December 2016

Jesus Account - Arabic

حكايات عن يسوع

وثائقي جديد يستكشف الدقّة التاريخية وموثوقية القصص الواردة في العهد الجديد عن حياة يسوع، عبر تفحّص الدلائل القديمة المتوفّرة اليوم لدى الخبراء.

يبرهن هذا الوثائقي في ثلاثين دقيقة أن الحكايات المروية عن يسوع مبنية على دلائل صحيحة، مخطوطات قديمة مهمّة، نقل عن شهود عيان، وأكثر من ذلك. فرصة لنرى أن الإدعاءات التي تزعم أن القصص الواردة في الإنجيل هي محرّفة، يمكن إحباطها بثقة.

Destroyer of the Lion

शेर अफ़गन

मुसन्निफ़

अल्लामा सुल्तान मुहम्मद पॉल

प्रोफ़ेसर अरबी-अलीफ़-सी-कॉलेज-लाहोर व एडीटर नूर अफ्शां

जिसे

मुसन्निफ़ ने 28 नकसुन रोड-लाहोर

से शाया किया

1930 ई

ऐ तुम जो बोझ से दबे हुए हो मेरे पास आओ कि मैं तुम्हे आराम दूंगा I

क़ौलुल-मसीह

Maulvi Sultan Muhammad Khan Paul

Sher Afgan

Destroyer of the Lion

By

The Late Maulvi Sultan Muhammad Khan Paul

Arabic Professor, Forman Christian College Lahore

1884-1960

 

फ़ेहरिस्ते मज़ामीन
मज़्मून
फ़स्ल अव़्वल (1) मौलवी सना-उल्लाह साहिब और इस्लाम में नजात
फ़स्ल दोम (2) मौलवी सना-उल्लाह साहिब भी नजात बिल अमल नहीं मानते।
  (3) मौलवी सना-उल्लाह साहिब का हमारे रिसाले के आगे सर्बस्जुद होना।
फ़स्ल सोम (4) मौलवी सना-उल्लाह साहिब की क़ुरआन फ़हमी व हदीस दानी।
  (5) क़ुरआन की शहादत कि आयत ज़ेर-ए-बह्स में वारिद (وَارِدُ) के मअनी
  (6) अशआर अरब की शहादत कि वारिद (وَارِدُ) बह माअनाए दाख़िल है
  (7) अहादीस की शहादत कि वारिद (وَارِدُ) के माअनी दाख़िल के हैं।
फ़स्ल चहारुम (8) लफ़्ज़ वारिद (وَارِدُ) का फ़ैसला और दोज़ख़ का भर जाना
  (9) ख़ुदा का दोज़ख़ को भर देना
  (10) शेर क़ालीन की गुरेज़।
  (11) आयत नंबर 2 की मुश्किलात
  (12) मौलवी सना-उल्लाह साहिब का आमाल-नामा
  (13) ज़र्रा ज़र्रा का हिसाब किताब।
फ़स्ल शश्म (14) मौलवी सना-उल्लाह साहिब अब क्या करेंगे
  (15) मौलवी सना-उल्लाह साहिब की बरुहान तत्बीक़
  (16) नक़्ल हल्फ़ीया बयान मौलवी सना-उल्लाह साहिब अमृतसरी बाद इल्लत लाला आत्मा राम साहिब
फ़स्ल हफ़्तुम (17) मौलवी सना-उल्लाह साहिब का ख़ातिमा
  (18) मौलवी सना-उल्लाह साहिब की दियानतदारी
फ़स्ल हश्तम (19) मौलवी सना-उल्लाह साहिब के इल्ज़ामी जवाबात पर नज़र
फ़स्ल नह्म (20) मौलवी सना-उल्लाह साहिब की नेकी और बदी
फ़स्ल दहुम (21) मौलवी सना-उल्लाह साहिब के कफ़्फ़ारा पर एतराज़ात और क़ुरआन व हदीस से कफ़्फ़ारा का सबूत
  (22) इस्लाम का तरीक़ा नजात
  (23) इस्लाम में तरीक़ नजात
ततिम्मा
  (24) मौलवी सना-उल्लाह साहिब को चैलेंज
  (25) मौलवी सना-उल्लाह साहिब के मोअतबर नाई को चैलेंज
  (26) हमारी दियानतदारी पर मोअतबर नाई की तस्दीक़
तमत तमाम शुद

शेरअफ़गन

फ़स्ल अव़्वल

मौलवी सना-उल्लाह साहिब और इस्लाम में नजात

चल मेरे ख़ामा बिस्मिल्लाह


 

Three Crosses
तीन पार

 

क़ब्ल इस के कि मैं इस अम्र को ज़ाहिर कर दूँ कि मौलवी सना-उल्लाह साहब इस्लाम में नजात साबित करने से किस तरह क़ासिर और आजिज़ रह गए ये मुनासिब मालूम होता है कि नाज़रीन रिसाला से आपका तआरुफ़ कराया जाये ताकि इस अम्र की सदाक़त कि इस्लाम में मुतलक़ नजात नहीं है आपकी शिकस्त से कामिल तौर पर यक़ीन हो जाए।

आपका इस्म गिरामी सना-उल्लाह है। जिसको बक़ौल मुसन्निफ़ निशानात मिर्ज़ा बजवाब इल्हामात मिर्ज़ा" लोग किसी क़दर तग़य्युर व तब्दील के साथ मुख़्तलिफ़ तौर पर लेकिन एक ही वज़न पर अदा करते हैं इल्मीयत के लिहाज़ से आप मौलवी फ़ाज़िल हैं और अहले हदीस के ऐडीटर और मालिक। बह्स व मुबाहसा में आप काफ़ी शौहरत के इलावा काफ़ी सर्वत भी हासिल कर चुके हैं और नज़र बुदूर बावजूद पीराना-साली के अब तक आप जवानी की धुन में ख़िज़ाब इस्तिमाल करते हैं और पैर चौदह साला बने फिरते हैं। ना मालूम आपको इस से क्योंकर तसल्ली मिलती है। और दूसरों को क्योंकर एतबार होता है। ताहम आपको इस से एक गोना दिलचस्पी ज़रूर है। आपके अहबाब ने आपको फ़ातिह क़ादियान और शेर पंजाब का ख़ाना-साज़ या ख़ानाबरअंदाज़ ख़िताब भी दे दिया है। लेकिन निशानात मिर्ज़ा बजवाब इल्हामात मिर्ज़ा में आपके चंद और निहायत दरख़शां खिताबों का भी ज़िक्र है जिनको हम इस मज़्मून के आख़िरी हिस्से में हद्या नाज़रीन करेंगे।

आप असलन कश्मीरी हैं लेकिन अमृतसर से आपको ख़ास उन्स है। इसलिए आप अमृतसर में मुक़ीम हैं। असलन आप मुसलमानों के उस फ़िर्क़े से ताल्लुक़ रखते हैं जिसको वहाबी, नज्दी और ग़ैर-मुक़ल्लिद कहते हैं ग़ैर-मुक़ल्लिद किसको कहते हैं। इस बारे में हम एक मुसलमान की तस्नीफ़ से एक इक़्तिबास हद्या नाज़रीन करते हैं।

"फ़िर्क़ा ग़ैर-मुक़ल्लिद हमेशा से बे-अदबी, गालियों और नाशाइस्ता अल्फ़ाज़ का मश्शाक़ है। इब्तिदाई ग़ैर-मुक़ल्लिदों में से बाअज़ मर्दुदों ने अम्बिया औलिया और बुज़ुर्गान दीन को रहबानों और बुतों से तशबीया दी है। जब अम्बिया और बुज़ुर्गान-दीन इन शयातीन की ज़बान दराज़ी से नहीं बचे तो हम क्या रंज कर सकते हैं" (निशानात मिर्ज़ा बजवाब इल्हामात मिर्ज़ा सफ़ा 14)

शायाद यही वजह है कि मेरे रिसाला का जवाब लिखते लिखते आप इस ख़ुसूसी इम्तियाज़ के इज़्हार पर मज्बूर हो गए। और एक और वहाबी के साथ मिलकर वो ज़हर उगला 1 है जिससे हम भी ये नतीजा निकालने पर मज्बूर हो गए कि एं ख़ाना हमा आफ़्ताब अस्त I

इस क़दर मुख़्तसर तआरुफ़ कराने के बाद अब मैं असल मज़्मून की तरफ़ मुतवज्जा होता हूँ गुज़शता 3 सितंबर 1928 ई में हाफ़िज़ा-आबाद में मुसलमानों और ईसाईयों के दर्मियान एक फ़ैसला कुन मुबाहिसा हुआ। जिसका मुफ़स्सिल और पोस्तकंदा बयान रिसाला "मुबाहिसा हाफ़िज़ा-आबाद" में छप चुका है (जो मिस्टर मूसा ख़ान महां सिंह बाग़ लाहौर से निहायत कम क़ीमत पर मिल सकता है) उसी मुबाहिसा में एक वाक़िया के दौरान मैंने मौलवी साहब से ये कहा था कि आप में अगर कुछ ग़ैरत और हमीय्यत बाक़ी है तो आप मेरे रिसाले का जवाब लिखें। अगर आप उसका ऐसा माक़ूल जवाब दें जिसका जवाब-उल-जवाब मैं ना दे सकूँ तो मैं मुसलमान हो जाऊँगा जिसका साफ़ मतलब ये था कि मुझको कामिल यक़ीन है कि ना तो इस्लाम में नजात है और ना आप उस का जवाब लिख सकेंगे। चुनांचे जब आप अमृतसर पहुंच गए तो मेरे रिसाला मज़्कूर का बज़अमे-ख़ुद जवाब लिखना शुरू किया। चुनान्चे वही हुआ जो हम कह चुके थे यानी मौलवी साहब ने ना सिर्फ तस्लीम किया कि इस्लाम में नजात नहीं है। बल्कि अपनी इल्मीयत पर भी एक बड़ा दाग़ लगाया है। ख़ैर जो कुछ आपने लिखा है हम इसको अपने मुख़्तसर रेमार्क के साथ हद्या नाज़रीन करते हैं और जब ये मज़्मून मुकम्मल हो जाए तो बग़रज़ तस्फ़ीया हम इस को अहले हदीस के दलाईल के साथ पण्डित राम चन्द्र देहलवी के पास भेज देंगे। क्योंकि हम दोनों के नज़्दीक आप मुंसिफ़ मुक़र्रर हो चुके हैं।

लेकिन पहले इस से कि मैं मौलवी साहब के जवाब की तर्दीद लिखूँ मुनासिब मालूम होता है कि मैं अपने रिसाला मज़्कूर का ख़ुलासा हद्या नाज़रीन करूँ ताकि इस बह्स के समझने में कोई दिक़्क़त बाक़ी ना रहे। मेरे रिसाला मज़्कूर का ख़ुलासा हस्ब-ज़ैल है :—


  1. क़ुरआन शरीफ़ के रु से नजात आमाल सालहे पर मौक़ूफ़ है।
  2. فَمَنْ يَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّۃٍ خَيْرًا يَّرَہٗ وَمَنْ يَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّۃٍ شَرًّا يَّرَہٗ   फ़मययअमल मिस्क़ाल ज़र्रतिन खैरय्यरह व मय्यअमल मिस्क़ाला ज़र्रतिन शर्रयरह के रू से कोई फ़र्द बशर
    आमाल सालेहा से नजात हासिल नहीं कर सकता है।
  3. तमाम बनी-आदम गुनहगार हैं।
  4. अहादीस सहीहा के रू से आमाल सालेहा कोई चीज़ नहीं है। हत्ता कि ख़ुद आँहज़रत को उनके आमाल नजात नहीं दिला सकते हैं।
  5. अहादीस के रू से नजात सिर्फ़ ख़ुदा के रहम से हासिल हो सकती है लेकिन रहम बलामबादला कोई चीज़ नहीं है।

