتابﷲ فالمبطل یورد علیه  الاسولة والشبھات ویقول لیس مراد ﷲ مازکرت فکزلک فی ھزا الصورة وﷲ

اعلم  بمرادہ۔

ترجمہ۔ کیونکہ ممکن ہے داخل کرناتحریف  کا توریت میں باوجود اُس کی نہایت شہرت کے لوگوں میں؟ جواب شاید یہ کام تھوڑے سے آدمیوں نے کہ جن کا تحریف پر اکھٹا ہو جانا ممکن ہو کیا ہو۔  تو اس صورت میں ایسی تحریف ہونی ممکن ہے۔ مگر میرے نزدیک  اس آیت کی بہتر تفسیر یہ ہے کہ جو آیتیں توریت کی نبوت محمدﷺ پر دلالت  کرتی ہیں اُن میں غور و فکر کی احتیاج تھی۔ اور وہ لوگ اُس پر سوالات  مشوش اور بیجا اعتراضات  کرتے تھے۔  پھر وہ دلیلیں سنُنے والوں پر مشتبہہو جاتی  تھیں اور یہودی  کہتے تھے کہ ان آیتوں سے اﷲ تعالیٰ کی مراد وہ ہے جو ہم کہتے ہیں۔ نہ وہ جو تم کہتے ہو۔ پس یہی مرادہے تحریف سے۔ اور زبان بدلنے یا پھیرنے سے اُس کی ایسی مثال ہے۔ جیسے کہ ہمارے زمانہ مین جب کوئی محقق کسی اُمت کلام ا ﷲ سے استدلال کرتا ہے۔تو گمراہ لوگ اُس پر سوالات اور شبھات کرتے ہیں۔ اورکہتےکہ اﷲ کی مراد یہ نہیں ہے جو تم کہتے ہو۔ اسی طرح پر اس تحریف کی صورت ہے۔

امام فکر الدین صاحب رازی تفسیر کبیرمیں یہ بھی تحریر فرماتے ہیں۔

قوله ویلون السنتھم  معناہ یعمدون  الیٰ اللفظ فیحر فونھا فی حرکات الاعراب تحریفا یتغیربه المعنی۔ 

ترجمہ۔اﷲ تعالیٰ نےجو یہ فرمایا’’کہ کتاب پڑہنے میں زبان مروڑ کر پڑہتے ہیں‘‘ اس کے یہ معنے ہیںکہ وہ لوگ (یعنے یہود مدینہ) خراب کرتے ہیں لفظ کو اور بدل دیتے ہیں ( پڑھنےمیں) اُس کے اعراب  کو کہ اس تبدیل سے اُس لفظ کے معنے بگڑ جاتے ہیں۔

تفسیر حسینی میں یوں لکھا ہے۔

وَاِنّ منھم لفریقاً۔ دیددستیکہ از جہودان ہر آئینہ گروہےہستند چون۔ کعبؔ وا بویاؔ سروحیؔ کہ ازرو ئے ناراستی۔ یلون السنتھم۔ پریچا تدزبان ہائے خودرا۔ باللتب۔ بخواندن کتابی کہ نوشتہ و بربافتہ احبار ایشانست وآن مضتریات بلغت عبری مے خوانندلتحسبوة تاشماپندارید کہ آنچہ ایشان میخوانند۔ من الکتب۔ از توریت است۔ وماھو من الکتب۔ وحالتکہ نیست ازتوریت۔ و بقولون۔ ومیگویند ھومن عند ﷲ۔آنمحرف و مفتری از نزو خدا ست۔ وماھو منعندﷲ۔ ونیست آن از نزدخداے۔ ویقولون علی ﷲالکزف۔ ومیگویند بر خدائے دروغ جہ غیر سُخن اومیدانند۔ وھم یعلمون۔ و ایشان میدانند کہ دروغ میگویند۔ یہاں سے آشکارا ہے کہ اس آیت قرآنیمیں بھی کتب سماوی کے تحریف ہو جانے کا دعویٰ نہین ہے بلکہ امام فخر الدین صاحب رازی کے قول سے ثابت ہے۔ کہ تحریف ہوجانا کتب سماوی کا جو جہان میں مشتہر ہو چکی تھیں بالکل غیرممکن تھا۔ اور جو الزام یہان پر زبان مروڑ کرپڑہنے میں اعراب کو تبدیل کر کے پرہنے کا دیا گیا ۔ وہبھی بموجب تفسیر حسینی کے صرف اُنہیں پانچ رئیسوں یہود سکنہ مدینہ میںسے تین اشخاص یعنے کعبؔ وابویاؔ سروؔحی کو کہ جن کا بیان پہلے ہو چکا ہے دیا گیا ہے نہ کہ تمام قوم یہود کو۔ اور تفسیر حسینی سے یہ بھی ظاہر ہے کہ یہ تینوں اشخاص کچھ زبان عبرانی میں اپنے یاروں سے لکھوا کر لاتے تھے اور محمد صاحب و اُن کے پیرؤن کو دھوکا دینے کے لئے اُسے اُن کے روبرو زبان مروڑ کر پڑہتے اور کہتے تھے کہ یہ توریت سے ہے۔ حالانکہ وہ توریت سے نہ ہوتا تھا۔ الغرض کہ وہ توریت کو تو زبان مروڑ کر یا پڑہنےمیں الفاظ توریت کے اعراب تبدیل کر کے نہین پڑہتے تھے۔ بلکہ سرف اپنے یاروں ہی کی نوشت کو زبان مروڑ کر پڑہتے تھے۔ لہذا اُن تین شخصوں سکنہ مدینہ کے ایسا کرنے سے توریت کے تحریف الفاظ یا تحریف اعراب کا دعویٰ تصور نہیں کیا جا سکتاپس اظہر من الشمش ہو کہ کتب سماوی مشتہر جہان کی تحریف کا دعویٰ قرآن میں نہیں ہے۔

۱۲۔ نساء۔ ۷ رکوع ۴۴۔ 

مِّنَ الَّذِينَ هَادُوا يُحَرِّفُونَ الْكَلِمَ عَن مَّوَاضِعِهِ وَيَقُولُونَ سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَاسْمَعْ غَيْرَ مُسْمَعٍ وَرَاعِنَا لَيًّا بِأَلْسِنَتِهِمْ وَطَعْنًا فِي الدِّينِ  وَلَوْ أَنَّهُمْ قَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا وَاسْمَعْ وَانظُرْنَا لَكَانَ خَيْرًا لَّهُمْ وَأَقْوَمَ وَلَٰكِن لَّعَنَهُمُ اللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُونَ إِلَّا قَلِيلًا۔

ترجمہ۔ یہودیوں میں بعض ایسے ہیں جو الفاظ کو ان کے محل سے پھیر دیتے ہیں او ر کہتے ہیں ہم نے سنا اور نہ مانا او رکہتے ہیں کہ سن نہ سنایا جائے تو اور کہتے ہیں راعِنا اپنی زبان کو مروڑ کر اور دین میں طعن کرنے کے خیال سےاور اگر وہ کہتے ہیں کہ ہم نے سنا اور ہمنے مانا اور سن تو اور ہم پر نظر کو تو ان کے حق میں بہتر اور درست ہوتا لیکن ان کے کفر کے سبب سے الله نے ا ن پر لعنت کی سو ان میں سے بہت کم لوگ ایمان لائیں گے۔

تفسیر درِمنشور ابن ابیؔ حاتم نے ابن زید دے یوں روایت کی ہے۔

واخبح ابن ابی حاتم عن ابن زید فی  قواہ یحرفوا لکلم عن مراعظه قال لا یضعونه علیٰ ما انزلﷲ۔

ترجمہ۔ یہ جو فرمایا اﷲ تعالیٰ نے ۔ ’’کہ تحریف کرتے ہیں کلموں کو اُن کی جگہ سے۔ ‘‘ اس کے یہ معنی ہیں کہجس طرح پر اﷲ نے ان کو اوتار ا ہے اُس طرح پر اُن کو نہیں رکھتے۔

امام فخر الدین صاحب رازی تفسیر کبیر میں لکھتے ہیں۔

فان قیل کیف یمکن  ھزا فی لکتب  الزی بلغت احاد حروفه و کلماته  مبلغ التوانزا المشہور فی الشرق والغرب  قلنا لعله یقال القوم کانوا قلیلین والعلماء  بالکتاب  کانوا فی غایته  القله فقد رواعلیٰ ھزا التجریف  الثانی ان المراد بالتحریف القاء  الشبھته  الباطلته والتاویلاالفاسدة و حبراللفظ من معناہ الحق الیٰ الباطل بوجوہ الحیلالافظیة کما یفعله اھل البدعته فی زماننا ھزا بالایات المخالفته لمزھبہم ھزا وھو الاصح۔

ترجمہ۔ پس کس طرح ممکن ہے تحریف ایسی کتاب میں جس کے ہر حرف اور کلمے تواتر کو پہنچ گئے ہین اور مشرق سے غرب تک مشہور ہو گئے ہیں۔ ( پہلا جواب) شاید یوں کہا جا سکے کہ وہ لوگ تھوڑے تھے۔ اور عالم کتاب آلہی کے بہت کم تھے۔  پس ایسی تحریف  کر سکے۔ ( دوسرا جواب)  تحریف سے مراد ہے جھوٹے شبہوں کا دالنا  اور غلط  تاویلوں کا کرنا۔ اور لفظ کو صحیح معنوں سے جھوٹے  معنوں کیطرف کھینچنا  لقطی حیلوں سے۔ جیسے کہ اس زمانہ کے بدعتی اپنے مذہب  کی مخالف  آیتوں کے ساتھ کرتے ہیں۔ اسکو سمجھو اور یہی مراد تحریف کی بہت صحیح ہے۔

تفسیر حسینی میں یوں لکھا ہے۔

من الزین ھادو۔ بعضے ازاں کسانیکہ بدین یہودیہ  لتدین  شدہ اند۔ یحرفون الکم۔ میگردانند کلمہاو تغیر میدہند۔ عن مواعظعه ۔ ازاماکن  آن مراد تحریف نعت  پیغمبر ست یا تاویل  کلمات  توریت رابر دفق  رائے وطبع خود۔ یا  تغیر کلام پیغمبر یاکتمان آیت  رجم۔ آوردہ اند کزمرہ از یہودکلازمت حضرت رسالت پناہ  مے آمد  ندو جواب آخحضرت رااز امریکہ سوال کردہ  بورند بقبول نلقی  میضمود مزواز مجلس ابشان منصرف شدہ ہماں کلمات متبر کہ ایشان رامحرف مے ساختند لاجرم پردہ ازرو ئے  کارایشان  برداشتہ فرمود کہ دشمنان شما  یہودی  سخنان تراکہ حبیب منے ازمواضع آن تحریف میکنند۔ یقولون۔ ومیگویند سمعنا۔ شنیدیم قول ترا۔ وعصینا ونا فرمان کردیم  امر ترا۔ ولفظ و عصینا  آشکارا میگفتند ازرو ئے عناد۔ دور تبسیرؔ گوید اظہار اطعناؔ واضمار عصیناؔ میکروند۔ وحقیقت آنست کہ زبان مقال۔ الیشان سمعناؔ میگفتہ ولسان حال ایشان بعصیناؔنا طق بودہ۔ و دیگر میگقنند۔ واسمع غیر مسمع۔ بشنودر حالیکہ غیر شنومزہ شدہ باشی۔ ایں کلمہ زود جہین است رو ئے در مدح دارد۔ و رو ئے درزم۔ وجہ مدح آنست کہ اسما ع شنوانیدن بودمیگونید کہ بشنو غیر شنوایندہ شدہ یعنے اصم  وایں  دعا علیہ باشد یہود وجہ مدح راپررہ تفاق  میساختہ  اندو مظمع نظر ایشاں وجہ مزمت بودہ۔ و دیگر  میکفتند ۔ وراعنا۔ وایں کلمہ نیز محتمل ولوجہین ست۔ وجہ مدحش آنکہ ازمر اعات باشد یعنے نگاہ دارمارا  و درمانگر۔ ودجہ زمش آنکہ ازرعونت و حمق بود و مراد یہود نسبت رعونت بودہ براں حضرت۔ و گفتہ اند  یہود اشباع میکروند کسرۂ عیں را ورا میگفتند یعنے اے شبان القریض میگروند آن  حضرت رابرعی غنم و بر ہر تقدیرے ایں کلمہ میگفتند۔