अब मौलवी साहब की गुल-अफ़्शानी मुलाहिज़ा हो


1. इसका जवाब इसी रिसाले के तमिमा में देखो (मन्ह)

फ़स्ल दोम

मौलवी सना-उल्लाह साहिब भी नजात

बिला- अमाल नहीं मानते


 

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नाज़रीन आप ये देखकर निहायत ख़ुश होंगे कि मौलवी सना-उल्लाह साहिब ने निहायत दियानतदारी के साथ मगर ग़ैर मुतवक़्क़े तौर पर मेरे रिसाले के शक़्क़ अव्वल और दोम, व सोम और चहारुम, पंजुम को यानी मेरे रिसाले के तमाम दलाईल को बिलाकम व कासित तस्लीम किया है।

मौलवी सना-उल्लाह साहिब का हमारे रिसाला के आगे सरबसजूद होना चुनांचे आप इन अहादीस के जवाब में जिनसे हमने ये इस्तिदलाल किया था कि कोई फ़र्दबशर अपने आमाल के ज़रीये नजात हासिल नहीं कर सकता है। बल्कि ख़ुद आँहज़रत को भी उनके आमाल नजात नहीं दे सकते हैं। रक़म फ़रमाते हैं कि :—

"असल हक़ीक़त ये है कि इन्सान का ख़ुदा से जो रिश्ता है वो तक़ज़्ज़ी है कि इन्सान दम-भर ख़ुदा की याद से ग़ाफ़िल ना हो शेख़ सादी मरहूम ने गुलिस्तान के शुरू सी में इस राज़ को लिखा है कि "बरहर नफ़से दो नेअमत देर हर नेअमत शुक्र वाजिब" इस लिहाज़ से इन्सान के आमाल शरईयह भी इस की नजात के लिए काफ़ी नहीं हो सकते। क्योंकि इनमें भी बहुत सा वक़्फ़ा मिल सकता है कि इन्सान अपने सांस और कामों में ख़र्च करे और शुक्र वाजिब से ग़ाफ़िल हो जाए ये आरिफ़ाना नुक्ता समझाने को हुज़ूर पैग़ंबर ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने ये हदीस फ़रमाई है (सदक़ल्लाह व रसुला)

बे-शक आमाल शरईयह इतनी हैसियत नहीं रखते कि दुनियावी नेअमा का शुक्र अदा होने के बाद नजात उखरवी के लिए भी इल्लत हो सकें। हाँ मह्ज़ उस का फ़ज़्ल ही फ़ज़्ल है कि चंद लम्हों की इताअत को दाइमी राहत , ( नजात) का मूजिब बना दिया। ये तशरीह है हदीस मज़्कूर की। क्या वजह है कि पहले तो आमाल के मूजिब नजात होने से इन्कार किया। पीछे आमाल की ताकीद फ़रमाई। इस की वजह वही है जो हम बता आए हैं कि आमाल ज़ाती हैसियत से हरगिज़ मूजिब नजात नहीं। मगर बेकार भी नहीं" (अहले-हदीस अमृतसर मत्बूआ 9 नवम्बर 1929 ई. सफ़ा 3)

शुक्र अल्लाह कि मियां मन दाद सुलह फ़ताद कहो ईसा मसीह की जय
क़ुरआन-ए-मजीद ने किया ही ख़ूब कहा है कि :—

وَجَاعِلُ الَّذِيْنَ اتَّبَعُوْكَ فَوْقَ الَّذِيْنَ كَفَرُوْٓا اِلٰى يَوْمِ الْقِيٰمَۃِ     ۝

यानी "ऐ ईसा मैं तेरे पैरौओं को क़ियामत के दिन तक उन लोगों पर जो तुझसे इन्कार करते हैं ग़ालिब रखूंगा।” फल-हम्दु-लिल्लाह अला ज़ालिक :—

नाज़रीन को याद होगा कि मैंने गुज़शता औराक़ में अपने रिसाले का (मैं क्यों मसीही हो गया) ख़ुलासा अज़ करा-ए-जे़ल लिखा था कि :—

  1. क़ुरआन शरीफ़ के रु से नजात आमाल सालेहा पर मौक़ूफ़ है।
  2. فَمَنْ يَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّۃٍ خَيْرًا يَّرَہٗ وَمَنْ يَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّۃٍ شَرًّا يَّرَہٗ फ़मययअमल मिस्क़ाल ज़र्रतिन खैरय्यरह व मय्यअमल मिस्क़ाला ज़र्रतिन शर्रयरह के रू से कोई फ़र्द बशर आमाल
    सालेहा से नजात हासिल नहीं कर सकता है।
  3. तमाम बनी-आदम गुनहगार हैं।
  4. अहादीस सहीहा के रू से आमाल सालेहा कोई चीज़ नहीं है। हत्ता कि ख़ुद आँहज़रत को उनके आमाल नजात नहीं दिला सकते हैं।
  5. अहादीस के रू से नजात सिर्फ़ ख़ुदा के रहम से हासिल हो सकती है लेकिन रहम बलामबादला कोई चीज़ नहीं है।

इन तमाम शक़ूं को तो मौलवी साहब ने अपनी इबारत बाला में तस्लीम कर लिया। अलबत्ता शक़्क़ सोम के मुताल्लिक़ आपने एक हर्फ़ भी नहीं लिखा है। जिससे साफ़ ज़ाहिर है कि आपको ये भी तस्लीम है कि तमाम अम्बिया और बाक़ी तमाम इन्सान गुनहगार हैं। लिहाज़ा अब हम में और मौलवी साहब में कोई उसूली इख़्तिलाफ़ नहीं रहा। सिर्फ आपको इन दो आयतों की तफ़्सीर करने में हमसे किसी क़दर इख़्तिलाफ़ है। जिनको हमने अपने रिसाला में लिखा था। वो दो आयतें ये हैं :—

  1. وَإِن مِّنكُمْ إِلَّا وَارِدُهَا كَانَ عَلَى رَبِّكَ حَتْمًا مَّقْضِيًّا
    ثُمَّ نُنَجِّي الَّذِينَ اتَّقَوا وَّنَذَرُ الظَّالِمِينَ فِيهَا جِثِيًّا
      (सुरह मर्यम आयत 71, 72)
  2. وَلَوْ شَاء رَبُّكَ لَجَعَلَ النَّاسَ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلاَ يَزَالُونَ مُخْتَلِفِينَ إِلاَّ مَن رَّحِمَ رَبُّكَ وَلِذَلِكَ خَلَقَهُمْ وَتَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ لأَمْلأنَّ جَهَنَّمَ مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ

कुरआन सुरह हुद आयत 120 (मैं क्यों मसीही हो गया सफ़ा 31,33)

इन दो आयतों की बाबत हम अगले सफ़्हों में अर्ज़ करेंगे।

फ़स्ल सोम

मौलवी सना-उल्लाह साहिब की क़ुरआन फ़हमी व

हदीस दानी

आयत नंबर अव्वल यानी :—

وَإِن مِّنكُمْ إِلَّا وَارِدُهَا كَانَ عَلَى رَبِّكَ حَتْمًا مَّقْضِيًّا ثُمَّ نُنَجِّي الَّذِينَ اتَّقَوا وَّنَذَرُ الظَّالِمِينَ فِيهَا جِثِيًّا   (सुरह मर्यम आयत 72, 73, मैं क्यों मसीही हो गया सफ़ा 31) के मुताल्लिक़ आप लिखते हैं कि :—

"आयत मौसूफ़ा में सिर्फ एक लफ़्ज़ तहक़ीक़ तलब है "यानी वारिद (وَارِدُ) ये लफ़्ज़ उसी सूरत (इस्म फाइल ) में सुरह यूसुफ़ में आया है :—

وَجَاءتْ سَيَّارَةٌ فَأَرْسَلُواْ وَارِدَهُمْ فَأَدْلَى دَلْوَهُ  (सुरह यूसुफ़)

यानी जब मुसाफ़िरों का क़ाफ़िला आया तो उन्होंने अपना वारिद भेजा (ताकि पानी लाए) उसने अपना डोल कुवें में डाला"

यही लफ़्ज़ सुरह क़िसस की आयत 28 में बसफ़ा माज़ी आया है ग़ौर से सुनिए :—

وَلَمَّا وَرَدَ مَاء مَدْيَنَ وَجَدَ عَلَيْهِ أُمَّةً مِّنَ النَّاسِ يَسْقُونَ

“हज़रत मूसा मदयन के पानी के पास आए तो वहां देखा कि एक क़ौम पानी पिलाती है”

इन दोनों मौक़ों पर इस लफ़्ज़ से पानी के अंदर घुंसना मुराद नहीं वर्ना उस के बाद अदलादलवहु (ادلےٰ دلوہ) और वजद अम्मह (وجد امد) सही ना होगा। पस वारिद (وَارِدُ) के मअनी हैं पानी के पहुंचने वाला। इन दो शहादतों से आयत ज़ेर-ए-बह्स के मअनी ये हुए कि हर एक इब्न-ए-आदम नेक हो या बद जहन्नम के पास से गुज़रेगा जिसकी बाबत हदीसों में ऊपर का लफ़्ज़ आया है ना कि अंदर। फिर वो अपने अपने आमाल के मुवाफ़िक़ जहन्नम से दौड़ाते जाएंगे और ज़ालिम बद-किर्दार जो जहन्नम ही के लायक़ होंगे जहन्नम में छोड़ दिए जाएंगे" (अहले हदीस मत्बूआ 19 अक्तूबर 1928 ई सफ़ा 2)

फिर आप लिखते हैं कि :—

"मुख़्तसर ये कि लफ़्ज़ वारिद (وَارِدُ) के माअनी समझने में आपको ग़लती हुई है। हम उस का तर्जुमा करते हैं पास पहुंचने वाला पास से गुज़रने वाला। आप करते हैं आग में दाख़िल होने वाला हमारे तर्जुमा की शहादत ख़ुद क़ुरआन देता है आपकी नहीं" (अहले हदीस मत्बूआ 19 अक्तूबर 1928 ई सफ़ा 2)

मैं तो इस पीर जवाँ नमांया जान-बूझ कर अंजान बनने वाले की क़ुरआन फ़हमी का क़ाइल उस वक़्त हो चुका था जबकि आपने क़ुरआन शरीफ़ की इस आयत की बिना पर :—