لیا بانسنتہم۔درحاکیتکہ گردانیدن و پیچا نیدن سُخن بزبان ہائے خود یعنے فعلیکہ از مرات ست ملبغت عرب آزا برعونت ردمیکنند بزبان کود ۔ یالسان عرب رانز فصاھت اولے پیچا نند و بطریق لحسن راعینا میگویندو وبآن زم آن  حضرت میخوا ہند۔ وطعناً فی الزین۔وقد و طعن دردین اسلام یعنے دینے کہ پیغمبر ادبشبانی منسوب بود آیا چہ دین خواہد بودوحال آنکہ الیشاں بشبانی موسیٰ معترف بودند۔  ولو انہم قالق۔ واگر الیشان گفتندے سمعنا۔ شنیدیم سخن ترا۔ واطعناً و فرمان برویم امر ترا۔ واسمع۔ بشبو سخن مارا۔ والنظرنا۔ ودرما نگاہ کن  اکان خیراً لھم۔ ہر آئینہ ایں گفتار بودے بہتر مراشیاں رااز استہراے سیدانام  وطعن دردین اسلام۔ واقوم دراست تربودے سخن ایشاں۔ ولکن لعنھم ﷲ۔ ولیکن برامزہ است خدائے ایشان راواز رحمت خوددور کردہ۔ بکفر ھم۔ بسبب کفرا یشاں و مجارات  برآں۔ فلایومنون۔ پسنمے گروندایشاں الا قلیلاً۔ مگرگردیدنی اندک یعنےضعیفی۔  الخ۔

عبدالقادر دوسرے فائدہ میں یوں لکھتے ہیں۔

راعناؔ لفظ بولتے تھے اس کا بیان سورہ بقر [2]میں ہوا۔ اسی طرح حضرت بات فرماتے تو جواب میں کہتے سنُا ہم نے۔  اُسکے معنے یہ ہیں کہ قبول کیا۔  لیکن آہستہ کہتے کہ نہ مانا یعنے فقط کان سے سُنا اور دل سے نہ سنُا۔ اور حضرت کو خطاب  کرتے تو کہتے۔ سُن نہ سنایا جایو۔ ظاہر میں یہ دعا نیک ہے کہ تو ہمیشہ غالب رہے کو ئی تجھ کو برُی بات نہ سنُا سکے۔ اور دل میں نیت رکھنے کہ تو بہرا ہو جائے۔ ایسی شرارت کرتے پھر دین میں عیب دیتے۔ کہ اگر یہ شخص نبی ہوتا تو ہمارا فریب معلوم کرتا وہی اﷲ نے واضح کر دیا۔

پس ظاہر ہے کہ قرآن میں کتب سماوی کی تحریف  کی طرف  اشارہ تک بھی نہیں ہے۔ بلکہ جیسا کہ آیات قرآنی  مذکورہ  کے بیان و تفسیر حسینی ع عبدالقادر جت دوسرے فائدہ سےاظہر من الشمس ہے۔ کہ چند کس یہودمدینہ  غلباً  اُن پانچ رئیس یہود مدینہ میں سے کئی ایک محمد صاحب کی مجلس  میں  جا کر بیٹھتے تھے۔ اور پکار کر تو کہتے۔ سمعنؔا یعنے سن لیا ہم نے اور آہستہ سے ہونٹھوں میں کہ دیتے۔ وعصیؔنا یعنے اور نہ  مانا ہمنے۔ یا اطعناؔ ہم نے مانا۔ کہ جگہ عصیناؔ ہم نے نہ مانا۔ یاعدول حکمیکی۔ اور اسیطرح وہ یہ بھی کہتے تھے۔ اسمع غیر مسمعؔ یعنے سنُ یعنے بغیر سنُنے کے۔ اور کہتے اعؔنا مگاہ کر ہم پر۔ اور جب اس کو زبان مروڑ کر کہتے تو راعیناؔ یعنے ہمارا چرواہا یا احمق کے  معنے  دینا چنانچہ اسی بابت قرآن میں ۔   

لماً بالسنتہم یعنے موڑ دیکر زبان سے بولنا لکھا گیا ہے۔

اور جلال الدین نے بھی تحریف کی یہ تفسیر کی ہے ولیا تحریف بالسنتہم۔  لپیٹ یعنے تحریف  ( یا منقلب کرنا) ساتھ اپنی زبانوں کے ۔

الغرض نتیجہ یہ نکلتا ہے کہ چند یہود مدینہ کو جو الزام  دیا گیا وہ مزکورہ بالا الفاظ کی تحریف  کا الزام تھا یا یہ تھا کہ جو کچھ وہ محمد  صاحب  سے سنُکر  جاتے تو باہر کے لوگوں کو محمد صاحب  کے الفاظ اُلٹ پلٹ کر سناُتے  اور اُس کے بیان کے برعکس بیان کرتے۔ (دیکھو تفسیر حسینی  کی اُس عبارت کو جس پر خط کھینچا گیا ہے)  لہذا اس سے یہ ہر گز  ثابت نہیں ہوتا کہ یہود مدینہ ( چہ جائیکہ تمام جہان کے اہل کتاب) نے کتُب سماوی مشتہرہ جہان کو تحریف کر ڈالا تھا۔ اور جو کچھ امام فخر الدین صاحب رازی فرماتے ہیں وہ نہایت ہی غور کے لایق ہے یعنے ’’ کس طرح ممکن ہے تحریف ایسی کتاب کی جس کے ہر حرف اور کلمے تو اتر کو پہنچ گئے ہیں اور مشرق سے غرب  تکمشہور ہو گئےہیں‘‘۔