وَلَا تَنْكِحُوْا مَا نَكَحَ اٰبَاۗؤُكُمْ

ये फ़तवा दिया था "कि दादी से पोते का निकाह जायज़ है" और फिर एक हैदराबादी वहाबी के समझाने पर रुजू कर लिया" (अल-फ़क़ीयह अमृतसर 21 मई 1926 ई सफ़ा 8) हमें कामिल उम्मीद है कि अगर हमारे समझाने पर नहीं तो किसी और वहाबी के समझाने पर आप फिर अपने इस क़ौल से रुजू करेंगे कि वारिद (وَارِدُ) के मअनी "पास पहुंचने वाला। पास से गुज़रने वाला के हैं। चुनांचे आप लिखते हैं कि हम इसका तर्जुमा करते हैं। पास पहुंचने वाला पास से गुज़रने वाला" आप करते हैं दाख़िल होने वाला हमारे तर्जुमा की शहादत ख़ुद क़ुरआन देता है। आपकी नहीं" (अहले हदीस 19 अक्तूबर 1928 ई सफ़ा 2) जिसका साफ़ मतलब ये है। कि अगर हम भी क़ुरआन शरीफ़ से "शहादत पेश करें तो आप बिला चोन व चरा हमारे तर्जुमें को तस्लीम करेंगे। लिहाज़ा हम क़ुरआन शरीफ़ से चंद ऐसी आयतें पेश करेंगे जिनमें ये लफ़्ज़ ज़ेर-ए-बह्स दख़ूल के मअनी में आया है और ऐसी वाज़ेह सूरत में कि अगर तमाम दुनिया के नज्दी या वहाबी इकट्ठे हों तब भी दूसरे माना ना कर सकें और इस के बाद हम अपनी ताईद के लिए अशआर अरब से भी चंद शवाहिद पेश करेंगे कि इस फ़ाज़िल वहाबी को कम अज़ कम क़ुरआन शरीफ़ की किसी आयत के तफ़्सीर करने का ढंग तो मालूम हो जाए वो आयतें ये हैं :—

क़ुरआन की शहादत कि आयत ज़ेर-ए-बह्स में "वारिद" (وَارِدُ) के मअनी दाख़िल के हैं

  1. إِنَّكُمْ وَمَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ حَصَبُ جَهَنَّمَ أَنتُمْ لَهَا وَارِدُونَ   (सुरह अम्बिया 21:98, 99)
    तर्जुमा : तहक़ीक़ तुम और जो कुछ तुम पूजते हो अल्लाह के सिवाए ईंधन हो दोज़ख़ के और तुमको इस में दाख़िल होना है।”
  2. لَوْ كَانَ هَؤُلَاء آلِهَةً مَّا وَرَدُوهَا وَكُلٌّ فِيهَا خَالِدُونَ   (सुरह अम्बिया 21:100)
    तर्जुमा : "अगर ये लोग ख़ुदा होते तो दोज़ख़ में दाख़िल ना होते और यह सब दोज़ख़ में हमेशा तक रहेंगे।”
  3. يَـقْدُمُ قَوْمَہٗ يَوْمَ الْقِيٰمَۃِ فَاَوْرَدَہُمُ النَّارَ۝۰ۭ وَبِئْسَ الْوِرْدُ الْمَوْرُوْدُ   (सुरह हूद 11:10)
    तर्जुमा : क़ियामत के दिन (फ़िरऔन ) अपनी क़ौम के आगे आगे होगा और दाख़िल
    करेगा (अपनी क़ौम को ) दोज़ख़ में और दोज़ख़ दाख़िल होने की बुरी जगह है।”
  4. يَوْمَ نَحْشُرُ الْمُتَّقِينَ إِلَى الرَّحْمَنِ وَفْدًا وَنَسُوقُ الْمُجْرِمِينَ إِلَى جَهَنَّمَ وِرْدًا  (सुरह मर्यम 19:89)
    तर्जुमा : "जिस दिन हम इकट्ठा करेंगे परहेज़गारों को रहमान ख़ुदा के पास मेहमानी के लिए और हांक ले जाएंगे गुनहगारों को दोज़ख़ की तरफ़ दाख़िल होने के लिए।”

इन क़ुरआनी शवाहिद के देखने के बाद अगर इस फ़ाज़िल वहाबी के दिल में कुछ भी क़ुरआन शरीफ़ की इज़्ज़त बाक़ी है तो ज़रूर अपनी इस राय फ़ासिद से "हम उस का तर्जुमा करते हैं पास पहुंचने वाला, पास से गुज़रने वाला।” इसी तरह रुजू करेगा जिस तरह अपने इस फ़तवा से रुजू किया कि "दादी से पोते का निकाह जायज़ हैI" आपकी लिखी हुई तफ़्सीर भी इस किस्म की लग़ूयात से भरी हुई है। जिनकी बिना पर आप पर कुफ़्र का फ़तवा लग चुका है। लेकिन सुनते हैं कि इब्ने मसऊद के समझाने पर आपने इस किस्म के काबिल एतराज़ मुक़ामात को अपनी तफ़्सीर से ख़ारिज कर दिया है नेअयारत दीगर उन से रुजू किया है।

अशआर अरब की शहादत कि "वारिद" (وَارِدُ) बह मअनी दाख़िल है

हमने वाअदा किया था कि क़ुरआन शरीफ़ के शवाहिद के इलावा अशआर अरब में से भी चंद शवाहिद पेश करेंगे ताकि क़ुरआन शरीफ़ के लफ़्ज़ ज़ेर-ए-बह्स के मअनी अच्छी तरह समझ में आ जाऐं ये भी सुन लीजिए :—

وردن دوار عاذ خرجن شهثا کا مثال الرصاع قد بلین

(मबा मोअल्लक़ात माक़ला पंजुम)
तर्जुमा: लड़ाई में वो ज़िरह पहन कर दाख़िल होते हैं। और परागंदा हो निकलते हैं इन लगामों की मानिंद जिनकी गाँठ पुरानी हो चुकी हों।”

بانا نورد التوایات بیضا ونصد رھن حمرا قدروینا

(सबअ मोअल्लक़ात मुअल्लक़ा पंजुम)
तर्जुमा: हम वो लोग हैं जो अपने सफ़ैद नेज़ों को अपने दुश्मनों के सीनों के अंदर दाख़िल कर देते हैं और जब उनको निकाल लेते हैं तो ख़ून से सेराब और सुर्ख़ होते हैं।"

رعو اظما ھمہ حتی اذا تم وارد غمارا تفرے بالسلاح وبالدم

(सुबह मोअल्लक़ात मुअल्लक़ा सोम)

तर्जुमा: कुछ देर तक दोनों फ़रीक़ लड़ाई से बाज़ रहे। जब मियाद ख़त्म हुई। फिर लड़ाई के गहरे पानी में आपने उनको किस तरह दाख़िल किया कि उनके हथियारों और ख़ून से पानी शक़्क़ हो गया।

हमने मह्ज़ इस ग़रज़ से क़ुरआनी और अरबी शवाहिद पेश किए ताकि इस फ़ाज़िल वहाबी की क़ुरआन फ़हमी की हक़ीक़त वाज़ेह हो जाए। वर्ना ख़ुद आयत ज़ेर-ए-बह्स, इस क़दर वाज़ेह है कि जिसकी वज़ाहत के लिए और "शहादत की" मुतलक़ ज़रूरत ही नहीं है। आपकी क़ुरआन फ़हमी की लियाक़त मुलाहिज़ा हो आप फ़रमाते हैं कि "आयत ज़ेर-ए-बह्स के मअनी ये हुए कि हर एक इब्न-ए-आदम नेक हो या बद जहन्नम के पास से गुज़रेगा। जिसकी बाबत हदीसों में ऊपर लफ़्ज़ आया है ना कि अंदर फिर वो अपने आमाल के मुवाफ़िक़ जहन्नम से दूर हटते जाएंगे। और ज़ालिम बदकिर्दार लोग जहन्नम में छोड़ दीए जाएंगे I" हम कहते हैं कि क्यों "हर एक इब्न-ए-आदम नेक हो या बद "जहन्नम के पास से गुज़रें, जन्नत के पास से क्यों ना गुज़रे। और फिर ज़ालिम बदकिर्दार लोग जन्नत के पास से हटते जाएं और नेक लोग जन्नत में दाख़िल होते जाएं ताकि बदकिर्दारों को और नीज़ उस शख़्स को जिसका ज़िक्र "निशानात मिर्ज़ा बजवाब इल्हामात मिर्ज़ा" में है। जन्नत का नज़ारा देखकर अपने क़ुबह अफ़आल का और ज़्यादा एहसास हो जाए कि अगर वो बदकिर्दार ना होता तो ऐसी दिलफ़रेब जगह में दाख़िल हो जाता।

शायद आपकी तफ़्सीर के बमूजब अल्लाह मियां को ये मंज़ूर है कि बदकिर्दारों को जन्नत की हवा तक ना लगनी पाए। ख्वाह नेक किरदारों को दोज़ख़ के पास से गुज़रना पड़े उस की बला से। ये आपने ख़ूब कहा कि "फिर वो अपने आमाल के मुवाफ़िक़ जहन्नम से दूर हटते जाएंगे।” आमाल का यहां क्या दख़ल है। क्या आप इस क़दर जल्द भूल गए कि आमाल हरगिज़ मूजिब नजात नहीं। ” जब "आमाल हरगिज़ मूजिब नजात नहीं हैं" तो फिर वो अपने आमाल के मुवाफ़िक़ किस तरह जहन्नम से हटते जा सकेंगे? हालाँकि ये जुम्ला कि "फिर वो अपने आमाल के मुवाफ़िक़ जहन्नम से दूर हटते जाएंगे" आयत ज़ेर-ए-बह्स के किसी लफ़्ज़ का तर्जुमा नहीं है। बल्कि ये एक वहाबी के फ़र्सूदा दिमाग़ का इख़्तिरा है जो बज़अमे ख़ुद अल्लाह मियां की इस्लाह कर रहा है। मौलवी साहब आपका मुक़ाबला उस शख़्स से पड़ा है जो आपकी आख़िरी उम्र तक आपको क़ुरआन पढ़ा सकता है। ये सिर्फ़ तअल्ली के तौर पर नहीं कहता बल्कि मैं इस को बारहा साबित भी कर चुका हूँ। इस लिए इस किस्म के मन-माअनी तर्जुमों से आप कामयाब नहीं हो सकते। अगर आपका कामयाब होना चाहते हैं तो मैं इस की सूरत आपको बतलाता हूँ। वोह ये है कि आख़िर तो आप अहले हदीस हैं जहां हदीसों के रू से सदहा आयतों को मंसूख़ मानते हैं वहां इस आयत को भी इनमें इज़ाफ़ा करके उस को भी मंसूख़ कह दें यानी यह कि अल्लाह ने अपने क़ौल से रुजू किया है और अपना पीछा छुड़ाइए।

आपने ये भी ग़लत लिखा कि "जिसकी बाबत हदीसों में ऊपर का लफ़्ज़ आया है ना कि अंदर" मैंने आयत ज़ेर-ए-बह्स की तफ़्सीर के लिए अपने रिसाला में एक हदीस नक़्ल की है जिसमें यही लफ़्ज़ वरिदु (وَارِدُ)। बह-मअनाए दख़ूल वारिद हुआ है। जिसके जवाब में आप माही बे आब की तरह तड़प रहे हैं। लेकिन बनता कुछ नहीं हाँ एक ज़िमन में आपने ये लिखा कि "क़ुरआन-ए-मजीद और हदीस शरीफ़ की तशरीह तो हमने बशहादत-ए-क़ुरआन आपको बता दी" हमने भी आपकी इस तशरीह की वह तशरीह की जिसकी धज्जियाँ क़ियामत तक आपकी आँखों के सामने उड़ती फिरेंगी।

नाज़रीन जिस हदीस को हम ने बतौर तफ़्सीर नक़्ल किया है इस में एक ऐसा लफ़्ज़ वारिद है जो मौलवी साहब की तमाम उम्मीदों पर पानी फेर देता है। वो लफ़्ज़ यसदून (یصدون) है जिसके मअनी निकलने के हैं। और लफ़्ज़ "वरूद" का ज़द है। चुनांचे अल-मिस्बाह-उल-मुनीर में जो निहायत मोअतबर लुग़त की किताब है लिखा है कि :—

فاالورد خلاف الصدود۔ و الایرااوخلاف الاصدار

(फ़स्ल अलवाद-मअ-अलराअ)

यानी वरूद (ورود) सददर (صدور) और एरादो असदार (ايرادر أصدار) एक दूसरे के ज़िद हैं। पस हदीस ज़ेर-ए-बह्स में चूँकि सदूर के मअनी निकलने के हैं। लिहाज़ा वरूद के मअनी दाख़िल होने के हैं। आप तो निरे वहाबी हैं जिनके नज़्दीक बजुज़ क़ुरआन व हदीस के बाक़ी उलूम का पढ़ना बिद्दत है। आपके ठोकर पर ठोकर खाने का यही सबब है। वर्ना अगर आप कम-अज़-कम लुगात की तरफ़ रुजू करते तो आपको इस क़दर ख़जालत नसीब ना होती। सिर्फ यही नहीं बल्कि हदीस माफ़ौक़ में हर एक निकलने वाले की कैफ़ीयत बतलाई गई है कि बाअज़ तो बिजली की चमक की तरह और बाअज़ घोड़े की दौड़ की तरह और बाअज़ सवार की तरह और बाअज़ इन्सान की दौड़ की तरह और बाअज़ पियादा चलने की तरह दोज़ख़ से निकलेंगे। पस अगर वरूद के मअनी यहां "पास से गुज़रने के होते तो निकलने और फिर इस तरह निकलने के क्या मअनी?

ख़ैर इन तमाम बातों को जाने दीजिए। अगर हम आपको एक से ज़्यादा हदीसें ऐसी बतला दें जिनमें साफ़ तौर पर वरूद के मअनी दख़ूल के हों तब तो हमें यक़ीन कर लेना चाहिए कि आप फ़ील-फ़ौर इस्लाम छोड़कर मसीहीय्यत के दायरे में दाख़िल होंगे। नाज़रीन हदीस जे़ल को ग़ौर से पढ़ें :—

अहादीस की शहादत कि वारिद के मअनी दाख़िल के हैं

  1. ان عبداللہ بن رواحتہ قال خبر اللہ عن الورود ولمہ یخبر بالصد ورنقال علیہ السلام یا ابن رواحتہ اقراما بعد ہاثم ننجی الذین اتقو
    (तफ़्सीर कबीर जिल्द पंजुम सफ़ा 556 मत्बूआ मिस्र)
    तर्जुमा: अब्दुल्लाह बिन रवाहा ने आँहज़रत सलअम से कहा कि ख़ुदा ने दोज़ख़ में दाख़िल होने की ख़बर तो दी लेकिन इस से निकलने की ख़बर ना दी आँहज़रत ने कहा कि ए रवाहा के बेटे उस के बाद का जुम्ला पढ़ो कि सुम्मा ननजी अल-लज़ीन उत्तकवा।
    (ثم ننجی الذین اتقوا۔)
  2. ام مبشرہ لایدخل النانشاء اللہ من اصحاب الشجرہ احد الذین بالیعوا تحتھا فقالت حفصتہ بلی یار سول اللہ فانتھر ھافقالت حصفتہ وان منکم الاوارد فقال النبی صلی اللہ وسلم فقد قال اللہ تعالیٰ ثم ننجی الذین اتقوا ونذر الظالمین فیھا جثیا
    (मशारिक़ अल-अनवार हदीस नंबर 638)
    तर्जुमा: "किताब मुस्लिम में उम्म मुबश्शिर से रिवायत है कि हज़रत ने फ़रमाया कि अगर ख़ुदा ने चाहा तो ना होगा दाख़िल दोज़ख़ में दरख़्त वाले अस्हाब से कोई जिन्होंने उसके नीचे बैअत की तो हज़रत हफ़्सा ने कहा क्यों ना दाख़िल होंगे या रसूल-अल्लाह सो हज़रत ने उनको झिड़का। फिर हज़रत हफ़्सा ने कहा कि ख़ुदा क़ुरआन में फ़रमाता है कि "तुम में से हर एक दोज़ख़ में दाख़िल होगा।” आँहज़रत ने फ़रमाया कि ख़ुदा इस से आगे फ़रमाता है कि "फिर हम बचाएँगे परहेज़गारों को और बद्किर्दारों को घुटनों के बल इस में पड़े रहने देंगे।

कहो मौलवी साहब ! अब भी कुछ उज़्र बाक़ी है ? हक़ीक़त ये है कि आप सिर्फ नाम के अहले हदीस हैं। आपको अहादीस पर उबूर हासिल नहीं। वर्ना कभी ये तअल्ली ना करते कि जिसकी बाबत हदीसों में ऊपर का लफ़्ज़ आया है ना कि अंदर। अगर आप ये नामाक़ूल उज़्र करें जैसी आपकी आदत है कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा और हज़रत हफ़्सा ने वरूद के मअनी दख़ूल के किए हैं ना कि आँहज़रत ने तो हम ये कहते हैं कि अगर हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा और हज़रत हफ़्सा ने वरूद के मअनी ग़लत बतलाए तो आँहज़रत पर फ़र्ज़ था कि इन को बतलाते कि तुमने ग़लत माने किए हैं। इस के मअनी दख़ूल के नहीं हैं बल्कि "पास से गुज़रने के हैं।” लेकिन आँहज़रत का ख़ामोश रहना साफ़ बतला रहा है कि आयत ज़ेर-ए-बह्स में वारिद के मअनी दाख़िल होने के हैं ना कुछ और I

ये लीजिए हम आपको एक और ऐसी हदीस बतला देते हैं जिसमें ख़ुद आँहज़रत ने वरूद (وَارِدُ) के मअनी दख़ूल के बतलाएं हैं।

وعن جابر انہ سل عن ھذا الایتہ فقال سمعت رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم یقول الورود الدخول لایبقی برولا فاجرا وخلھا فتکون علےٰ المومنین برداً اوسلاماً حتی ان الناس صنجيجا  من بودھا

(तफ़्सीर कबीर जिल्द पंजुम सफ़ा 556 मत्बूआ मिस्र)

तर्जुमा: हज़रत जाबिर बयान करते हैं कि किसी ने इस (आयत ज़ेर-ए-बह्स) के मुताल्लिक़ उन से सवाल किया तो हज़रत जाबिर ने कहा कि मैंने आँहज़रत को ये कहते हुए सुना है कि वरूद (وَارِدُ) के मअनी दख़ूल के हैं और कोई ऐसा नेक और बदकिर्दार शख़्स बाक़ी ना रहेगा जो दोज़ख़ में दाख़िल ना हो। लेकिन नेक किरदारों पर वो ठंडा और बे ज़ररिबन जाएगा। यहां तक कि उस की सर्दी से लोग चिल्ला उठेंगे।

लो अब तो फ़ैसला हो गया कि आयत ज़ेर-ए-बह्स में वारिद (وَارِدُ) के मअनी दाख़िल के हैं।
अब आप ही इन्साफ़ से कह दें कि आपके इस मनक़ूला शेअर का कि :—

गदाईयाँ राज़ाएं मअनी ख़बर नीस्त   कि सुल्ताँ जहां बामासत इमरोज़

मिस्दाक़ कौन है। हम या आप ?

पस साबित हो गया कि आयत ज़ेर-ए-बह्स में वारिद (وَارِدُ) के मअनी दाख़िल के हैं। क्योंकि ख़ुद क़ुरआन शरीफ़ की शहादत "अशआर अरब की "शहादत" और अहादीस की "शहादत" हमारे हक़ में है ना कि आपके हक़ में।

मौलवी साहब ! मैं फिर कहता हूँ कि आप बेचारे क्या अगर तमाम मुसलमान इकट्ठे हों और आप जैसे करोड़ों शेर क़ालीन उनकी मदद में हों तब भी वोह इस्लाम में नजात साबित नहीं कर सकेंगे I

फ़स्ल चहारुम

लफ़्ज़ वारिद (وَارِدُ) का फ़ैसला और दोज़ख़ का भर जाना

ख़ुदा के फ़ज़्ल व करम से आयत नंबर अव्वल के लफ़्ज़ वारिद (وَارِدُ) की तशरीह व तोज़िह से हम फ़ारिग़ हो गए यानी ख़ुद क़ुरआन शरीफ़ की दीगर आयात के रू से और अशआर अरब के रू से और बिल-तख्सीस ख़ुद आँहज़रत सलअम की ज़बानी हमने निहायत वाज़ेह तौर पर साबित कर दिया (وان منکم الاوارد دھا) में वारिद (وارد) के मअनी दाख़िल होने के हैं।

और हज़रत जाबिर की हदीस ने तो बेचारे मौलवी सना-उल्लाह साहिब की तमाम उम्मीदों पर पानी फेर कर उसका फ़ैसला ही कर दिया कि वारिद के मअनी ना सिर्फ दाख़िल होने के हैं बल्कि हर एक मुसलमान का ख़्वाह नेक हो या बद दोज़ख़ में दाख़िल होना ज़रूरी अम्र है। दोज़ख़ ख़्वाह गर्म हो या सर्द ख़्वाह वो अपने हमराह और कोट ले कर जाये या ख़स की टट्इस से बह्स नहीं। बह्स तो इस से है कि हर एक मुसलमान को इस जगह जाना है जिसका नाम दोज़ख़ है और यह साबित हो गया।

मैं लगे हाथ मौलवी साहब को एक और परु लुतफ़ हिकायत सुनाना चाहता हूँ जिसका मफ़्हूम ये है कि जब इन्सानों और जिन्नों से दोज़ख़ नहीं भरेगा तो फिर किस तरह ख़ुदा दोज़ख़ को भर देगा।

ख़ुदा का दोज़ख़ को भर देना

وعن انس عن النبی صلے اللہ وسلم قال لاتزال جہنمہ یلقی فیھا وتقول ھل من مزید حتی یضیع رب العزت فیھا قدمہ فینروی بعد صفہا الی بعض فتقول قط قط بغرتک وکرمک متفق علیہ

(मिश्कात किताब अल-फितन फ़ी ख़ल्क़ अलजन्नत व अल-नार)

तर्जुमा: हज़रत अनस से रिवायत है कि आँहज़रत सलअम ने फ़रमाया कि हमेशा आदमी दोज़ख़ में डाले जाएंगे। और वो कहता रहेगा कुछ और भी है यहां तक कि इज़्ज़त वाला परवरदिगार इस में अपना क़दम रखेगा तो वो आपस में सिमट जाएगा और कहेगा कि बस-बस तेरी इज़्ज़त और बुजु़र्गी की क़सम I” इस हदीस से ऊपर एक और हदीस भी है जो अबू हुरैरा से मर्वी है और मुत्तफ़िक़ अलैह है। इस में बजाय क़दम के ये जुम्ला है कि (حتی یصنح اللہ رجلہ) यानी "यहां तक कि ख़ुदा इस में अपना पांव रखेगा।

हम मौलवी साहब की तरह ग़लत मबह्स नहीं चाहते हैं वर्ना ये ज़रूर पूछते कि अल्लाह के पांव और क़दम कैसे ? अगर दरहक़ीक़त आप अहले हदीस हैं तो इन अहादीस की तावील या तफ़्सीर तो कर दीजीए। फिर देखिए आपको किन-किन मुसीबतों का सामना होगा।

नाज़रीन हदीस बाला को पढ़ कर ज़रूरत दर्याफ़्त करना चाहते होंगे कि अल्लाह को इस तरह दोज़ख़ भर देने की क्यों ज़रूरत लाहक़ हुई। इस की वजह आयत नंबर दोम बतलाती है जो हस्ब -ज़ैल है :—