پس اس آیت قرآنی متنازعہ کی دو باتوں پر غور کرنی چاہئے  ایک یہ کہ  کہتے ہؔیں۔ دوم یہ کہؔ۔ اپنی زبان مروڑ کرؔ۔  سو ا دونوں الفاظ سے چابت ہے کہ یہاں۔ اطعناؔ کی جگہ عصؔینا۔ اور راعؔنا  ی جگہ راعیناؔ وغیرہ کے تغیر و تبدل زبانی کا بیان ہے۔  نہ کہ کتب عماوی کا دعویٰ۔  پس  محمد صاحب کو ایسے ناممکن امر کے دعویٰ کا مدعی  قرار دینا گویا اُن کو عقل  و ہوش سے بے بہرہ قرار دینا ہے۔

۱۳۔ مائدہ۔ ۳ رکوع  ۱۴۔

 فَبِمَا نَقْضِهِم مِّيثَاقَهُمْ لَعَنَّاهُمْ وَجَعَلْنَا قُلُوبَهُمْ قَاسِيَةً  يُحَرِّفُونَ الْكَلِمَ عَن مَّوَاضِعِهِ  وَنَسُوا حَظًّا مِّمَّا ذُكِّرُوا بِهِ  وَلَا تَزَالُ تَطَّلِعُ عَلَىٰ خَائِنَةٍ مِّنْهُمْ إِلَّا قَلِيلًا مِّنْهُمْ  فَاعْفُ عَنْهُمْ وَاصْفَحْ  إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ۔

ترجمہ۔ پھر ان کی عہد شکنی کے باعث ہم نے ان پر لعنت کی اوران کے دلوں کوسخت کر دیا وہ لوگ کلام کو ا سکے ٹھکانے سے بدلتے ہیں اور اس نصیحت سے نفع اٹھانا بھول گئے جو انہوں کی گئی تھی اور تو ہمشیہ ان کی کسی نہ کسی خیانت پر اطلاع پاتا رہے گا مگر تھوڑے ان میں سے سو انہیں معاف کر اور درگزر کر بے شک الله نیکی کرنے والوں کو پسند کرتا ہے۔

تفسیر درِمنشور میں ابن جزیر نے ابن عباس سے روایت کی ہے۔ 

واخرج  ابن جزیر عن ابن عباس  فہ قوله یحرفون الکلم عن مواضعه یعنے حدود الته فی التوراة۔

ترجمہ۔ یہ جو فرمایا اﷲ تعالیٰ نے کہ ’’بدلتے ہین کلام کواپنے ٹھکانے سے‘‘ اس کے یہ معنے  ہیں کہ جو حدیں  ( یعنے گناہ گار کو سزا دینے) احکام کی اﷲ تعالیٰ نے توریت میں مقرر کی ہیں تغیرو تبدیل کرتے ہیں۔

امام فخرؔ الدین صاحب  رازی تفسیر کبیر میں لکھتے ہیں۔

التحریف  یحتمل  التاویل الباطل  ویحتمل  تغیر اللفظ وقد بینا  فیھا تقدم  ان الاول اولیٰ لان الکتاب المنقول باالتوانز لا یتانی فیه تغیر اللفظ۔

ترجمہ۔ تحریف  سے یا تو  غلط تاویل  مراد یا لفظ کا بدلنا  مراد ہے۔ اور ہم نے اوپر بیان کیاہے کہ پہلی مراد بہتر ہو کیونکہ جو کتاب بتواتر منقول ہواُس میں تغیر لفظ کی نہیں ہو سکتی۔

تفسیر حسینی میں ہے۔

فبما نقضہم  پس بشکستن الیشاں میثاقھم پیمان خودرا العنھم براندیم الیشان ازرحمت خود۔ یامسخ گروانیدیم ۔ باخواری  خبریہ برایشاں راقسیة  ً سخت بمشابہ کہ متاثر نشونداز مشاہدہ آیات واستماع تخویفات  یحرفون الکلم عن مواعظه  میگر وانند سخنان توریت  را۔ یا نعت حضرت رسالت  پناہ را ازجائیگا ہ آں یعنے صفت دیگر یرا بجائے  صفت پیغمبر  وضع میکتد ۔ یا کلمات توریت  راماول مسیازند بتاویلات فاسدہ۔ ونسوُاحظاّ و ترک  کروند بہسرہ تمام  راممِّاز لرقبه ۔ ازا نچہ پندوا دہ شدہ بوُند بداں در توریت  ازمتا بعت پیغمبر  اخرالزمان ولا تنرال تطلع وُ ہمیشہ  ہستی تو کہ مطلع شوی علی خائنة  منھم برخیا نتے از جہودان الا قلیلاً منھم مگر امز کے از  ایشان کہ خیانت نمیکتد  چوں ابن سلام و اصحاب او فاعف  عنہم پس عفوکن ودر گزرازیشاں اگر توبہ کنند وایمان آرندواصفح  و روئے  بگرداں ازا ایذاایشان اگر التزام جزیہ نمایند و گفتہ  اند  مطلق عفو وصفح بایتہ السیف منسوخ است اِ ن اﷲ یحب المھنین بدرسنیکہ خدائے دوست میدار ونیکو کاراں را۔ 