(2) وشَاء رَبُّكَ لَجَعَلَ النَّاسَ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلاَ يَزَالُونَ مُخْتَلِفِينَ إِلاَّ مَن رَّحِمَ رَبُّكَ وَلِذَلِكَ خَلَقَهُمْ وَتَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ لأَمْلأنَّ جَهَنَّمَ مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِين

(क़ुरआन सुरह हूद आयत 12)

तर्जुमा: अगर तेरा रब चाहता तो सब लोगों को एक उम्मत बनाता, लेकिन ये हमेशा इख़्तिलाफ़ करते रहेंगे। मगर जिस पर तेरे रब का हुक्म हुआ और ख़ुदा ने इन को इसी लिए पैदा किया है ताकि तेरे रब की ये बात पूरी हो कि मैं जिन्नों और आदमियों से दोज़ख़ भर दूंगा"

(मैं क्यों मसीही हो गया सफ़ा 33)

लेकिन ख़ुदा से ये भी तो ना हो सका कि दोज़ख़ को इन्स और जिन्न से भर देता। क्योंकि हदीसों में दोज़ख़ का जो नक़्शा खींचा गया है। इससे मालूम होता है कि दोज़ख़ इस क़दर तवील व अरीज़ है कि तमाम अफ़राद-ए-इन्सानी और जिन्न क्या अगर हमारी इस ज़मीन की तरह सत्तर ज़मीनें बल्कि सत्तर हज़ार ज़मीनें भी इस में डाल दी जाएं तो इस का एक कोना भी ब-हज़ार मुश्किल भर सकेगा। इस लिए जब अल्लाह ने देखा कि दोज़ख़ तो भरता ही नहीं और मैं वाअदा कर चुका हूँ कि तुझको भर दूंगा। इस लिए अपनी बात को पूरा करने के लिए अपने पांव को दोज़ख़ में रखा ताकि इस कमबख़्त का पेट भर जाये ये है आयत नंबर दोम की सही तफ़्सीर जो मौलवी साहब की समझ में अब तक नहीं आई।

ये आयत इस क़दर साफ़ और ग़ैर मुबहम है कि अगर किसी शख़्स को ज़रा भी अरबी से वाक़फ़ीयत हो तो वो इस के मफ़्हूम के समझने में कुछ भी दिक़्क़त महसूस ना करेगा। लेकिन बेचारे मौलवी साहब समझें तो क्योंकर समझें। कुछ तो उनकी अपनी फ़ज़ीलत का ख़्याल और कुछ अपना हलवा मांडे का फ़िक्र और कुछ शेर क़ालीन कहलाने का पास। लिहाज़ा गर कुछ समझें भी तो इस को किस तरह ज़ाहिर करें। चुनांचे इन्हीं मजबूरीयों से मज्बूर हो कर बादिल-ए-नाख़्वासता जिस पर उन की इबारत शहादत दे रही है यूं इर्शाद फ़रमाते हैं :—

"इस मुश्किल की आपने नहीं बताई। इस लिए हम नहीं कह सकते हैं कि क्या मुश्किल पेश आई थी। अब हम इस आयत की तफ़्सीर कर देते हैं कि मुम्किन है कि सही तफ़्सीर ही से आपकी मुश्किल हल हो जाएगी।

इस में क्या शक है कि दुनिया में इख़्तिलाफ़ राय है ना सिर्फ दुनियावी कामों में बल्कि दुनियावी उमूर में भी। ना सिर्फ बैरूनी कामों में बल्कि ख़ानदानी उमूर में भी। इख़्तिलाफ़ का मबनी दरअसल इख़्तिलाफ़ फ़हम है जो क़ुदरती उसूल पर मबनी है। इस क़ुदरती इख़्तिलाफ़ को मल्हूज़ रखकर क़ुरआन-ए-मजीद की आयत मज़्कूर में बताया गया है कि बावजूद इन इख़्तिलाफ़ात के ख़ुदा को क़ुदरत है कि अगर चाहता तो इन सब लोगों को मुत्तहिद-अल-ख़याल बना देता (لاریب فیہ ला रेय बफीह ) उस के बाद फ़रमाया इन्सानी अफ़राद अपने ख़यालात में हमेशा मुख़्तलिफ़ रहेंगे और उन को इसी इख़्तिलाफ़ पर पैदा किया है। मगर जिन लोगों के तलाश-ए-हक़ करने की वजह से उन पर ख़ुदा की इनायत होगी वो इस इख़्तिलाफ़ से अलग रह कर सीधी राह पर चलेंगे और जो टेढ़े चलेंगे ख़ुदा उन से जहन्नम को भरेगा।

ये है इस आयत की सही तफ़्सीर" (अहले हदीस 2 नवम्बर 1928 ई सफ़ा 3)

शेर क़ालीन की गुरेज़

क़सीदों में गुरेज़ एक सनअत ख़ूबी समझी जाती है और इस की वजह से क़सीदे का हुस्न दो-बाला हो जाता है। इसी तरह मुबाहिसों में अगर गुरेज़ सदाक़त व दयानत के नाम पर इख़्तियार की जाये और इस में रूबाबाज़ी और पर्दादारी का मुतलक़ दख़ल ना हो तो निहायत मुस्तहसिन समझी जाती है वर्ना निहायत मज़मूम और बददियानती समझी जाएगी। जो लोग सदाक़त शआरो अस्त गुफ़तार होते हैं वो अलल-ऐलान अपनी शिकस्त का इज़्हार करते हैं ना ख़ुद को धोका देते हैं और ना दूसरों को धोके में डालना चाहते हैं लेकिन शेर पंजाब को अपनी हट धर्मी और इज़्ज़त का इस क़दर पास है कि मजाल किया कि सर-ए-मोट्स से मस हो जाए I चुनांचे किस भोलेपन से आप हमसे सवाल करते हैं कि "इस मुश्किल की वजह आपने नहीं बताई। इस लिए हम नहीं कह सकते कि क्या मुश्किल पेश आई थी।” आपकी समझ में कौनसी बात आई जो ये आती।

लीजिए हम अपने फ़र्ज़ से सकबदोश होते हैं और इस मुश्किल की वजह हम आप ही की ज़बानी आप को सुनाते हैं जिसको ख़ुदाए बरतर ने आप ही की क़लम से इस तरह लिखवाया कि ख़ुद आपको भी इस की ख़बर ना हुई वो ये है कि :—

आयत नंबर 2 की मुश्किलात :—

(1) इन्सानी अफ़राद अपने ख़यालात में हमेशा मुख़्तलिफ़ रहेंगे। उनको इसी इख़्तिलाफ़ पर पैदा किया है।” जब ख़ुदा ने इन्सान को इसी इख़्तिलाफ़ पर पैदा किया है जो शान ख़ुदावंद के सरासर मुनाफ़ी है और वो आपस में "हमेशा मुख़्तलिफ़ भी रहेंगे" और फिर इसी इख़्तिलाफ़ को जिस पर ख़ुद ख़ुदा ने इन्सान को "पैदा किया" है दोज़ख़ में जाने का सबब ठहरना कहाँ का अदल और इन्साफ़ है?

आपका ये कहना कि "मगर जिन लोगों के तलाश हक़ करने की वजह से उन पर ख़ुदा की नज़र इनायत होगी वो इस इख़्तिलाफ़ से अलग रह कर सीधे राह पर चलेंगे" बिल्कुल लगू है क्योंकि अगर "ख़ुदा की नज़र इनायत" होती तो "अफ़राद इन्सानी" को इस "इख़्तिलाफ़" पर पैदा ही क्यों करता। नीज़ आप ख़ुद लिख चुके हैं कि "इन्सानी अफ़राद अपने ख़यालात में हमेशा मुख़्तलिफ़ रहेंगे।" तो "इख़्तिलाफ़" से किस तरह "अलग" रह सकेंगे? दीगर ये कि इन्सान जिस अम्र पर फित्रतन पैदा होता है वो इस अम्र से कामिल तौर पर हरगिज़ "अलग" नहीं हो सकता है अगर इस पर भी आप "शहादत" चाहते हैं तो हदीस जे़ल मुलाहिज़ा फ़रमाईये :—

وعن ابی الدورد قال رہینما نحن عند رسول اللہ صلے ا للہ علیہ وسلم نتدا اکرما یکون افرقال رسول اللہ صلے اللہ علیہ وسلیم اذا سمعتم بجبل زال عن مکانہ فصد قوہ راز سمعتم برجل تغیر من خلقہ فلا تصد توا بدنانہ یصیرالی ماجبل علیہ رازہ احمد

(मिश्कात किताब अल-ईमान फ़ी अलसदर)

तर्जुमा: अबी दर्दा बयान करते हैं कि हम आँहज़रत सलअम के पास बैठे हुए आइन्दा होने वाली बातों के मुताल्लिक़ गुफ़्तगु करते थे कि आँहज़रत सलअम ने फ़रमाया कि जब तुम ये सुनो कि फ़ुलां पहाड़ अपनी जगह से टल गया तो तुम उस को सच्च मानो और जब तुम ये सुनो कि फ़ुलां शख़्स के अख़्लाक़ बदल गए तो तुम उस को सच्च मत मानो। क्योंकि जो शख़्स जिस बात पर पैदा किया गया है उसी पर क़ायम हो जाता है।

अल्लामा अली क़ारी मिश्कात की शरह मिर्क़ात में इस जुम्ला की शरह में यसीराली माहील अलैहि (یصیرالی ماحیل علیہ) तहरीर फ़रमाते हैं कि :—

علے ماقدر وسبق حتی العجز والکیس فاذ اسمعتم بان الکیس صار بلیدً اوبابلعکس فکا نضد تولہ ضرب زوال الجبل مثلاً تقریب فان ھذا ممکن وزوال الخلق المقدر عماکان فی القدر وغیرہ ممکن۔

यानी हर एक इन्सान इसी बात पर क़ायम हो जाता है जो उस की तक़्दीर में पेशतर लिखी जा चुकी है। हत्ता कि बुज़दिली और अक़्लमंदी वग़ैरा भी तक़्दीर से हैं। जब तुम ये सुनो कि एक अक़्लमंद शख़्स जाहिल या कुंद ज़हन बन गया या कुंदा-ज़हन शख़्स अक़्लमंद बन गया तो इस को सच्च मत मानो। आँहज़रत ने जो पहाड़ टलने की मिसाल दी है ये एक तक़रीबी मिसाल है। जो मुम्किन है लेकिन इस ख़ल्क़ का ज़वाल जो पहले मुक़र्रर हो चुका है मुहाल है"

लिहाज़ा "इन्सानी अफ़राद" को "इख़्तिलाफ़ पर पैदा करने और "इख़्तिलाफ़" भी ऐसा "जो हमेशा रहता हो और फिर "उसी इख़्तिलाफ़" को जहन्नम में झोंक देने का सबब गर्दानने की तावील बजुज़ इस के और क्या हो सकती है कि ख़ुदा की नीयत इन्सानों के मुताल्लिक़ बख़ैर नहीं है।