اس آیت سے ظاہر ہے کہ جو الفاظ سورہ نساء۔ کی آیت ۴۴ میں تھے وہی الفاظ اس ّ آیت میں بھی ہیں۔ پس  جو معنی ان الفاظ کے سورہ نساء  کی ۴۴۔ آیت مین لئے گئےہیں وہی ہمنے اس آیت میں بھی لئے  جاویں گے۔ یعنے جیسے وہاں یہود مدینہ  کو زبانی تحریف کا الزام دیا گیا ویسا یہاں  پر بھی دیا گیا ہے۔ اور علاوہ اس کے خود  اسی  آیت میں جویہ الفاظ ہیں ’’ کہ اُس نصیحت سے فائدہ لینا  بھول گئے‘‘ اس سے پایا جاتا ہے کہ  جو مطلب و مقصود  تھا اُس کو چند یہود مدینہ نے فراموش کر کے بدل دیا تھا۔ نہ یہ کہ  اُنہوں نے کتب سماوی  کی کسی عبادت کو جو اُن کی دست اندازی  سے باہر و نا ممکن تھا بدل  دیا تھا۔  اور پھر یہ جو اس آیت می ہے ۔ ’’ کہ تو ہمیشہ خبر پاتا ہے اُن کے ایک  دغا کی مگر تھوڑے  لوگ اُن میں سو معاف کر اور در گزر اُن سے اﷲ چاہتا ہے نیکی والوں کو ‘‘۔ اس سے طاہر ہے کہ تمام یہود مدینہ  بھی دغا باز نہ تھے اور اُن میں تھوڑے لوگ ایسے بھی تھے جو محمد صاحب سے دغابازی نہ کرتے تھے۔ اور نہ اُن پر الزام۔ ’’یحرفون الکلم عن مواضعه‘‘ کا دیا جا سکتا تھا۔  اور ملاں حسینی کے فرمانے کے بموجب  اُن تھوڑے  لوگوں سے ابن اسلام  وغیرہ محمدی  مراد نہیں لئے جا سکتے۔ کیونکہ جس حال میں وہ محمدی  ہو چکے تھے تو اُن سے در گزر کرنے کی تاوقتیکہ وہ توبہ کریں کوئی وجہ  نہیں پائی جاتی۔ پس اس آیت سے یہ ہر گز ثابت نہیں ہو سکتا  کہ تمام یہود مدینہ  کی نسبت یہ الزام دیا گیا ہے۔ چہ جائیگہ تماماہل کتاب کی نسبت  ( کہ جنہوں نےمحمد صاحب  سے دغا کرنا تو درکنار رہا اغلباً اُس وقت محمد صاحب  کا نام بھی نہ سنُا ہو گا) ایسا الزام  عاید  و تصور ہو سکے۔اور پھر تفسیر  درِمنشور میں ابن  خبریر نے ابن عباس سے روایت کر کے  اس قول کے’’بدلتے ہیں کلام کو اپنے ٹھکانے سے‘‘۔ کہ یہ معنے بتائے ہیں کہ جو حدیں  یعنے گناہ گار  کو سزا دینے کی اﷲ تعالیٰ نے اپنے احکام کے  ساتھ توریت میں مقرر  کی ہیں یہودی مدینہ میں سے بعضے اُن  سزاؤں کو تغیر تبدل کرتے۔ جیسا کہ زانی کے لئےسزا توریت  میں سنگسار کرنے کی مقرر تھی اور بعض یہود مدینہ  رعایت و لحاظ سے اس کے بجائے سزا تازیانہ بتاتے تھے۔ اور  ایسے احکام  کی سزاؤں کی تغیر و تبدیل  وہ پاک کتاب میں ہر گز نہ کر سکتے تھے مگر اپنی زبانی تاویلات میں ایسا کرتے تھے جیسا کہ آیت رجم کے مقدمہ سے ظاہر ہے۔ کیونکہ جیسا امام  فخر الدین صاحب  رازی فرماتے ہیں کہ جو کتاب بتواتر منقول ہو اُس میں تغیر لفظ کی نہیں ہو سکتی۔ لہذا قرآن میں دعویٰ تحریف کتب مقدسہ کا ہر گز نہیں ہے۔ 

۱۴۔ مائدہ۔ ۶ رکوع ۴۵ سے ۴۸۔ 

يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ لَا يَحْزُنكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ مِنَ الَّذِينَ قَالُوا آمَنَّا بِأَفْوَاهِهِمْ وَلَمْ تُؤْمِن قُلُوبُهُمْ وَمِنَ الَّذِينَ هَادُوا  سَمَّاعُونَ لِلْكَذِبِ سَمَّاعُونَ لِقَوْمٍ آخَرِينَ لَمْ يَأْتُوكَ  يُحَرِّفُونَ الْكَلِمَ مِن بَعْدِ مَوَاضِعِهِ  يَقُولُونَ إِنْ أُوتِيتُمْ هَٰذَا فَخُذُوهُ وَإِن لَّمْ تُؤْتَوْهُ فَاحْذَرُوا  وَمَن يُرِدِ اللَّهُ فِتْنَتَهُ فَلَن تَمْلِكَ لَهُ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا  أُولَٰئِكَ الَّذِينَ لَمْ يُرِدِ اللَّهُ أَن يُطَهِّرَ قُلُوبَهُمْ  لَهُمْ فِي الدُّنْيَا خِزْيٌ  وَلَهُمْ فِي الْآخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌ۔

ترجمہ۔ اے رسول انکا غم نہ کر جو دوڑ کر کفر میں گرتے ہیں وہ لوگ جو اپنے منہ سے کہتے ہیں کہ ہم مومن ہیں حالانکہ ان کے دل مومن نہیں ہیں اور وہ جو یہودی ہیں جھوٹ بولنے کے لیے جاسوسی کرتے ہیں وہ دوسری جماعت کے جاسوس ہیں جو تجھ تک نہیں آئی بات کو اس کےٹھکانے سے بدل دیتے ہیں کہتے ہیں کہ تمہیں یہ حکم ملے تو قبول کر لینا اور اگر یہ نہ ملے تو بچتے رہنا اور جسے الله گمراہ کرنا چاہے سو تو الله کے ہاں ا سکے لیے کچھ نہیں کر سکتا یہ وہی لوگ ہیں جن کے دل پاک کرنے کا الله نے ارادہ نہیں کیا ان کے لیے دنیا میں ذلت ہے اور آخرت میں بڑا عذا ب ہے ۔  الخ