फ़स्ल पंजुम

मौलवी सना-उल्लाह साहिब का आमालनामा

वो नहीं चाहता कि कोई इन्सान भी दोज़ख़ से बाहर रहे इस लिए फ़रमाया कि :—

لَاَمْلَــــَٔنَّ جَہَنَّمَ مِنَ الْجِنَّۃِ وَالنَّاسِ اَجْمَعِيْنَ

(2) ज़रा सोच तो लीजिए कि ये जुम्ला किस क़दर यास अंगेज़ और हौसला शिकन है। क्या मैं पूछ सकता हूँ कि ख़ुदा को किस अम्र ने इस बात पर मज्बूर किया कि वो अपनी इस बात को पूरा करे कि मैं जिन्नों और इन्सानों को दोज़ख़ से भर दूंगा और फिर इस बात के पूरा करने के लिए इख़्तिलाफ़ पैदा करे और इस इख़्तिलाफ़ के बहाने से अफ़राद इन्सानी को जहन्नम में झोंक दे क्या ख़ुदा के "फ़ज़्ल" और "रहम" के यही मअनी हैं? जिसका राग आप अलापते रहते हैं। अगर आप बवजह पीराना-साली या वहाबी होने के सिर्फ व नहु भूल चुके हैं तो अमृतसर के किसी हनफ़ी मदरिसा में किसी अदना दर्जा के तालिब-इल्म से जाकर पूछ लीजिए कि लामलन (لاملئن) में लाम (لام) और नून (نون) के क्या मअनी हैं और नीज़ ये पूछिए कि "नास" (ناس) जमाअ है या वाहिद और फिर ये पूछ लीजिए कि नास (ناس) पर अलिफ़ लाम (الف لام) के क्या मअनी हैं और यह पूछ लिजिए कि अजमईन (اجمعین) किस लिए आया है तो वो तालिब-इल्म आपको बतला देगा कि लामलइन (لاملئن) में लाम (لام) ताकीद या नून (نون) ताकीद है। जिसके मअनी ये हैं कि "ज़रूर ब-सद ज़रूर में भर दूंगा।” और नास (ناس) के मुताल्लिक़ ये बतला देगा कि ये जमा है यानी तमाम अफ़राद इन्सानी और अलिफ़ लाम (الف لام) के मुताल्लिक़ ये बतला देगा कि अलिफ़ लाम (الف لام) इस्तिग़राक़ (استغراق) है जो तमाम अफ़राद इन्सानी पर हावी है जिसके मअनी। ये हैं कि "तमाम अफ़राद इन्सानी" अजमईन (اجمعین) की बाबत ये बतला देगा कि ये ताकीद माअनवी है यानी "सब के सब। ”

पस इस आयत का सही तर्जुमा ये है कि "मैं ज़रूर ब-सद ज़रूर सब के सब तमाम अफ़राद इन्सानी से दोज़ख़ को भर दूंगा। ” अब एक सवाल और आपसे करके इस हिस्से को ख़त्म करता हूँ वो ये कि आख़िर आप भी तो अफ़राद इन्सानी में शामिल हैं। आप किधर जाना चाहते हैं दोज़ख़ की तरफ़ या जन्नत की तरफ़ हमारी तो यही दुआ है कि आप भी हमारे साथ जन्नत में हों।

ज़र्रा ज़र्रा का हिसाब किताब

मैंने   فَمَنْ يَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّۃٍ خَيْرًا يَّرَہٗ وَمَنْ يَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّۃٍ شَرًّا يَّرَہٗ   फ़मययअमल मिस्क़ाल ज़र्रतिन खैरय्यरह व मय्यअमल मिस्क़ाला ज़र्रतिन शर्रयरह (मैं क्यों मसीही हो गया सफ़ा 25) की बिना पर ये दावा किया था कि इस किस्म की आयात को पढ़ कर जो बादी उल-नज़र में मर्ग़ूब और तसल्ली बख़्श मालूम होती हैं। मेरे दिल में ये सवाल पैदा हुआ कि क्या ये मुम्किन है कि हमसे नेकी ही नेकी सरज़द हो जाएगी और किसी किस्म की बदी से हम सरज़द ना हो? क्या इन्सान में ऐसी ताक़त है? (मैं क्यों मसीही हो गया सफ़ा 25,26) सिलसिला कलाम को जारी रखते हुए मैंने अपने रिसाला के पाँच सफ़्हों में मुसलसल अक़्ली और नक़्ली दलाईल से इस पर बह्स करके साबित कर दिया कि बजुज़ हज़रत ईसा के और कोई इन्सान अपने आपको ना तो गुनाहों से बचा सका है और ना बचा सकता है। चुनांचे मौलवी साहब ने हमारे इन तमाम दलाईल को तस्लीम करके अपनी ख़ामोशी और सुकूत से ये ज़ाहिर कर दिया कि दरहक़ीक़त इन्सान का बेगुनाह रहना एक अम्र मुहाल है मगर मौलवी साहिब ने ये ग़ज़ब किया कि जिस आयत की बिना पर मैंने ये दावा किया था आपने इस आयत को दर खुर अअतना ना समझा और सिर्फ हमारे दावा को दलाईल से अलैहदा करके इख़्तिसार के साथ यूं रक़म फ़रमाया कि :—

"मेरे दिल में ये सवाल पैदा हुआ कि ये मुम्किन है कि हमसे नेकी ही सरज़द होती जाये और किसी किस्म की बदी हमसे सरज़द ना हो ? क्या इन्सान में ऐसी मफ़ाक़त है" सफ़ा 26 (अहले हदीस 12 अक्तूबर 1928 ई. सफ़ा 3 कालम 3)

अब आपका जवाब मुलाहिज़ा हो आप फ़रमाते हैं कि :—

"बस ये है मंशा ग़लती और मज़ल्लत अलअक़दाम जहां से पादरी साहिब को लग़्ज़िश हुई। आपने समझा कि क़ुरआन शरीफ़ में जो बार बार आमाल सालेहा की ताकीद आई है। इस से मुराद ये है कि इन्सान के आमालनामे में नेकी ही नेकी हो बदी का नामोनिशान ना हो। अगर हम क़ुरआन शरीफ़ ही से इस अक़्दह को हल कर दें तो ग़ालिबन हमारे भाई की ग़लती रफ़ा हो सकती है क़ुरआन मजीद के उतारने वाले आलिमुल-गै़ब को इल्म था कि आमाल सालेहा की ताकीद पर ये सवाल पैदा होगा। इस लिए उसने पहले ही से इस का जवाब क़ुरआन में दे रखा है जो ग़ालिबन पादरी साहिब की नज़र से ओझल रहा I लिहाज़ा वो ग़ौर से सुनें इर्शाद है:—

اَمَّا مَنْ ثَــقُلَتْ مَوَازِيْنُہٗ فَهُوَ فِيْ عِيْشَةٍ رَّاضِيَةٍ

जिस शख़्स के आमाल में अक्सरीयत अच्छी होगी वो नजात पा जाएगा।

इस इर्शाद ईलाही ने पादरी साहिब के अक़्दह को हल कर दिया। ला अलहम्द। (अहले-हदीस 12 अक्तूबर 1928 ई. सफ़ा 2, 3)

"आपने ये ग़लत समझा कि मैंने समझा कि क़ुरआन शरीफ़ में जो बार बार आमाल सालेहा की ताकीद आई है इस से ये मुराद है कि इन्सान के आमालनामा में नेकी ही नेकी हो बदी का नामोनिशान ना हो।” मैंने जो कुछ समझा आयत बाला से समझा जिसको आपने किसी मस्लिहत से नक़्ल नहीं किया। ये आयत इस क़दर वाज़ेह है कि जिसकी तौज़ीह की ज़रूरत ही नहीं। जब ज़र्रा ज़र्रा नेकी की जज़ा और ज़र्रा बदी की सज़ा मिलेगी तो ख़्वाह नख़्वाह इस का नतीजा यही निकल आता है कि जब तक इन्सान नेकी ही नेकी ना करे। इस वक़्त तक मुम्किन नहीं कि वो नजात हासिल कर सके। क्योंकि अगर उस के आमाल-नामा में ज़र्रा भर भी बदी हो तो अगर ख़ुदा अपने क़ौल में सच्चा है तो ज़रूर वो बदकार शख़्स इस ज़र्रा भर बदी की सज़ा भुगतेगा।” पस मैंने "समझा" नहीं बल्कि ये क़ुरआन शरीफ़ का ऐसा नातिक़ फ़तवा है। जिसके सामने बाक़ी फ़तवे बातिल हैं। पस मैंने नहीं "समझा" बल्कि ख़ुद क़ुरआन शरीफ़ ने समझाया। आपका मुंदरजा बाला आयत को पेश करना "इमामन सक़लत" (اَمَّا مَنْ ثَــقُلَتْ) आपकी क़ुरआन फ़हमी का बैन सबूत है।

फ़स्ल शश्म

मौलवी सना-उल्लाह साहिब अब क्या करेंगे

ख़ैर जब मौलवी साहब से आयत महुला-बाला का जवाब ना बन सका तो आपने बमिस्दाक़ डूबते को तिनके का सहारा। इस आयत को पेश किया कि :—

اَمَّا مَنْ ثَــقُلَتْ مَوَازِيْنُہٗ فَهُوَ فِيْ عِيْشَةٍ رَّاضِيَةٍ

बेचारे को इतना भी ख़्याल नहीं रहा कि इस आयत में और आयत महुला बाला में खुला इख़्तिलाफ़ है यानी आयत महुलाबाला में साफ़ तौर पर ये ऐलान है कि जो शख़्स ज़र्रा भर भी नेकी या बदी करेगा वो उसकी जज़ा या सज़ा को भुगतेगा। और اَمَّا مَنْ ثَــقُلَتْ مَوَازِيْنُہ   में ये ऐलान है कि नहीं ज़र्रा ज़र्रा का हिसाब ग़लत है बल्कि "जिसके आमाल में अक्सरीयत अच्छी होगी वो नजात पा जाएगा" इस मसअले को अच्छी तरह समझने के लिए फ़र्ज़ कीजिए कि ज़ेद के आमालनामा में सौ नेकी हैं और दस बदी हैं। ज़ाहिर है कि जै़द के "आमाल में अक्सरीयत अच्छी" है। लिहाज़ा मौलवी साहब के इंदीया की बिना पर जै़द की दस बदियों की बाज़पुरुस ना होगी और वो सीधा जन्नत को सिधारेगा। लेकिन ये आयत وَمَنْ يَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّۃٍ  अलख ये कहती है कि मौलवी सना-उल्लाह ग़लत कहते हैं बल्कि ज़र्रा ज़र्रा का हिसाब होगा। यानी जै़द को उन दस बदकारियों का भी मवाख़ज़ा होगा। जो जै़द से सरज़द हुई हैं।

मैं पूछता हूँ कि अगर ख़ुदा को यही मंज़ूर था कि "जिसके आमाल में अक्सरीयत अच्छी" हो "वो नजात पा जायेगा" तो आयत وَمَنْ يَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّۃٍ   अलख के नाज़िल करने की क्या ज़रूरत थी? क्या ये सिर्फ़ धमकी ही धमकी है जिसमें कोई हक़ीक़त नहीं। अगर यही है तो फिर सारे क़ुरआन शरीफ़ का ख़ुदा-हाफ़िज़ है।