تفسیر حسینی میں ہے۔

یایھا الرسول ۔ اے فرستادہ۔ خطاب  آخحضرت سست کہ آخحضرت رابلقب  یا کر دوا نبیائے دیگر رابنام مخاطب  ساختہ۔ چنانچہ یا  أدم انبہم۔ یا نوح اھبط۔ یا ابراھیم اعرض۔ یامر سطوانی اصطفیتک۔ یا عیسیٰ ابن مریم انت قلت۔ چوں نوبت خطاب بحضرت رسالنا پناہ  وعلی جمیع الا نبیاء رسید اور البسفہ میں ئے کمال  خطاب  کرو۔ چنانچہ یاا یھا النبی۔ یا یھا الرسول۔ لا یخذنک الزین۔ ترا اندو ہناک نگردا  مزکردازاں کسانے کہ ازروئے عناد۔  یُسارعون فی الکفر۔ میشتا بند و خودرامی افگتد ورکفر۔ من الزین قالوا۔ ازآنانکہ گفتند۔امناّ۔ ایمان آوردیم۔ ماوآن  گفتن ہمین ست بافواھہم۔ برزبان  ہائے ایشاں۔ ولم تؤمن قلوبھم ۔ وایمان نیا وردہ است دلہائے ایشان۔ مراد منافقان اندو کر دار ہائے ایشان آن بود کہ باکافران دوستی میکروند۔ ومنا الز ین ھادوا۔ بعضے ازاں کسانیکہ دین یہود یہ دارند۔  سمعون۔ شنومزگان قول ترا۔ للکزاب ۔ برائے آنکہ دروغ گویند برتو جہوداں بعد ازا ستماع کلام آخحضرت پروں می رقنند و میگفتنداز  محمدؑ  چنیں شنیدیم ونہ شنیدہ بودند وآں ہا یہود مدینہ بووند۔ سمعون لقوم اخربن۔ شنومزگان برائے گروہے دیگر کہ لم یاتو کہ۔ نیامدند بمجلس تو۔ مراد یہود خیبر یہ امزکہ یہود مدینہ  جاسوسی میکروند واخبار بخیر بیفرستاوند۔ نزول  آیت راسبب آں بود کہ زنےؔ و مروےؔ  ازا اشرف اھل خیبر رابز نابگر فتند وہر دد محض بودند وحدایشا بحکم توریت رجم بود یہود ملاحظہ بزگی ایشاں کردہ نخواستند کہ آں حد برایشاں اجرا کنند بایکدیگر گفتند کہ در کتاب ایں مرد کہ بہ شیرب نزول کردہ رجم ؔ نیست و نبی قرنیطہ ہمسایہ و حلیف او یندکسی بدیشاں فرستندتا حدزانی محصن ازو بپر سند اگر گوید تازیانہ  زنندقول  اور اقبول  کنید وا گر رجم امر فرمانید سخن اور اشنوید پس جمعی ازایشاں بازانین ممدینہ آمد ندو صورت حال بایہو (مدینہ درمیان آورونمد اشرف یہود و چوں کعب ؔ ۔ و کنانؔہ۔ و مالک  پمجلس حضرت فرمود کہ بحکم  من سید گفتند آرے فی الحال جبرائیل  بحکم  رجم نازل شدو حضرت فرمود کہ رجمؔ میباید کرد ایشاں ابا کروند و گفتند خدائے در توریت فرمودہ کہ ایشاں را چہل تازیانہ طلا کردہ بقیر بزنید تا پشت ایشان سیاہ گرددوروئے سیاہ گرد دباز گونہ بردراز گوش نشامزہ گرہ منازل بگر وانند جبرؔائیل آں حضرت را کبرداد کہ دروغ ے گویند وابن صورؔیا  کہ عالم ایشان ست سیدامزکر حکم تورؔیت  رجمؔ است نہ جلد حضرت فرمود کہ درمیان مردم  شمادرفدک جوانے ہست سادہ روئے و سفید پوست یکم چشم کہ اورا ابنؔ صوریا گویند گفتند آرے  دانا ترسہاہل زمین ست بتوریت حضرت فرمود کہ درمیان  ماوشمادر حکم توریت او حکم باشند گفتند آرے بحکم  اور ضی سیباشم حضرت بحضور ادامر  فرمود نعد از چند  روز اورا حاضر  کروند حضرت فرمود کہ انت ابنؔ صوریا گفت نعم حضرت رسالت پناہ گفت میان من وامینہا تو حکم باش کہ دانا تر یہودی ابن صوریا ؔ  قبول  کردو حضرت سو گندواد اور ابداں خدائے  کہ توریت  بموسیٰؔ  نازل گروانید ودریا برائے  شما بشگا قت و شما راآل فرعون نجات  وادہ من و سلویٰ برائے شما فرستاد  کہ درکتاب  شما حد زابی محض رجم است یانے۔ صوریاؔ گفت کہ نہ  تریں آن وارم محض رجم  است یانے۔ صوریاؔ گفت کہ نہ ترس آن  وار، کہ توریت مرابسوز داگر دروغ گویم  یا تغیر وہم  اعتراف  نہ کرومے  تو بگوئی کہ خدائے توچہ حکم کرد۔ حضرت رسالت پناہ فرمود  کہ خدائے من حکم چناں کردہ کہ چوں چہارم  گواہ بزنائے محصن و محصہ گواہی دہندرجم  برایشاں واجب شود۔ ابن صوریاؔ گفت بخدائے موسیٰ کہ در توریت  نیز ہمیں حکم فرمودہ اما علمائے ملاحظہ جانب  اشراف بنی اسرائیل نمودہ برجلدو تحمیم قرار دادہ اند۔  پس حضرت  بفر مودتا ہردو رارجم کروند و نزدیک در مسجد  حق سجانہ ازحال ایشاں خبر داد۔ یحرفون الکم۔ تغیر میدہند کلما را یعنے آیت رجم راْ ن بفدمواضعه۔ بعدازانکہ خدا وضع کرد آنرا۔درہوضع آن و بعوض آن جلد و تحمیم  منیویند۔  یقولون ۔ میگویند یہود خیبر۔ ان اُوتیتم ھذا۔ 