मौलवी सना-उल्लाह साहिब की बुरहान तत्बीक़

इस आयत में एक और बड़ी क़बाहत है वो ये कि अगर मौलवी साहब ने दरोग़ मस्लिहत आमेज़ से काम नहीं लिया है तो अज़रूए क़ुरआन शरीफ़ हर एक इन्सान को कम अज़ कम वहां तक गुनाह करने की इजाज़त है। जहां तक उस के गुनाह एक डिग्री उस की नेकियों से कम हों मसलन बक़ौल मौलवी साहब अगर जै़द नमाज़ पढ़ता है और रोज़ा रखता है तो अगर वो ज़िना करे तो वो जन्नत में जाएगा। क्योंकि एक गुनाह के मुक़ाबला में दो नेकियों में "कसरत" अच्छी है इसी तरह अगर जै़द नमाज़ पढ़ता है और रोज़ा रखता है हज करता है तो अगर वो झूट बोले और चोरी करे तो वो सीधा जन्नत को सिधारेगा। क्योंकि दो गुनाह के मुक़ाबले में तीन नेकियों की "कसरत अच्छी" है। अला-हाज़-उल-क़यास अगर जै़द नमाज़ पढ़ता है रोज़ा रखता है हज करता है ज़कात देता है। अगर वो शराब पिए जुवा खेले, क़त्ल करे तो वो बिला शक सीधा जन्नत में जाएगा। क्योंकि तीन गुनाहों के मुक़ाबले में चार नेकियों में “कसरत अच्छी है।“ अगर आप मौलवी सना-उल्लाह साहिब के इंदीया के मुवाफ़िक़ अज़तरीक़ बिला-नेकियों और बदियों का मुक़ाबला करते जाएं तो वो शख़्स जिसकी नेकियों और बदियों में सौ और निनान्वें का भी फ़र्क़ हो यक़ीनन जन्नत में जाएगा।

पस हो जीयो बशारत वास्ते मौलवी सना-उल्लाह के है नाम जिनका मुख़्तलिफ़ और ज़बानों के मुख़्तलिफ़ लोगों की भी वास्ते उन के जो चलते हैं पीछे पीछे उन के साथ ख़िताब अहले-हदीस के कि जाओगे तुम बीच जन्नत के अगर हो ऊपर तुम्हारे गुनाहों के ज़्यादा एक नेकी भी। पस करो तुम गुनाहें और उड़ाओ तुम गुलछर्रे हो सकें जितने भी तुमसे। मगर साथ इस शर्त के रखियो हिसाब इस बात का कि रहे बीच आमाल तुम्हारे एक दर्जा ज़्यादा ऊपर तुम्हारे गुनाहों के।

फ़ल्सफ़ा की किताबों में बहुत से बराहीन हैं जिनमें से एक नाम "बुरहान तत्बीक़ है। मुतकल्लिमीन इस से ये इस्तिदलाल करते हैं कि दुनिया महदूद है। लेकिन मौलवी साहब ने ये इस्तिदलाल किया है कि अगर गुनाह बमुक़ाबला नेकी के महदूद हो तो इस पर मुवाख़िज़ा ना होगा। ख़्वाह कितने ही ज़्यादा क्यों ना हो। ये है इस्लाम की नजात जिस पर हमारे अहले-हदीस दोस्त को बहुत कुछ नाज़ है।

शायद इसी आयत बाला की बिना पर मौलवी सना-उल्लाह साहिब ने गुर्दासपुर की अदालत में हल्फ़ीया बयान दिया था कि "दरोग़ गो, जालसाज़, बोहतान बाँधने वाला, इफ़्तिरा बाँधने वाला, दग़ा देने वाला एक मअनी से मुत्तक़ी है। बशर्ते के तौहीद पर क़ायम हो।” हम नाज़रीन की दिलचस्पी के लिए मौलवी साहब के हल्फ़ीया बयान की नक़्ल अख़्बार बद्र क़ादियान मौरखा 16 जून 1910 ई. से जे़ल दर्ज करते हैं। ताकि नाज़रीन को इस्लाम की नजात अच्छी तरह समझ में आ जाए वो ये है :—

" नक़्ल हल्फ़ीया बयान मौलवी सना-उल्लाह साहिब अमृतसरी दर अदालत लाला आत्मा राम साहिब साबिक़ मजिस्ट्रेट दर्जा अव्वल गुर्दासपुर

नमाज़ पढ़ने वाला, ज़िना करने वाला एक किस्म का मुत्तक़ी है। क़ुरआन का कोई हुक्म तोड़ने वाला भी मुत्तक़ी हो सकता है। दरोग़ गो में अगर औसाफ़ शरईयह हैं तो वो एक मअनी में मुत्तक़ी हो सकता है (क़ुरआन हमाइल तर्जुमा नज़ीर अहमद) इस के 80 सफ़े पर जिन मुत्तक़ियों का ज़िक्र है वो ये हैं सब्र करने वाले, सच्च बोलने वाले और ख़ुदा की ताबेदारी करने वाले और अल्लाह की राह में ख़र्च करने वाले और सुबह के वक़्त बख़्शिश मांगने वाले, ये तमाम सिफ़ात इस मुत्तक़ी में होनी चाहिए जिसका ज़िक्र इस आयत में है। ये ख़ास मुत्तक़ी हैं अगर इन सिफ़तों में से कोई सिफ़त जाती रहे तो इन मअनो में मुत्तक़ी ना होगा। ये तारीफ़ क़ुरआन के ख़ास इस किस्म के मुत्तक़ियों की है, जिनका ज़िक्र इस में है। क़ुरआन की पहली आयत में जो मुत्तक़ी हैं और इस आयत में जो मुत्तक़ी हैं इन में फ़र्क़ है। एक शख़्स झूट बोल कर पहली आयत के माअनों में मुत्तक़ी हो सकता है, बशर्ते के और अहकाम का पाबंद हो। अगर हमें उस के दीगर अहकाम की पाबंदी का इल्म नहीं है तो हम उसे मुत्तक़ी से अलग नहीं कर सकते। झूट बोलना हर हालत में एक मअनी से मना है यानी गुनाह है। फ़ासिक़ एक मअनी से मुत्तक़ी हो सकता है। झूट फ़जोरी यानी गुनाह फ़ासिक़ एक मअनी से मुत्तक़ी हो सकता है, झूट फ़जोरी यानी गुनाह फ़ाजिर का माद्दा फ़जोरी काज़िब एक मअनी में क़ासिर है। एक शख़्स बुरा असल तक़्वा हासिल करके करीम शरीयत में कहला सकता है। मैं शरई हैसियत से कहूंगा एक शख़्स शरीफ़ अल-तरफ़ीन तक़्वा छोड़कर मेरे इल्म में लमीम नहीं है, शरई लिहाज़ से करीम नहीं होता, शरई अहकाम के लिहाज़ से लईम होगा, बशर्ते के इस में कुल ऐब शरई पाए जाएं। दरोग़ गो , जालसाज़ , बोहतान बाँधने वाला , इफ़्तिरा बाँधने वाला , दग़ा देने वाला एक मअनी से मुत्तक़ी है बशर्ते के ख़ुदा की तौहीद पर क़ायम हो।”

यानी जो कुछ चाहो सो करो, सिर्फ़ ला-ईलाहा-इल्लल्लाह पढ़ो तो सीधे जन्नत में जा बसोगे। यही वोह बात है जिसके मुताल्लिक़ मैंने अपने रिसाला "मैं क्यों मसीही हो गया" में लिखा था कि इस्लाम में नेक-आमाल सिर्फ़ हाथी के दिखाने के दाँत हैं और एक हदीस को बतौर सनद के नक़्ल किया था। जिसके जवाब से मौलवी साहब ऐसे क़ासिर रहे हैं कि गोया वो हदीस मेरे रिसाला बाला में है ही नहीं और वो हदीस ये है :—

وعن ابی ذر قال اتیت النبی صلی اللہ وسلم ثوب بیض دھوتائمہ ثمہ اتیتہ وقد استقیط فقال مامن عبد قال لا الہ اللہ ثمہ مات علےٰ ذالک الادخل الجنتہ قلت وان زنی وان سرق قال وان زنی وان سرق قلت وان زنی وان سرق قال وان زنی وان سرق قلت وان زنی وان سرق قال وانی زنی وان سرق علےٰ رغمہ انف ابی ذرٍ وکان ابوذر اذا حدث بھذا قال وان رغمہ انف ابی ذر متفق علیہ۔

तर्जुमा: " अबू ज़र ने कहा मैं हज़रत सलअम के पास आया आप सो रहे थे और आप पर सफ़ैद कपड़ा था। जब मैं फिर आया तो आप जागते थे। आपने फ़रमाया कि हर एक बंदा जो ला-इलाहा इल्लल्लाह कहे और उस पर मर जाये वो जन्नत में दाख़िल होगा। मैंने कहा कि अगरचे वो चोर या ज़िनाकार हो। आपने कहा अगरचे चोर या ज़ानी हो, फिर मैंने कहा कि अगरचे वो चोर या ज़ानी हो। आपने फ़रमाया अगरचे चोर या ज़ानी हो, फिर मैंने कहा अगरचे वो चोर या ज़ानी हो, आपने कहा अगरचे वो चोर या ज़ानी हो I अगरचे ये बात अबू ज़र को नागवार मालूम होती है" (मैं क्यों मसीही हो गया सफ़ा 35)

फ़स्ल हफ़्तुम

मौलवी सना-उल्लाह साहिब का ख़ातिमा

मैं इस आयत اَمَّا مَنْ ثَــقُلَتْ مَوَازِيْنُہ  अलख पर एक और पहलू से बह्स करूंगा। अव्वल ये कि अगर मौलवी साहब का इस्तिदलाल इस आयत से दरुस्त भी हो तब भी कोई इन्सान नजात नहीं पा सकता है। क्योंकि कोई इन्सान ऐसा नहीं है، जिसके आमालनामा में "अक्सरीयत अच्छी हो।” दोयम ये कि इस्लाम के रू से आमालनामा में अक्सरीयत शायाँ-ए-इल्तिफ़ात नहीं है।

अम्र अव्वल के मुताल्लिक़ क़ुरआन शरीफ़ की शहादत ये है कि :—

وَلَوْ يُؤَاخِذُ اللہُ النَّاسَ بِظُلْمِہِمْ مَّا تَرَكَ عَلَيْہَا مِنْ دَاۗبَّۃٍ

(सुरह अल-नहल आयत 63) यानी "अगर पकड़े अल्लाह लोगों को उन के ज़ुल्म पर तो ना छोड़े ज़मीन पर एक चलने वाला।”

इस आयत में दो बातें काबिल-ए-ग़ौर हैं। अव्वल लफ़्ज़ "ज़ुल्म।” दोम उसकी निस्बत, लोग समझते होंगे कि ज़ुल्म कोई मामूली बात है। लेकिन क़ुरआन शरीफ़ के मुतआला करने से मालूम होता है कि ज़ुल्म कोई मामूली बात नहीं बल्कि वो एक सख़्त गुनाह है जिसके करने वाले पर लानत भेजी गई है। कि لعنت اللہ علےٰ الظلمین  (लानतूल्लाह अला अलज़ालमीन) (सुरह अलाअराफ़ आयत 42) दूसरी काबिल-ए-ग़ौर बात ज़ुल्म की निस्बत है आयत बाला में ज़ुल्म की निस्बत तमाम अफ़राद इन्सानी के साथ दी गई है। क्योंकि अव्वल तो नास (ناس)  ख़ुद सीग़ा जमा है और फिर उस अलिफ़ लाम (الف لام)  इस्तिग़राक़ (استغراق)  के इज़ाफ़ा करने के ये मअनी हैं कि तमाम अफ़राद इन्सानी ज़ालिम हैं। इस क़दर तहलील के बाद अब आप नफ़्से आयत पर ग़ौर करें कि ख़ुदा कहता है कि "अगर पकड़े अल्लाह लोगों को उन के ज़ुल्म पर तो ना छोड़े ज़मीन पर एक चलने वाला।" यानी अगर ख़ुदा इन्सानों से उन के गुनाहों का हिसाब ले तो एक शख़्स भी ऐसा नहीं जो बच सके। जिसका साफ़ और वाज़ेह मतलब ये है कि कोई इन्सान ऐसा नहीं है जिसके आमालनामा में "अक्सरीयत अच्छी" हो क्योंकि अगर किसी के आमालनामा में "अक्सरीयत अच्छी" होती तो वो क्यों ना बचता ज़रूर बच जाता।

हमारी ताईद एक हदीस से भी होती है जिसको हम जे़ल में नक़्ल करते हैं :—

حدثنا اسحاق بن منصور قال حمدوثنا روح بن عبادة قال حدثنا حاتمہ بن صغیرة قال حدثنا عبداللہ بن ابی ملکئتہ قال حدنفی القاعم بن محمد حد ثنی عائشتہ عن رسول اللہ صلے وسلم قال لیس احد یجا سب یوم القیمتہ الااھنک نقلت یار سول اللہ الیس قد قال اللہ فاما من اوتی کتابتہ بیمینہ فسوف یحاسب حساب یسیرا فقال رسول اللہ انما ذالک العرض و لیس احدمنا ینا قش الحساب یوم القیمتہ الاعذب

(सही बुख़ारी जिल्द दोम सफ़ा 968)

तर्जुमा: हज़रत आईशा से रिवायत है कि आँहज़रत सलअम ने फ़रमाया कि कोई शख़्स ऐसा नहीं जिससे क़ियामत के दिन हिसाब लिया जाये और वह हलाक ना हो। हज़रत आईशा ने कहा कि या रसूल अल्लाह क्या ख़ुदा ने क़ुरआन में ये नहीं फ़रमाया कि जिस शख़्स का आमाल-नामा उस के दहने हाथ में दिया जाएगा उस से आसानी के साथ हिसाब लिया जाएगा। आँहज़रत सलअम ने जवाब दिया कि ये सिर्फ़ पेश करना है। हम में से कोई ऐसा शख़्स नहीं है कि क़ियामत के दिन हिसाब में चोन व चरा करे और वो अज़ाब में मुब्तला ना किया जाये" ये और बात है कि ख़ुदा मुवाख़िज़ा करे या ना करे हमें इस से कुछ सरोकार नहीं। हमारा मतलब सिर्फ ये है कि किसी इन्सान के आमाल-नामा में "अक्सरीयत अच्छी" नहीं है। चुनांचे यही साबित हुआ।

बाक़ी रहा अम्र दोम। यानी ये कि इस्लाम के रू से आमालनामा में नेकी की "अक्सरीयत" शायाँ-ए- इल्तिफ़ात नहीं है। इन अहादीस से साबित है जिनको में अपने रिसाला "मैं क्यों मसीही हो गया" में नक़्ल किया है। जिनको मौलवी साहब ने छुवा तक नहीं। नाज़रीन से इल्तिमास है कि वो रिसाला मज़्कूर बाला के सफ़ा 27 तक मुलाहिज़ा फ़रमाएं। ये वो अहादीस हैं जिनके जवाब से अब तक मौलवी साहब सबकदोश ना हो सके और ना ताब क़ियामत सबकदोश हो सकेंगे।

आप आगे चल कर अरक़ाम फ़रमाते हैं कि :—

"पादरी साहिब ने एक हदीस नक़्ल की है जिसमें ज़िक्र है कि हज़रत आदम जो भूले तो उनकी सारी औलाद भूलने लगी इस हदीस से आपने नतीजा निकाला है कि :—

इस हदीस से इस बात का फ़ैसला होगा कि दरहक़ीक़त कुल बनी-आदम गुनहगार हैं। क्योंकि गुनाह ने सब में नफ़ुज़ किया" (सफ़ा 28)

हैरानी है पादरी साहिब किस कोशिश में हैं और इस कोशिश में कहाँ तक कामयाब हैं। हदीस में निस्यान (نسیان) का लफ़्ज़ है जिसका मतलब है कि इन्सान में फ़ित्रतन निस्यान (भूलना) दाख़िल है। अदम निस्यान ख़ुदा का ख़ास्सा है। चुनांचे क़ुरआन में इशारा है مَا كَانَ رَبُّكَ نَسِـيًّا  (माकान रब्बुका नसिया) तुम्हारा परवरदिगार नहीं भूलता" (अहले हदीस 12 अक्तूबर 1928 ई. सफ़ा 3 कालम 2)

मौलवी सना-उल्लाह साहिब की दियानतदारी

आप लिखते हैं कि "पादरी साहिब ने एक हदीस नक़्ल की है "वो हदीस कहाँ है शायद मौलवी साहब के पेट में ! अगर आप दरहक़ीक़त शेर क़ालीन नहीं तो आपने इस हदीस को बजिन्सा नक़्ल क्यों नहीं किया आपकी दियानतदारी का ये एक अदना नमूना है कि बंदगान-ए-ख़ुदा को धोके में डाल कर उन को ये यक़ीन दिला रहें हैं कि "पादरी साहिब ने एक हदीस नक़्ल की है कि आदम जो भूले उन की सारी औलाद भूलने लगी।” हालाँकि जिस हदीस को मैंने नक़्ल किया है ना तो इस की अरबी में लफ़्ज़ "भूलना" है और ना ही इस के तर्जुमा में जिस हदीस को हमने नक़्ल किया है इस में तीन लफ़्ज़ काबिल-ए-ग़ौर आए हैं यानी (1) حجد  हजद (2) نسی  नसी (3) خطاء   ख़ता। मौलवी साहब ने इन तीनों लफ़्ज़ों में से सिर्फ लफ़्ज़ نسی  "नसी" को ले लिया है और इस का ग़लत तर्जुमा करके अपने हम ख़यालों को ये यक़ीन दिलाया है कि बस पादरी सुल्तान मुहम्मद का जवाब हो चुका। हालाँकि लफ़्ज़ نسی  नसी के मअनी भूलने के नहीं बल्कि तर्क करने के हैं। अच्छा इस लफ़्ज़ को जाने दो आपका तर्जुमा ही सही लेकिन लफ़्ज़ حجد  हजद के मुताल्लिक़ जिस क़ी माअनी इन्कार और लफ़्ज़ ख़ता के मुताल्लिक़ जिसके मअनी गुनाह के हैं आपका क्या इर्शाद है? कुछ भी नहीं सरासर ख़ामोशी। आपकी कमज़ोरी का एक बय्यन सबूत यही है कि आपने इस हदीस को नक़्ल ही नहीं किया। क्योंकि असल में ऐसे अल्फ़ाज़ हैं जिनकी तावील आप कर ही नहीं सकते। लीजिए मैं फिर उस हदीस को जे़ल में लिखता हूँ ताकि आपकी दियानतदारी की हक़ीक़त सब पर ज़ाहिर हो जाए। वो हदीस ये है :—

وعن ابی ھریرہ قال قال رسول اللہ لما خلق اللہ ادم مسح ظہرہ فسقط عن ظھر وکل نسمتہ ھو خالقھا من ذریتہ الی یوم القیمتہ وجعل بین عینی کل انسان منہم وبیصا من نورثم عرضھم علےٰ ادم قال ای رب من ھولاقال ذریتک فرایٰ رجلا منھمہ فاعجبتہ ویعص مابین عینیتہ قال ای رب من ھذا قال داؤد فقال اے رب کم جم جعلت عمرہ قال متین سنتہ قال رب ردہ من عمریٰ ربعین سنتہ قال رسول اللہ صلی وسلم انقفی عمرادم الاربعین جاء ملک الموت فقال ادم اوبصرین مت عمری اربعون سنتہ قال اولمہ تطھا ابنک داؤد فجتہ ادم فجدت ذریتہ ونسی نادم فاکل من الشجرتہ فنیست ذریتہ وخطاء آدمہ و خطات ذریتہ رواہ الترمذی ومشکوات باب الایمان ۔ لقد۔

तर्जुमा: अबू हुरैरा कहते हैं कि आँहज़रत सलअम ने फ़रमाया जब ख़ुदा ने आदम को ख़ल्क़ क्या उस की पुश्त को छू लिया। पस आदम की पुश्त से इस की औलाद की जानें जिनको वो क़ियामत तक पैदा करने वाला है टपकने लगीं और हर एक इन्सान की दो आँखों के बीच में अपने नूर की रोशनी रखी। इस के बाद उन को आदम के सामने पेश किया आदम ने कहा ऐ रब ये लोग कौन हैं ? ख़ुदा ने कहा ये तेरी औलाद हैं। पस आदम ने उनमें एक ऐसे शख़्स को देखा जिसकी दो आँखों के बीच की रोशनी आदम को पसंद आई आदम ने कहा ऐ रब ये शख़्स कौन है ? ख़ुदा ने कहा दाऊद है। आदम ने कहा ऐ रब इस की उम्र को आपने क्या मुक़र्रर किया है। ख़ुदा ने कहा साठ साल आदम ने कहा ख़ुदावंद मेरी उम्र चालीस बरस उस की उम्र में ज़्यादा फ़रमाईए। आँहज़रत सलअम ने फ़रमाया कि जब आदम की उम्र ख़त्म होने को आई बजुज़ इस चालीस के (जो दाऊद को दीए थे। सुल्तान) मलक-उल-मौत आदम के पास हाज़िर हुआ पस आदम ने कहा कि क्या मेरी उम्र में से चालीस बरस बाक़ी नहीं हैं? मलक-उल-मौत ने कहा क्या तूने अपने बेटे दाऊद को नहीं बख़्शा था ? पस आदम के इन्कार से इस की ज़ुर्रियत इंकारी हुई और आदम की निस्यान (نسیان) से जो शजर-ए-मम्नूआ में से खाया उस की औलाद भी नासी (ناسی) हुई। आदम ने ख़ता की इस के लड़के भी ख़ाती हुए। इस हदीस को तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।”

इस हदीस से साफ़ ज़ाहिर है कि आदम का अपने वाअदे को तर्क करना और आदम का इन्कार करना और गुनाह करना उन की ज़ुर्रियत में मुंतक़िल हो गए। आपका ये फ़रमाना कि "अदम निस्यान सिर्फ़ ख़ुदा का हिस्सा है" और निस्यान मुस्तल्ज़िम गुनाह नहीं। बिल्कुल ग़लत है क्योंकि क़ुरआन शरीफ़ में साफ़ लिखा हुआ है कि ख़ुदा भूलता भी है और निस्यान पर सज़ा भी देता है जो मुस्तल्ज़िम गुनाह है। आयत जे़ल को ग़ौर से मुलाहिज़ा करें :—

فَذُوقُوا بِمَا نَسِيتُمْ لِقَاء يَوْمِكُمْ هَذَا إِنَّا نَسِينَاكُمْ وَذُوقُوا عَذَابَ الْخُلْدِ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ

(सुरह सज्दा आयत 4)

तर्जुमा: "सो अब चखो मज़ा जैसे भुला दिया था इस अपने दिन का मिलना हमने भुला दिया तुमको और चखो अज़ाब हमेशा का बदला अपने किए का।”

जो कुछ मौलवी सना-उल्लाह साहिब ने मेरे रसिला के मुताल्लिक़ लिखा था उस का जवाब-उल-जवाब यहां पर ख़त्म होता है। नाज़रीन से इल्तिमास है कि उनको बग़ौर पढ़ें। अब हम मौलवी साहब के इन एतराज़ात का जवाब लिखते हैं जो इल्ज़ामी तौर पर हम किए हैं।

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