۱. حاشیہ کیونکہ محمد صاحب ایسے لوگ بہت اعتبار  کے لایق نہ تھے  اسی سبب سے بہت جھوٹی حدیثیں اُن  سے جاری ہوئی ہیں۔ چنانچہ مسلمہ میں ہے ۔ حدثنی عفان عن محمد بن یحیٰ بن سعید  القطان عن ابیہ۔ قال لم ترا الصالحین فی شی اکزب منھمہ فی الحدیث قال مسلمہ مجیری الکزب علی لسانھمہ  ولا یستعدون۔

ترجمہ۔ ہمنے  نہیں دیکھا صلحا کو کسی امر میں زیادہ جھوٹھا اُن سے جو حدیث  میں ہیں ۔ اور جاری ہو جاتا ہے جھوٹھہ اُن کی زبان (خودبخود) اور قصداً نہیں کہتے۔ تو حضرت پر اس طرح کے الزام بے بنیادی آیت  اُتر پڑتی تھی۔ لہذا ظاہر ہے کہ قرآن میں کتب سماوی کی تحریف کا دعویٰ نہیں ہے۔

۲. حاشیہ۔ بقر  رکوع ۱۰۴۔ ترجمہ۔ اے ایمان والو راعنا نہ کہو اور انظرنا کہو اور سنا کرو اور کافروں کے لیے دردناک عذاب ہے۔اس آیت کا دوسرا فائدہ عبدالقادر لکھتے ہیں۔یہود پیغمبر  کی مجلس میں بیٹھتے اور حضرت کلام فرماتے بعضے بات جو سنُی  ہوتی چاہتے کہ پھر تحقیق کریں تو کہتے راعناؔ یعنے ہماری طرف  بھی متوجہ ہو۔ ان سے مسلمان  بھی سیکھ کت کسی وقت یہ لفظ نہ کہو اگر کہنا ہو تو نظرناؔ کہو اُس کے بھی معنی یہی ہیں اور آگے  سے سنُتے رہو کہ پوچھنا ہی نہ پڑے۔ یہود کو اس لفظ کہنے میں دغا تھی وہ اُسکو زبان دبا کر کہتے تو راعینؔا ہو جاتا یعنے ہمارا چرواہا۔ اور اُن کی زبان میں۔ راعیاؔ احمق کو بھی کہتے تھے۔

Turkish Woman Weaving

امر تحقیقی

جناب مسیح موازانہ محمد عربی

میر عالم خان

Jesus vs Muhammad


Published in Nur-i-Afshan August 23, 1895
By
Mir Alam Khan


اکثر مسیحی مناّدوں سے غیر مزہبوں کے سایل ایسے  سوالات  کرتے ہیں کہ جن کے جواب دینے میں دربار مسایل  دین کے وہ خود عاجز  و پریشان  ہین کیونکہ دینی خواہو دنیاوی  تواریخ  کے گزشتہ  واقعات  کو ثابت  کرنے خواہ اُس سے کوئی معقول نتیجہ نکالنے  کے لئے ہر ایک اہل مذہب  کے ساتھ  میں اُنکی مقدّس کتاب کے ورقوں کے سوِا امر زیر بحث  کو سند یا غیر سند مان لینے کے لئے ظاہر ۱ً کوئی اور چیز زیادہ قابل  اعتبار نہیں ہے۔  چہ جائیکہ  ہماری الہامی  کتاب انجیل کی بابت خاصکر  اہل اسلام ہم سے تو باوجو د تسلیم کرنے قرآنی  سند کے’’کہ انجیل میں ہدایت و نور ہے‘‘۔ اُن کے کسی سوال کے انجیل سے جواب دینے پر ناک چڑہاتے  ہیں اور خود برعکس  اُس کے اپنی  دینی باتوں  کو بے سرو پاقصےّ کہانیوں سے گویا   ثابت کر کے پھولے نہیں سماتے۔

اس لئے میں  نے اپنی  اسٹڈی کے وقت سے کچھ  گنجایش  کر کے ایک امر تحقیقی  پر محض  قرآن  و انجیل  سے مسند مانکر غور کی ہے اور بے تعصب  و دور اندیش و دقیقہ  شناس  صاحبان  کی نظر  انصاف  کے سامنے  اُسے پیش کیا ہے۔ 

جس سے سچ سچ و جھوٹ جھوٹ بزاتہ  محض  انجیل و قرآن  کے مضامین  سے صاف ساف  ظاہر و ہو یدا ہیں۔

وہوہزا:

خدا کے پیغام  رسانوں کی حقارت  و زلت  و مرسل و انبیا کی زد و کوب  و قتل کا وہاں والوں کی طرف سے جن کے پاس وہ بھیجے گئے وقوع میں آنا نہ صرف انجیل ہی میں بیان  ہواہے کہ بلکہ متکلم کلام قرآن  نے مخالفوؓ کے قول و فعل سے ایذا  پہنچنے  کو محمد صاحب و خود  کلامِ قرآن  کے حق میں اپنی  صداقت  بیانی کا اعتبار  جسمانی  کی غرض سے بار بار  فخریہ ظاہر کیا ہے اور ایسے  بیان سے اپنے حق میں  یہ فائدہ مرتب  سمجھا  ہے کہ محمد صا حب  بھی گویا مثل  انبیا  ء سابقین  ستائے گئے اور لوگوں  سے دُکھ اُٹھانے  کے متحمل  ہوئے ہیں لیکن اس پہلو پر نظر نہیں  کی کہ محض دُکھ اُٹھانا ہی حقیقت کی دلیل نہیں ہے بلکہ بھلا کر کے دُکھ  اُٹھانے سے برکت  ملتی ہے نہ کہ ایذا رسانی  کے عیوض ایذا سہنا  برکت  کا باعث  ہو سکتا ہے اور نیز وہ بیان  جو محض  قرآن کے ضمن یا قرآن   کے مخالفوں و غیر   مخالفوں کی طرف سےمحمد صاحب و قرآن کےحق میں قرآن ہی سے ہوا ہے اُس سے اسبات  کا کہ  محمد صاحب  حق پر تھے یا قرآن  کلام  حق  تھا اور مخالف لوگ ناحق  کہتے تھے زرا  بھی  ایما پایا  نہیں جاتا  گو کہ قرآن  نے اُن کے مخالفانہ کلام  کی طرح    بہ طرح لزوید کی ہے اور درجّنوں کا قرآن پر ایمان  لانا بتلایا ہے برعکس اس کے یسوع المسیح واُس  کے کلام کی نسبت  جو کچھ مخالفوںو غیر مخالفوں نے  بہ کلمات  حقارت  یا ٹھٹھے  کے طور پر وغیرہ  کہا ہے خود ضمن  انجیل  و مخالفوں کے بے ساختہ کلمات سے یسوع  مسیح کی  حقیقت پر دال ہے اور اُس سے تمسّخر و حقارت  کے باوجود  اور اُس کے ساتھ ہی مسیح کی اعلیٰ صداقتیں و حقیقتیں  منکشف ہوتی ہیں جس سےاُس کا نہ صرف  بھلا کر کے دُکھ اُٹھانا  ظاہر  ہوتا ہے بلکہ  نظر   بر پہلو حقیقت واقعی  کے مخالفانہ  بے ساختہ کلمات سے شہادت برحق عیاں  ہوتی ہے لہذا حوالحجات زیل  پر راستی پسند  صاحبان  غور کریں اور راہ حق و  زندگی کی پہچان حاصل  کر کے اُس پر جو حق  ہے ایمان لاویں اور نا حق  کو  چھوڑ دیویں۔ آمین  ۔

قرآن
محمد عربی

قرآن سے جب محمد کود یکھتے ہیں ٹھٹھ ہی کرتے ہیں سورہ فرقان  آیت ۴۳۔

محمد کوئی نئی بات نہیں لایا۔ سورۃمومنوں آیت  ۷۰۔

محمد کو کوئی آدمی قرآن  سکھلاتا  ہے سورہ ہے  سورہ  نحل ۱۰۵۔

محمد معلم  دیوانہ ہے ( یعنے تعلیم یافتہ  دیوانہ) دخان ۱۳۔

لوگ محمد  کی نسبت حوادث زمانہ کی انتظار کر رہے تھے سورہ طور آیت ۳۰۔

اگر محمد از خود قرآن بنالاتا  تو خدا اُس کی گردن  کاٹ ڈالتا  سورہ حاقہ آیت ۴۳ سے ۴۹ تک۔

محمد پاک کتابیں پڑہا  کرتا ہے بتینہ ۲۰۔ 

قرآن

بتوک کی راہ  مجاہدین  قرآن پر ہنستے تھے توبہ ۶۶، ۶۷۔

اجلاس کا قول قرآن کی نسبت توبہ  ۵۷ سے ۶۷۔

کسی کا ایمان بڑہا۔ توبہ ۱۲۵۔ ۱۲۸۔

کہانیاں ہیں، نحل ۲۶۔

ٹھٹھہ سورہ  نِسا۔ آیت  ۱۳۹ ۔

کیوں کوئی آیت نہیں بنائی؟ اعراف ۳۰۳۔

 

اِنجیل
یسوع مسیح

۱۔ وہ بھیڑ اُس کی تعلیم سے دنگ ہوئی کیونکہ وہ فقیہوں کی مانند نہیں  بلکہ اختیار  والے  کے طور  پر سکھلاتا تھا  متی ۷۔ ۱۹۔

۲۔ پیادوں نے جواب دیاکہ ہر گز کسی شخص  نے اِس آدمی کی مانند کلام نہین کیا یوحنا ۷۔ ۴۶۔

۳۔ جب اُن جماعتوں  نے دیکھا کہ گونگے بولتے اور ٹنڈےتندرست  ہوتے لنگڑے  چلتے اور اندھے  دیکھتے  تو تعجب  کیا اور اسرائیل  کے خداوند کی ستایش کی متی ۱۵۔ ۳۱۔

۴۔ نہایت حیران ہو کے کہا کہ اُس نے سب کچھ  اچھا کیا کہ بہروں کو سننے کی اور گونگوں  کو بولنے  کی طاقت  دیتا  ہے۔ مرقس ۷۔ ۳۷۔ 

۵۔ کلمات  حقاؔرت  جس سے اعلیٰ حقیقت  کی شہادت ملتی  ہے یعنے  گنہگاروں کا یار۔ متی ۱۱۔ ۱۹۔

۶۔ لو گ تعجب کر کے کہنے لگے کہ یہ کس طرھ کا آدمی ہے کہ ہوا اور دریا بھی اُس کی مانتے ہیں۔ متی ۸۔ ۷۲

۷۔ تب لوگوں نے یہ دیکھکر  تعجب  کیا اور خدا کی تعریف کرنے لگے کہ ایسی  قدرت انسان کو بخشی متی ۸۔۸۔

۸۔ اُنہوں نے جو کشتی  پرتھے آکے اُسے سجدہ  کر کے  کہا تو سچ مچ خدا کا بیٹا  ہے۔ متی ۱۴۔ ۳۳۔

 

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